Thursday, September 22, 2016

Self Dependence, Development Essay in Hindi

आत्मनिर्भरता पर निबंध, स्वावलंबन, विज्ञान, तकनीक, आर्थिक विकास. Essay on Self Dependence, Reliance in Hindi. Development of Science and Technology, Paragraph.

विकास बनाम आत्मनिर्भरता

कुछ दिन पहले दो दिन तक शहर में नेट और मोबाइल सेवा ठप्प रही।...कारण था एक उधार लेने वाले ने उधार न चुकाने की मंशा के चलते उधार देने वाले की हत्या कर दी और उसके घर को भी लूट लिया। खैर! इस ख़बर की ओर ध्यान दिलाना मेरा उद्देश्य नहीं था। ऐसी ख़बरे तो आप रोज ही अख़बारों में पढ़ते हैं, टीवी पर देखते हैं। लेकिन हाँ, इन घटनाओं का कारण जरुर इस पोस्ट में मिल जाएगा।...तो मैं बात कर रही थी दो दिनों तक नेट और मोबाइल सेवा ठप्प होने की। कैसा महसूस होता है जब अचानक से इन्टरनेट या कॉल की सुविधा बंद हो जाती है? कैसा लगता है जब पूरे दिन बिजली नहीं आती? कैसा लगता है जब अचानक से यातायात के साधन किसी हड़ताल या अन्य किसी कारण से बंद हो जाए? कैसा लगता है जब धार्मिक उन्मादों के चलते शहर, मार्केट, कहीं भी आना-जाना सब बंद हो जाता है? कैसा लगता है जब किसी दिन घर का फ्रिज, पंखा, मिक्सर या कोई भी जरुरी मशीन काम करना बंद कर दे और कुछ दिनों तक कोई ठीक करने वाला उपलब्ध न हो? कैसा लगता है जब पूरी तरह से नौकरों पर निर्भर मालिक के यहाँ कुछ दिन नौकर न आये? और भी ऐसे कई सारे सवाल बनाये जा सकते हैं। हर एक सवाल का ज़वाब कई लोगों के लिए कुछ बेचैनी, परेशानी, किसी जरुरी काम का रुक जाना, पैसों का नुकसान, समय का नुकसान, चिड़चिड़ापन, घबराहट, चिंता, तनाव और ऐसी ही कई चीजें होंगी।

मेरा अगला सवाल यह कि विकास, तरक्की और आगे बढ़ने के आपके लिए क्या मायने हैं? अधिकांश लोगों का जवाब होगा वैज्ञानिक-तकनीकी उन्नति, सुख-सुविधा युक्त साधनों का बढ़ना, समय और मेहनत बचाने वाली मशीनों का आना, एक बटन दबाते ही सब कुछ हो जाए...ऐसा ही कुछ...है न? पर वाकई क्या विकास की यह परिभाषा सही है? विकास का आशय मैं लेती हूँ आत्मनिर्भरता का बढ़ते जाना। इस आत्मनिर्भरता का आशय सिर्फ आर्थिक आत्मनिर्भरता जितना संकुचित मत करना। उससे कई अधिक विस्तृत अर्थ है इस शब्द का...जिसकी अंतिम सीमा वहां तक पहुँचती है जहाँ पर आत्म के सिवा और कुछ भी शेष नहीं रह जाता। किसी चीज पर कोई निर्भरता नहीं। पूर्ण स्वतंत्रता...पूर्ण मुक्ति की स्थिति।

खैर! यह शीर्ष की बात है। हम फिर से पीछे लौटते हैं। ऊपर जिस तरक्की की मैंने बात की और जिसे आप विकास बताएँगे वहां आत्मनिर्भरता का हश्र कैसा है यह सोचने और समझने वाली बात है। जहाँ एक दिन भी अगर इन्टरनेट उपलब्ध न हो तो त्राहि-त्राहि मच जाती है। यातायात सेवा ठप्प हो जाए, फ़ोन घुम हो जाए, शहर बंद हो जाए, बिजली चली जाए तो इंसान बौखला जाता है। हमारा तथाकथित विकास हमें इस कदर अन्य लोगों और वस्तुओं पर निर्भर बनाता जा रहा है कि हम साधनों को साध्य समझ बैठे हैं। ऐसे में अध्यात्म का जीवन में समावेश इसलिए भी जरुरी है क्योंकि यह अंधाधुंध विकास की दौड़ में थोड़ा ठहरकर हमें वास्तविक अर्थों में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में ले जाता है। कहते हैं कि भगवान् महावीर की आत्मनिर्भरता ऐसी थी कि उन्हें भोजन करने की जरुरत नहीं होती थी...तब भी उनका शरीर बलिष्ठ था। शरीर से अद्भुत कांति चारों ओर बिखरी रहती थी...वस्त्रों की उन्हें जरुरत नहीं थी...महलों की उन्हें जरुरत नहीं थी। आत्मनिर्भरता के असल मायने तो यही हैं जहाँ बाहरी साधनों पर निर्भरता और आसक्ति घटती ही जाए। ऐसी आत्मनिर्भरता तक हम पहुचं जाएँ तब तो कितनी समस्यायों का समाधान हो जाएगा। भले ही हम आवश्यकता और समय की मांग के अनुरूप कुछ साधनों का प्रयोग करें लेकिन वे हमारे लिए जीवन और मरण का प्रश्न तो नहीं बनेंगे।

