Saturday, August 1, 2015

Story on Female Foeticide in Hindi


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कहानी : वंशिका

Story on Female Foeticide in Hindi

(ललकार टुडे में प्रकाशित)  

‘वंशिका ! अच्छा नाम है ना ?’ अपनी मासूम सी बच्ची जिसने आज ही जन्म लिया था उसे अपने हाथों में उठा उसका माथा चूमते हुए दामिनी ने रश्मि से कहा.

कहते हैं जब एक औरत माँ बनती है तो उसका दूसरा जन्म होता है. वंशिका की माँ के रूप में तो दामिनी का दूसरा जन्म था ही साथ ही कुछ समय से उसकी दुनिया भी बदल चुकी थी.

अपने पति, सास-ससुर सभी को छोड़कर कुछ महीने पहले ही वह इस नए शहर में आकर बसी थी, सिर्फ और सिर्फ अपनी बेटी के लिए.

कितनी खुश थी वह जिस दिन उसे डॉक्टर से पता चला कि वह माँ बनने वाली है. ना जाने कितने सपने संजोये थे उसने अपनी पहली संतान को लेकर. पर जब उसे यह पता चला कि उसके पति और सास-ससुर चाहते हैं कि पहली संतान लड़का ही होनी चाहिए तो उसका मन एक अनजाने से भय से आतंकित हो गया.

घर वालों के दबाव में आकर उसे अपने गर्भ की जांच करानी ही पड़ी और जब उसे पता चला कि उसके गर्भ में एक लड़की पल रही है तो उसे उसके सारे सपने बिखरते नज़र आये.

उस पर बार-बार बच्चे को गिराने का दबाव डाला जाने लगा. पर इस कुकृत्य के लिए दामिनी बिल्कुल भी तैयार नहीं थी. एक नन्हीं सी कली जो अभी खिली भी नहीं, जिसने दुनिया देखी भी नहीं और जो उसके शरीर का एक हिस्सा थी उसे वह अपने से कैसे अलग कर सकती थी ?

घर में रोज कलह होने लगी. उसने अपने पति अनिल और सास-ससुर को समझाने की बहुत कोशिश की पर उन पर कोई असर ना पड़ा और उन्होंने अपना फैसला सुना दिया, ‘तुम्हें घर और बच्ची दोनों में से किसी एक को चुनना होगा. अगर तुम्हें इस घर में रहना है तो बच्चा गिरवाना होगा वरना यह घर छोड़कर जाना होगा.’

दामिनी के पैरों तले जमीन खिसक गयी. दामिनी के माता-पिता नहीं थे. मायके में बस उसके दो बड़े भाई और उनके बीवी-बच्चे थे. उसने अपने मायके में बात की तो वहां से भी यही सलाह मिली, ‘जैसा ससुराल वाले कहते हैं वैसा ही कर. जिसने जन्म ही नहीं लिया उसके लिए तू अपने पति को कैसे छोड़ सकती है ? बच्चे तो और भी हो जायेंगे पर शादी कोई बच्चों का खेल नहीं है जो तू इतना बड़ा फैसला अकेले ले ले.’

मायके से भी निराश दामिनी के लिए अब कोई भी फैसला करना बहुत मुश्किल था. पर किसी भी कीमत पर वह एक मासूम बच्ची की जान नहीं ले सकती थी. उसने अपनी बचपन की पक्की सहेली रश्मि से बात की और उसी के शहर में अपने रहने का इंतजाम करवाया और अपनी सारी हिम्मत जुटाकर कपड़ों से भरा सूटकेस और अपने जमा कुछ पैसे लेकर निकल पड़ी एक नए शहर के लिए.

अपनी सहेली के घर के पास ही एक छोटे से कमरे में उसने अपनी नयी दुनिया बसाई. दामिनी पढ़ी लिखी थी. वहीँ उसने एक स्कूल ज्वाइन कर लिया और किसी तरह अपना नया जीवन शुरू किया. आसान तो कुछ भी नहीं था पर अपनी हिम्मत और रश्मि से मिली मदद के बल पर उसने सारी मुश्किलों को पार किया और कुछ महीने बाद एक बहुत ही सुन्दर फूल सी बच्ची को जन्म दिया.

दामिनी वंशिका को प्यार से वंशु कहकर बुलाती थी. एक छोटी सी बच्ची के साथ जॉब और घर के सारे काम बहुत मुश्किल थे पर दामिनी को कुछ अच्छे लोगों का साथ मिला और मुश्किलों से उसकी लड़ाई जारी रही. दामिनी ने वंशिका की पढ़ाई-लिखाई और पालन-पोषण में कोई कसर नहीं छोड़ी. वंशिका भी अपनी माँ से बहुत प्यार करती थी. दामिनी सिर्फ उसकी माँ ही नहीं बल्कि उसकी सबसे अच्छी दोस्त भी थी, जिससे वह अपने स्कूल, दोस्तों सबकी बातें शेयर करती थी.

