Friday, February 5, 2016

Essay on Salvation in Hindi

Essay on Salvation in Hindi. Mukti par Nibandh. Samyak Drishti, Gyan, Charitra, Right Vision, Knowledge, Conduct. Nirvana, Moksh, Liberation, Sthitpragya. सम्यक ज्ञान, दर्शन, चरित्र, मुक्ति, मोक्ष.
 
मन विजय करे... 

यूँ तो यह पूरा ब्रह्माण्ड ही रहस्मयी है और हमारा जीवन भी अगर हम ध्यान दें तो कितने सारे रहस्यात्मक अनुभवों का साक्षी बनता है. ऐसे ही कई अनुभवों में कल का दिन भी कुछ अद्भुत अनुभवों के नाम रहा. ईर्ष्या, द्वेष, स्वार्थ, असुरक्षा, अहंकार और शक किसी व्यक्ति को किस स्तर तक नीचे गिरा सकते हैं इसके कुछ नमूने देखे. उन्हीं में से एक था...जिस लड़की के शब्दकोष में गालियों के नाम पर जानवरों को बदनाम करने वाले सिर्फ एक दो शब्द ही विद्यमान थे उसे एक मोहतरमा ने स्त्री सूचक कई गालियों से परिचय करवाया.
 
खैर! यह सब कुछ इतना अद्भुत नहीं था. जो सबसे अद्भुत चीज थी वह यह थी कि जिन बातों को सुनकर मुझे बहुत अधिक गुस्सा, तनाव या रोना आना चाहिए था उन बातों पर मैं मुस्कुरा रही थी. कोई संघीन मिथ्या आरोपों और अपशब्दों के पटाखे और बम छोड़ रहा था और मैंने चेहरे और होंठों पर फूल खिल रहे थे. अचानक खुद को चिमटी काटकर देखा कि कहीं यह कोई सपना तो नहीं...या फिर कहीं बुद्ध, जीसस या महावीर की आत्मा तो कुछ देर को प्रवेश नहीं कर गयी है. :p क्योंकि एक सीमा से पार हो जाने के बाद, या ऊपर तक भर जाने पर मेरे गुस्से का ज्वालामुखी फूट ही पड़ता है. और इन मायनों में क्रोध मेरी एक बड़ी कमजोरी भी है. लेकिन कल कुछ भी नहीं भर रहा था. बल्कि सब कुछ खाली और शांत होते हुए लग रहा था. मैं लगातार मुस्कुरा रही थी...अभी भी मुस्कुरा रही हूँ. :) और सब कुछ विपरीत होने के बावजूद भी मैं बहुत ख़ुश थी. क्योंकि एक बार फिर यह विश्वास गहरा हुआ कि मन पर विजय ही सबसे बड़ी विजय है. इस विजय के मार्ग में जो सबसे बड़ी बाधा थी, जिसे दूर करने के लिए प्रकृति कब से संकेत दे रही थी...कल हिम्मत जुटाकर उसे भी दूर कर पायी. क्योंकि मोह और अहंकार अक्सर हमें वह नहीं देखने देता जो सच होता है.
 

महावीर के जीवन का एक किस्सा है. एक बार वे एक वन में गहरे ध्यान में लीन थे. तभी वहां एक ग्वाला अपने बैलों के साथ आया. महावीर को कुछ समय के लिए अपने बैलों का ध्यान रखने की कहकर वह कहीं चला गया. महावीर ध्यान में थे और उन्हें इस बारे में कुछ पता ही नहीं था. जब ग्वाला वापस आया तो बैल वहां नहीं थे. उसने समझा कि महावीर ने उसके बैल कहीं छिपा दिए हैं और क्रोध में आकर उनके कानों में कीले ठोक दिए. महावीर आत्मज्ञानी थे इसलिए समताभाव से चुपचाप सब देखते रहे. उन्हें यह भी स्मरण था कि अपने ही किसी पिछले जन्म में उन्होंने एक राजा के रूप में एक छोटी सी गलती के लिए इसी ग्वाले को जो शायद एक गायक था के कानों में गर्म शीशा पिघलवाकर डाल दिया था.

अगर राग-द्वेष और ऐसे ही सभी विकारों से दूर होकर अपने मन से कोई भी सहयोग दिए बिना हम किसी चीज को सिर्फ साक्षी या दृष्टा की तरह देखते हैं तो इसका अनुभव सच में अवर्णनीय और अद्भुत है. कई लोगों के लिए साक्षी बनने या दृष्टा बनने की टर्म शायद नयी हो, उनके लिए हम एक उदाहरण लेते हैं : जैसे हमारे पाँव या हाथ पर कहीं चोट लगी. 99% लोग दर्द से कराहने लगेंगे. कई जोर-जोर से रोने लगेंगे. लेकिन इस स्थिति में अगर कोई साक्षी बनता है तो वह सिर्फ उस दर्द को द्रष्टा बनकर देखेगा. वह अपने मन से इसे कोई सहयोग नहीं देगा. जैसा है सिर्फ वैसा देखेगा...मन को शरीर से बिल्कुल अलग करके..जैसे दर्द सिर्फ शरीर के उस हिस्से को हो रहा है...मुझे नहीं हो रहा है. जब हम ऐसा करने में संभव हो पाते हैं तो हमें दर्द का अहसास नहीं होता. शरीर और उसका दर्द हमें खुद से अलग जान पड़ता है. यही मुक्त होना है...यही स्वतंत्र होना है. और यह साक्षी बनने की प्रक्रिया हर एक घटना पर लागू की जा सकती है. यही ध्यान है, यही जागरूकता है, यही सम्यक दृष्टि है. जब यह अपने ही मन पर हो तो सामायिक बन जाती है. और यह सम्यक दृष्टि ही हमें सम्यक ज्ञान तक ले जाती है. यह सम्यक ज्ञान ही सम्यक आचरण बनता है और यह सम्यक आचरण ही हमें मुक्ति मने परम स्वतंत्रता की ओर ले जाता है. :)

By Monika Jain ‘पंछी’