Saturday, May 6, 2017

Articles on Life in Hindi

जीवन रहस्य निबंध, ज़िन्दगी लेख, रहस्यमयी दुनिया, संसार. Articles on What is Life in Hindi. World Mystery Essay, Universe Mysterious Facts, Speech, Paragraph.

जीवन है बड़ा गहरा

16/12/2016 - एक चींटी जिसके कान और आँखें नहीं होती उसके लिए संसार कैसा होगा? उसके लिए तो दृश्य और ध्वनि जैसा कुछ है ही नहीं। एक जानवर जिसके सुनने और देखने की क्षमता हमसे अलग हो उसके लिए यह संसार कैसा होगा? एक पत्थर, पेड़, नदी, चट्टान, सूरज, चन्द्रमा...इन सबके लिए यह संसार कैसा होगा? इन सबका संसार अलग-अलग है जो उनके ही मन और इन्द्रियों के अधीन चल रहा है। ऐसे ही जितनी भी जीव श्रेणियां हैं उनका देखना, सुनना, समझना सब अलग है और यह विभेद बढ़ते-बढ़ते जीवमात्र पर भी लागू हो जाता है। यह संसार तो किन्हीं दो मनुष्यों के लिए भी एक सा नहीं होता। चेतना और दृष्टिकोण के हर स्तर पर संसार का स्वरुप बदल जाता है। इसलिए हम कहते हैं जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि या यूँ कहें कि एक ही संसार में असंख्य संसार है। इन्द्रियों और मन से जो नज़र आ रहा है वह तो मात्र प्रक्षेपण है। मतलब इसी दुनिया में ऐसे कई संसार हो सकते हैं जो न हमें दिखाई दे रहे हों, न सुनाई दे रहे हों और न ही हम स्पर्श कर सकते हों। लेकिन जीवन सिर्फ वह नहीं जो किसी को भी अपने मन और इन्द्रियों से नज़र आता है। जीवन इससे परे भी बहुत कुछ है या यूँ कहूँ कि सब कुछ है। जीवन तो बड़ी गहरी चीज है।

12/06/2016 - सामान्यतया मैं मंदिर नहीं जाती, पूजा-पाठ नहीं करती, कोई इष्ट देव भी नहीं। किन्हीं संत-महात्माओं के यहाँ भी नहीं जाती, कोई गुरु विशेष भी नहीं। ईश्वर जैसा साकार रूप में अलग से कुछ है, जिसने इस सृष्टि को बनाया है, ऐसा भी नहीं सोच पाती। पर मैं इन सबको सिरे से झुठला भी नहीं सकती। हाँ, समय की मांग के अनुरूप और व्यापक हित में अपने नजरिये से किन बातों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए और किन्हें नहीं, इस पर विमर्श कर सकती हूँ...समर्थन और विरोध कर सकती हूँ। लेकिन आस्तिक-नास्तिक, वाम-दक्षिण, हिन्दू-गैर हिन्दू जैसी श्रेणियों में अपना विभाजन नहीं कर पाऊँगी।

जो परिभाषाएं यहाँ आस्तिकता और नास्तिकता की चलती है उनके अनुसार मैं नास्तिक नहीं हूँ क्योंकि यह समूचा ब्रह्माण्ड, उसकी व्यवस्था, सृष्टि, उस पर जीवन के विविध रंग और रूप, हमारा अपने जन्म और मृत्यु के साथ-साथ कई चीजों पर नियंत्रण का न होना...ऐसी असंख्य बातें हैं जो समर्पण कर देने के लिए पर्याप्त से अधिक है। यह हमारा अहंकार है जो समर्पण कर नहीं पाता। मैं आस्तिक नहीं हूँ क्योंकि ईश्वर को मैं अलग से किसी सर्जक या स्रष्टा इकाई के रूप में नहीं मान पाती। इसलिए ही किसी रूप या आकार विशेष की पूजा भी नहीं कर पाती। अगर अपने परम तत्व में अवस्थित हो जाने का मार्ग अकर्ता हो जाना है तो अवश्य ही परम तत्व भी अकर्ता ही होगा।