वंशिका को अपने पिता का सच नहीं पता था. उसे यही बताया गया कि एक हादसे में उसके पिता और दादा-दादी की मौत हो गयी. क्योंकि दामिनी नहीं चाहती थी कि अपने पिता का सच जानकर वंशिका का दिल टूट जाए और वह अपने पिता से नफरत करने लगे.

उधर दामिनी के जाने के एक साल के भीतर ही उसके पति अनिल ने दूसरी शादी कर ली. नयी पत्नी से दो जुड़वाँ बेटे हुए आकाश और विकास.

समय बीतता गया और बच्चे बड़े हो गए.

वंशिका ने PMT की परीक्षा पास की और मेडिकल कॉलेज से अपनी पढ़ाई पूरी कर वह डॉक्टर बन गयी. वंशिका की पोस्टिंग उसी शहर में हुई जहाँ उसके पिता रहते थे. दामिनी को जब पता चला तो अतीत की सारी स्मृतियाँ उसकी आँखों के सामने छाने लगी. वह घबरा भी गयी पर बेटी के करियर का सवाल था सो अपनी भावनाओं पर काबू कर वह बेटी के साथ उसी शहर चली आई जहाँ से कभी शादी के बाद उसने अपना नया जीवन शुरू किया था.

उधर अनिल की दूसरी पत्नी निशा की कुछ साल पहले एक कार एक्सीडेंट में मौत हो गयी थी. आकाश और विकास दोनों ने अमेरिका में एम.बी.ए. किया और वहीँ की लड़कियों से शादी कर वहीँ सेटल हो गए. इधर दामिनी का पति अनिल अपने बूढ़े माता-पिता के साथ अकेला रह गया.

अनिल की तबियत बहुत ख़राब रहने लगी. जांच कराने पर पता चला उसे ब्लड कैंसर है. जिन बेटों की चाह में उसने अपनी पहली पत्नी को घर से निकाल दिया उन्हीं को उसकी कोई परवाह नहीं थी. अकेलापन उसे सालने लगा और वह अपराध बोध से भर गया पर अब पछताने के अलावा उसके पास कुछ था भी नहीं. मरने से पहले उसकी बस एक ही ख्वाइश थी दामिनी और अपनी बेटी से माफ़ी मांगना.

एक दिन वंशिका जब अपने घर से हॉस्पिटल के लिए रवाना हो रही थी तो उसने देखा पास ही में एक आदमी चक्कर खा कर गिर गया और बेहोश हो गया. लोगों की मदद से वह उसे अपने घर तक लायी. माँ से पानी मंगवाया और उस आदमी की जांच करने लगी. माँ वंशिका को पानी का गिलास देकर ज्यों ही वापस मुड़ी अचानक उसके कदम रुक गए. उसने उस आदमी को ध्यान से देखा. वह और कोई नहीं बल्कि उसका पति अनिल ही था. वह एकदम स्तब्ध रह गयी. अनिल को भी होश आ गया था. उसके सामने दामिनी खड़ी थी. उसने अपनी आँखों को मसला और फिर से उसे देखा. जब उसने दामिनी को पहचान लिया तो वह अपनी भावनाओं पर काबू ना कर सका, फूट फूट कर रोने लगा और हाथ जोड़कर बोला, ‘दामिनी! प्लीज मुझे माफ़ कर दो. मैं तुम्हारा बहुत बड़ा अपराधी हूँ पर हो सके तो मुझे माफ़ कर दो.’

वंशिका को कुछ समझ नहीं आया तो उसने माँ से पूछा, ‘माँ क्या आप इन्हें जानती हो ?’

वंशिका के माँ कहते ही अनिल ने अपने आंसू पौंछे और एक बार वंशिका को और फिर सवाल भरी निगाह से दामिनी की ओर देखा. दामिनी ने सहमति में सर हिला दिया.

अनिल को खांसी चलने लगी. वंशिका पानी का गिलास लेकर अनिल को पानी पिलाने लगी. पानी पीकर अनिल ने बड़े प्यार से उसके सर पे हाथ फेरा और पूछा, ‘बेटा! तुम्हारा नाम क्या है ?

‘वंशिका’

और इस शब्द के साथ ही अनिल की आँखें झुक गयी और फिर से अविरल आंसू बह पड़े.

By Monika Jain ‘पंछी’

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