अब सोचने वाली बात यह है कि महज तकनीकी सुविधाओं के विकास के द्वारा हम कितने आत्मनिर्भर और विकसित बन रहे हैं? इस पोस्ट द्वारा मैं तकनीकी विकास का विरोध नहीं कर रही...यह पोस्ट भी आप तक तकनीकी सुविधा के उपयोग के जरिये ही पहुँच रही है। लेकिन विकास के नाम पर जो अति हो रही है उसके बारे में चिंतन हेतु मैं कुछ तर्क दे रही हूँ। वह अति विकास क्या काम का जो प्रकृति से नीचे गिराकर फिर से हमें प्रकृति की ओर लौटने को मजबूर करे? हम कब तक पहले आग लगाकर फिर कुआँ खोदने का उपक्रम करते रहेंगे? कब तक? बेहतर होता विषमता की खाईयों को बढ़ाते जाने की बजाय हम संतुलित बाह्य विकास और आत्म विकास की ओर ध्यान देते। बेहतर होता विज्ञान का उपयोग जगत और जीवन के रहस्यों की खोज में मुख्य रूप से होता। केवल सुविधा के साधन जुटाते जाने वाला विज्ञान विकास नहीं विनाश का पर्याय लगता है। क्योंकि जितनी अधिक हमारी दूसरों पर निर्भरता होगी, उतने ही हम गुलाम और उतनी ही हमारे जीवन की चाबी किसी और के हाथों में होगी...फिर चाहे हम वस्तुओं के गुलाम बनें या फिर व्यक्तियों के।

By Monika Jain ‘पंछी’

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Wednesday, September 21, 2016

Karma Yoga, Geeta Gyan in Hindi

भागवत गीता ज्ञान के उपदेश, कर्मयोग क्या है? Karma Yoga in Hindi. Bhagavad Geeta Updesh, Gita Gyan, Selfless Service, Detachment in Fruits of Action, Karm Yog.

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कर्मयोग

वह एक शेयर ट्रेडिंग फर्म थी। मार्केट वोलेटिलिटी के समय ब्रोकरेज की कमाई बढ़ जाती है, तो ऐसे समय में उस फर्म के ओनर तालियाँ पीट-पीट कर हँसते और ठहाके लगाते नज़र आते थे। उनके किसी कस्टमर का फ़ोन आता जिसका पैसा डूबने वाला हो, जो घबराया हुआ हो, तब भी उनकी ख़ुशी देखते ही बनती थी...वही ठहाकों वाली हंसी। बहुत अजीब से एक्सप्रेशन्स होते थे उनके चेहरे के। मेरे लिए यह बहुत हैरान करने वाली बात होती थी। वैज्ञानिक तकनीकी विकास और ग्लोबलाइजेशन के नाम पर हमने लाइफ साइकिल को बहुत ज्यादा कॉम्पलीकेटेड बना दिया है। ऐसे में किसी एक का नुकसान किसी एक का फायदा होगा, यह तो होता ही है। कुछ मिलता है हमें तो ख़ुश होना भी स्वाभाविक है। लेकिन किसी और के दुःख में हम एकदम असंवेदनशील ठहाकों की गुंजाईश कैसे खोज पाते हैं?