बाकी मेरे दृष्टिकोण में आस्तिकता और नास्तिकता में कोई अंतर है ही कहाँ? नास्तिक ब्रह्माण्ड का जो स्रोत अकारण और स्वत: मान लेते हैं उसे ही आस्तिक ईश्वर का नाम दे देते हैं। नास्तिक जिन्हें प्रकृति की शक्तियां या ऊर्जा कह देते हैं, उसे ही आस्तिक दैवीय शक्तियां कह देते हैं। अब उसी ऊर्जा को जब हम मानव कह देते हैं, पशु-पक्षी कह देते हैं, गाजर-मूली-टमाटर कह देते हैं तो इंद्र देवता, अग्नि देवता, पवन देवता कह देने में भी कोई विशेष समस्या वाली बात है नहीं। पर हाँ, प्रकृति का यह दैवीकरण भी जागरूकता के एक विशेष स्तर के बाद ही हो सकता है उससे पहले तो यह अज्ञान और अन्धविश्वास ही होगा। हमारे सुख-दुःख, भावनाएं, किसी की मृत्यु, किसी का जन्म...सब कुछ भी तो उसी ऊर्जा का रूप है। लेकिन अपनी भावनाओं के प्रति हम कितने संवेदनशील होते हैं। मरने-मारने, लड़ने-झगड़ने सबके लिए उतारू हो जाते हैं। पर गहराई में देखें तो विचार और भावनाएं भी उसी ऊर्जा का रूप है। तो फिर यह सारे संघर्ष भी कितनी बड़ी बेवकूफी है? (मुक्ति की यात्रा भी बस इसी चिंतन से शुरू होती है।)

सुविधा के तौर पर ठीक है पर जीवन को इस रूप में आप कैसे देख लेते हैं कि इसे इतनी आसानी और कट्टरता से खांचों में बाँटा जा सके? संभावनाओं में मेरा विश्वास है और धर्म मेरे लिए जड़ता नहीं बल्कि गति है - चेतना की आगामी संभावनाओं के स्तर पर बढ़ते जाना या यूँ कहूँ कि अपने ही मूल स्वभाव की ओर वापस लौटना। जीवन बस सोने-उठने, खाने-पीने, प्रजनन, सफलता और विकास के नाम पर होने वाली कई ऊटपटांग चीजों और फिर मर जाने जितना सीमित नहीं हो सकता। सब कुछ इतना सम्बंधित है कि न जाने कितने रास्ते एक ही जगह पर पहुँचते हैं। जीवन बहुत रहस्यमयी और जटिल है। कुछ समझना भी हो तो आसान बस हमें ही होना होता है।

Monika Jain ‘पंछी’

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Saturday, April 29, 2017

Article on Selfie Addiction in Hindi

सेल्फी से ख़तरे. Article on Selfie Addiction in Hindi. Advantage Disadvantage Essay, Photography Mania, Narcissism Syndrome, Personality Psychological Disorder.
Article on Selfie Addiction in Hindi 
यह सेल्फी संक्रमित युग है 
(ललकार टुडे में प्रकाशित)

प्रकृति की अनमोल धरोहर को समेटे दूर तक फैले उस हरी मखमली दूब वाले मैदान और बादलों की श्वेत-श्याम नदी को बहाते उस नील परी के आसमान से बेखबर जब सब लोग अपनी-अपनी सेल्फी लेने में व्यस्त थे तो दूर एक झील के किनारे उगे रंग-बिरंगे फूलों से मैं बातें कर रही थी। फूलों को देखकर मैं और मुझे देखकर फूल चहक रहे थे। तभी एक फूल ने कहा, ‘कितना समय हो गया, कितने दिन बीत गए, कितना अच्छा लग रहा है कि इतने दिनों बाद कोई हमसे मिलने आया है।’ और उसके स्वर को निरंतरता देते हुए एक दूसरे फूल ने कहा, ‘यूँ तो यहाँ बहुत भीड़ देखी है हमने। हम पर गिरते-पड़ते झील के किनारे खड़े होकर ये लोग हाथ में जाने क्या लेकर घंटों बटन दबाते रहते हैं। पर आज कितने दिनों बाद किसी ने आकर सहलाया है हमें और बिखेरी है एक चिर परिचित मुस्कान जो अक्सर खो जाती है यहाँ आये पर्यटकों के शोर शराबे, प्रदूषण और खींचातानी के बीच।’ तभी एक तीसरा फूल लहराकर मेरे गालों को छू गया। मेरी आँख खुली और मैंने देखा यह तो एक सपना था।

थोड़े विस्मय से भरी मैं, नींद से जागकर, फ्रेश होकर, लेमन टी की चुस्कियों के साथ जैसे ही अख़बार हाथ में थामती हूँ तो पन्ने पलटते-पलटते नजर पड़ती है एक ख़बर पर : रूस में सिखाये जा रहे हैं सेफ सेल्फी लेने के तरीके। इस ख़बर को पढ़ने के बाद सबसे पहला विचार मन-मस्तिष्क में यही कौंधता है कि हम इंसान प्रकृति के समस्त प्राणियों में से सबसे बेजोड़ नमूने इस मामले में भी हैं कि पहले तो हम लगाते हैं आग और फिर खोदते हैं कुआँ, और इसी विचार के साथ एक विचारों की श्रृंखला दौड़ पड़ती है।

बीते कुछ दिनों की बात है। सऊदी अरब में एक किशोर ने अपने दादा के शव के साथ शरारती मुस्कान और जीभ को बाहर निकालते हुए ‘अलविदा दादा’ कैप्शन के साथ एक सेल्फी पोस्ट की। असंवेदनशीलता की उपज यह मुस्कान सेल्फी पोस्ट कर लाइक पाने के क्रेज का एक उदाहरण मात्र है। ऐसे ना जाने कितने उदाहरण आजकल सुर्ख़ियों में बने हुए हैं।

पाकिस्तान की मशहूर गायिका कोमल रिजवी को ही लिया जाए। एक ओर 90 वर्ष के जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता अब्दुल सत्तार एधी गंभीर हालत में बिस्तर पर लेते हुए हैं, और दूसरी ओर कोमल रिजवी हँसते हुए उनके साथ सेल्फी लेकर फेसबुक पर पोस्ट कर रही हैं।

यह सब तो कुछ भी नहीं, सेल्फी का फीवर कुछ ऐसा चढ़ा है कि कई लोगों की सेल्फी उनके जीवन का आखिरी क्लिक बनकर रह गयी।

ऑस्कर ओटेरो एगुइलर नाम का एक व्यक्ति अपनी एक ख़ास सेल्फी लेकर सोशल मीडिया पर अपने दोस्तों को इम्प्रेस करना चाहता था। इसके चलते उसने एक गन अपने सर पर तानी और सेल्फी लेने लगा। लेकिन सेल्फी लेने के दौरान गलती से गन का ट्रिगर दब गया और मौके पर ही उसकी मौत हो गयी।

इसी तरह पुर्तगाल में एक दंपत्ति ऊंची चट्टान के ऊपर जाकर, बैरियर को लांघकर समुद्र के साथ आकर्षक सेल्फी लेने के चक्कर में उल्टे सर फिसले और सीधे चट्टान से समुद्र में समा गए। अपने पीछे वे दो मासूमों को छोड़ गए।

हैदराबाद से मनाली घूमने गए इंजीनियरिंग के उन 25-30 छात्रों को हम कैसे भूल सकते हैं जो व्यास नदी की लहरों से अनजान सेल्फीज और फोटोज क्लिक करने में इतने मस्त और मग्न थे कि कब लहरें उन्हें बहाकर ले गयी पता भी न चला।

सेल्फी लेते समय ध्यान भटक जाने के चलते विमान हादसे और कार एक्सीडेंट जैसी घटनाएँ भी अंजाम लेने लगी है। कुछ ख़ास क्षणों को कैद करना हुनर होता है, यादों को संजोने के लिए जरुरी भी। पर इतना तो ख़याल हो कि कहीं यादों के एल्बम सजाने के चक्कर में हम खुद ही उस एल्बम की एक याद बनकर ना रह जाएँ।

ऐसी ही घटनाओं के चलते रूस में सेल्फी प्रेमियों के लिए एक गाइडलाइन तैयार की गयी है जिसमें ब्रोशर, वीडियो और वेब कैंपेन के जरिये तेज रफ्तार ट्रेन, पहाड़ों के किनारे, बन्दूक और खतरनाक जानवरो के साथ सेल्फी ना लेने के लिए आगाह किया गया है। सेल्फी स्टिक से हो सकने वाली दुर्घटनाओं की आशंका के चलते विंबलडन टेनिस टूर्नामेंट के दौरान, कई फुटबॉल क्लबों, नेशनल गैलरी, द ऑल इंग्लैंड टेनिस एंड क्रिकेट क्लब आदि में सेल्फी स्टिक के प्रयोग पर पाबंदी है। डिज्नी ने दुनिया भर में अपने थीम पार्कों में सुरक्षा के चलते सेल्फी स्टिक के प्रयोग पर रोक लगा दी है। लेकिन कहाँ-कहाँ और कैसे-कैसे रोक लगायी जायेगी। आजकल टूरिज्म सिर्फ टूरिज्म नहीं सेल्फी टूरिज्म बनकर रह गया है। बल्कि टूरिज्म क्या अब तो लगभग हर घटना के आगे या पीछे सेल्फी शब्द जोड़ा जा सकता है : भूकम्प सेल्फी, ज्वालामुखी सेल्फी, शमशान सेल्फी, बाथरूम सेल्फी और भी पता नहीं कौन-कौन सी सेल्फी।