खैर! यह कईयों के लिए बहुत छोटी सी बात होगी...क्योंकि असंवेदनशीलता इस कदर व्याप्त है कि इन्हीं ठहाकों के बीच मौत भी खरीदी और बेची जाती है। इन्हीं ठहाकों के बीच खाने-पीने की चीजों में मिलावट कर पूरी मानव जाति को जहर परोसा दिया जाता है और इन्हीं ठहाकों के बीच जिन्दा शरीरों का अपहरण कर ज़िन्दगी जहन्नुम बना दी जाती है।...तो फिर जो कानूनन हो रहा है उसमें ठहाके लगाना क्या गलत? लेकिन कानून के दायरे में भी अक्सर ही हमारा फल किसी के लिए दुष्फल हो रहा होता है। इसलिए भी फल में अत्यधिक आसक्ति को त्यागना संवेदनशीलता और समानुभूति का ही पर्याय है। बाकी कोशिश यह की जानी चाहिए कि हर समय बाहर से प्रभावित हमारी ख़ुशी घटते-घटते एक दिन भीतर से छलकने और झलकने लगे। ख़ुश होना, हँसना, मुस्कुराना बहुत ख़ुशी की बात है। बस इसकी कीमत क्या है इस पर थोड़ा ध्यान रहे। कीमत केवल वह नहीं जो आपकी जेब से जाने वाली है, कीमत वह भी जो किसी और के आंसू बनने वाली हो। इसलिए सबसे पहले तो हम ऐसे कर्म का चुनाव करें जिसमें किसी और का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नुकसान न्यूनतम हो (अगर समाज सेवा का कर्म चुन सकें तो सबसे बेहतर है) और उसके बाद यह जरुरी है कि फल में हमारी आसक्ति कम से कम हो। हमारा पूरा ध्यान बस कर्म करने पर हो। यही कर्मयोग है। यही वास्तविक आनंद का हेतु है।

By Monika Jain ‘पंछी’

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गीता ज्ञान

(लेखन/कविता के क्षेत्र में अच्छी खासी महाभारत चल रही है। सिर्फ युद्ध शुरू करने के लिए नहीं, युद्ध रोकने के लिए भी गीता ज्ञान की जरुरत पड़ती है।)

हे लेखक!

क्यों व्यर्थ झगड़ा करते हो? किससे व्यर्थ लड़ते हो? कौन तुम्हें हरा सकता है? आत्मा न हारती है, न जीतती है। आत्मा तो लिखती भी नहीं। जो लिखा गया अच्छा था। जो लिखा जा रहा है अच्छा है। जो लिखा जाएगा वह भी अच्छा होगा। भूत-भविष्य की चिंता छोड़ो, वर्तमान चल रहा है।

तुम्हारा क्या गया जो तुम लड़ते हो? तुम क्या लाये थे जो तुम झगड़ते हो? तुमने क्या लिखा था जो तुमने खो दिया? तुम न कोई कविता लेकर आये थे, न कोई लेख लेकर जाओगे। तुमने शब्द यहीं से लिए, तुमने विचार यहीं से लिए। जो लिखा वह यहीं पर दिया। खाली हाथ आये थे खाली हाथ चले जाओगे। जो शब्द/विचार आज तुम्हारे हैं कल किसी और के होंगे, परसों किसी और के। तुम इन्हें अपना समझकर मग्न हो रहे हो बस यही तुम्हारे दु:खों का कारण है।

लिखते समय दृष्टा बनों फिर खुद को लेखक नहीं पाओगे। लड़ते समय भी दृष्टा और साक्षी बनों...फिर लड़ नहीं पाओगे। ये शब्द और विचार न तुम्हारे हैं, न तुम इन शब्दों और विचारों के। तुम इन शब्दों और विचारों को ईश्वर/शून्य को अर्पित करो। यही सबसे उत्तम है। यही आनंद का रहस्य है।

तुम्हारा कृष्ण!

By Monika Jain ‘पंछी’

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Poem on Peace in Hindi

विश्व शांति दिवस पर कविता, अंतरराष्ट्रीय अमन, सुकून शायरी. Poem on International Peace Day in Hindi. Peaceful Inner World Poetry Lines, Harmony Rhymes, Slogans.

शांति कैसे हो?

शांति कैसे हो?
भीतर कोलाहल, बाहर कोलाहल
भीतर का शोर पहुँचता है बाहर
बाहर का शोर पहुँचता है भीतर
चक्र कैसे टूटे?
सम्बन्ध कैसे छूटे?

अलग कर देना खुद को
शोर और श्रोता से,
बन जाना मात्र साक्षी
मन अंकित करेगा ध्वनियों को
कान सुनेंगे आवाजें सारी...
पर तुम न मन बनना
और न ही कान
तुम बन जाना बस एक प्रमाण!

वह प्रमाण जो प्रभावों से हैं शून्य
जो नहीं बहता संग आवाजों के...
विस्फोटों के बीच भी
जो बचा पाता है अपनी कांति
बस वही लाएगा जीवन में
प्रेम और शांति।
बस वही लाएगा जीवन में
प्रेम और शांति।

By Monika Jain ‘पंछी’

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