सेल्फी का क्रेज नेता, अभिनेता, युवाओं-युवतियों सब पर सर चढ़कर बोल रहा है। वो दिन गए जब सेलिब्रिटीज के ऑटोग्राफ लिए जाते थे। आजकल प्रशंसक अपने स्टार्स को अपने साथ ली गयी सेल्फी में संजो कर रखना चाहते हैं। पर यह सेल्फी मेनिया सेलिब्रिटीज के लिए समस्या भी खड़ी कर रहा है। बीते दिनों युवा ब्रिटिश गायक ज्यान मलिक ने पॉप बैंड ‘वन डायरेक्शन’ को छोड़ने का ऐलान यह कहकर किया कि वे सेल्फी कल्चर के शिकार हुए हैं। कुछ मौकापरस्त लड़कियों ने उनके साथ ली गयी सेल्फीज के आधार पर अफवाहें फैलाई जिसके चलते वे तनाव ग्रस्त हो गए।

सेल्फी के प्रति बढ़ती दीवानगी कई मनोरोगों को आमंत्रित कर रही है। अमेरिका के ओहियो यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिकों के 800 पुरुषों पर अध्ययन के अनुसार वे पुरुष जो घंटों फोटोशॉप पर एडिटिंग के बाद बहुत ज्यादा सेल्फी पोस्ट करते हैं, ऐसे लोग आत्ममुग्धता के शिकार होते हैं। उनमें स्वार्थ की अधिकता और संवेदनशीलता जैसे गुणों का अभाव होता है। उन्हें गुस्सा भी जल्दी आता है। वे अपने शरीर का एक वस्तु की तरह प्रदर्शन करते हैं, जो कि एक यौन विकृति है। महिलाओं को ऐसे पुरुषों से गंभीर रिश्ते बनाने से बचना चाहिए।

वहीँ एक सर्वे जो 16-25 वर्ष की 2000 युवतियों पर किया गया, जिसके अनुसार युवतियाँ दिन में कम से कम 48 मिनट और सप्ताह में 5-6 घंटे सेल्फी लेने में गुजार देती है। सर्वे में शामिल हर 10 में से एक लड़की के कंप्यूटर या स्मार्ट फ़ोन में स्नानघर, कार और कार्यालय में ली गयी लगभग 150 तस्वीरें पायी गयी। लाइक और कमेंट पाने का जूनून इस कदर हावी है कि कई युवतियाँ अपनी बॉडी इमेज को लेकर बहुत ज्यादा कोंशस होने के चलते ईटिंग डिसऑर्डर का शिकार हो रही है।

अमेरिकी साइकियाट्रिक ऐसोसिएशन की एक रिपोर्ट के अनुसार ‘सेल्फी’ को ‘आब्सेसिव कम्पलसिव डिजायर’ से जोड़ा गया है, जिसमें व्यक्ति अपनी तस्वीरें खींचना और शेयर करने का आदी हो जाता है। यह लत आत्मविश्वास को कमजोर करती है और नकारात्मकता को बढ़ावा देती है।

हालांकि हर चीज के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलु होते हैं। सेल्फी का उपयोग कई सामाजिक आन्दोलनों को सक्रीय बनाने में भी किया जा रहा है। कुछ ही समय पहले ब्रिटेन में कैंसर रोगियों की मदद के लिए कैंसर रिसर्च यूके चैरिटी ने ‘नो मेकअप सेल्फी फॉर कैंसर अवेयरनेस’ नामक एक अभियान चलाया। इस अभियान के जरिये कैंसर रोगियों के लिए करोड़ों रुपयों की मदद जुटाई गयी। इसी तरह का ‘पिंक सेल्फी अभियान’ ओगां कैंसर फाउंडेशन और एले ब्रेस्ट कैंसर कैंपेन की पहल पर बॉलीवुड हस्तियों और फैशन डिज़ाइनर्स की मदद से स्तन कैंसर के प्रति जागरूकता फ़ैलाने के उद्देश्य से चलाया गया। हमारे देश में चल रहे सेल्फी विथ डॉटर अभियान से हम सब परिचित ही हैं। इसी तरह 5 सितम्बर, 2014 से ही आगाज हुआ ग्लोबल ह्यूमनराइट समूह का ‘सेल्फीज4स्कूल’ अभियान जिसके तहत सेल्फीज पोस्ट कर लड़कियों को स्कूल भेजने का बीड़ा उठाया गया है।

ये सब सकारात्मक पहलु हैं लेकिन जब सामाजिक सरोकारों से इतर यह सेल्फी क्रेज स्टेटस सिंबल बनकर हर पीढ़ी के लोगों पर हावी होता हुआ नजर आता है तो चिंता होना स्वाभाविक है। सेल्फी शब्द सिर्फ ऑक्सफ़ोर्ड ‘वर्ड ऑफ़ द इयर 2013’ ही नहीं बना बल्कि यह सोते-जागते, उठते-बैठते, खाते-पीते, नहाते-गाते हर घटना, हर पल के साथ जुड़ता चला जा रहा है। जिसके घातक परिणाम हम ऊपर देख चुके हैं। नकारात्मकता, आत्मविश्वास की कमी, अकेलापन, दिखावा, क्रोध, चिड़चिड़ाहट, तनाव, आत्महत्या यह सब सेल्फी युग की सौगाते हैं जो हम पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित करने वाले हैं। क्योंकि हम कुआँ तो तभी खोदेंगे जब आग लगेगी और वह भी सिर्फ फोरी तौर पर।

Monika Jain ‘पंछी’
(16/07/2015)

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Friday, April 28, 2017

Azadi par Kavita in Hindi

आज़ादी पर कविता, नारी मुक्ति शायरी. Azadi par Kavita in Hindi. Women’s Freedom Poem, Nari Mukti, Mahila Swatantrata, Female Liberty, Liberation, Independence.

(1)

मुट्ठी भर आज़ादी

माँ! क्या ऐसा कोई आसमां नहीं होता
जहाँ से रोज भर लाऊं मैं मुट्ठी भर आज़ादी।

आज़ादी उन घूरती नजरों से
जो मुझे बेपरवाह नहीं चलने देती रास्तों पर।

आज़ादी उन तानों, लतीफों और तारीफों के कशीदों से
जो मुझे बार बार अहसास कराती है रूह से ज्यादा एक जिस्म भर होने का।

आज़ादी उस रोक-टोक और हजारों सलाह-मशविरों से
जिनमें घर से बाहर मेरा निकलना तय होता है घड़ी की दो सुइयों से।

आज़ादी उस खौफ़ से, जो बढ़ता ही जाता है
रोज अख़बार के पन्ने पलटते-पलटते सुनाई देने वाली चीखों से।

आज़ादी उस सोच से, जिसमें इज्जत को जोड़ा जाता है
मात्र लड़की के शरीर के एक अंग से।

आज़ादी उस दकियानूसी ख़याल से
जिसमें इज्जत नहीं जाती दोषी की बल्कि जाती है निर्दोष की।

आज़ादी आज़ादी के उस कोरे भ्रम से, जिसमें नारी मुक्ति की परिभाषा
गढ़ी जा रही है केवल देह प्रदर्शन और वस्त्र मुक्ति से।

आज़ादी उस होड़ से जो स्त्री पुरुष को एक दूसरे का पूरक न बना
पेश कर रही है एक दूसरे के प्रतिद्वंदी के रूप में।

माँ! मुझे रोज लानी है मुट्ठी भर आज़ादी
ताकि बना सकूँ यहाँ भी एक दिन मैं ऐसा आसमां
मेरी सोच, मेरे विचार, मेरी क्षमताएं और मेरा विश्वास
खुल कर सांस ले सके जहाँ।

Monika Jain ‘पंछी’
(16/06/2014)

(2)

उन्मुक्त

फूलों को दे आओ पौधों को
तितलियों को भी जरा आज़ाद करो
छिपा के न रखो कहानियां कोई
तनहाईयों को अपनी आबाद करो।
काटों पे अंगुलियाँ रखने का कैसा गम
लकीरें लिखेंगी किस्मत है कोरा भ्रम
उसे भी कर दो हर बंधन से मुक्त
और नील गगन में उड़ो
तुम होकर उन्मुक्त।

Monika Jain ‘पंछी’

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