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Poem on Communal Riots in Hindi


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क्या खुश होगा, तेरा अल्लाह, तेरा राम ?

हिंसा की आग में जल जाते हैं 
कितने ही मासूम आशियाने
कभी धर्म की ज्वाला 
कभी आग जाति के नाम पर
कभी क्षेत्रवाद की अग्नि ने जला दिए 
कितने ही घर.

क्या तेरा जला 
क्या तूने जलाया
अंत में तो हमने बस 
मौत का मंज़र ही पाया.

बस चीखें सुनाइ दी एक सी
क्या हिन्दू, क्या मुस्लमान
खून भी था एक सा
हुई जिससे धरती लहुलुहान.

अब रुक और सोच
क्या तुझसे यही धर्म कहता है
निर्बल की हत्या 
आखिर कैसे तू सहता है?

क्या गीता, क्या रामायण-कुरान
सब में एक ही प्रभु, एक सा है ज्ञान.
कि एक ही हैं बन्दे, उसके बस नाम अलग है
इबादत है एक सी ही, बस जाप अलग है.

अब रुक तू, ज़रा सोच 
क्या यही है तेरा इन्तकाम?
इस दर्द से, इस मंज़र से
क्या खुश होगा, तेरा अल्लाह, तेरा राम?
क्या खुश होगा, तेरा अल्लाह, तेरा राम?

By Rishabh Goyal 
Kotdwar, Uttarakhand

Inspite of the concept of secularism there are religion, caste, color and language intolerance in India. The virus of communalism has engulfed many people in our country. Since independence we are witnessing frequent hindu muslim riots. Earlier the british rulers and now the politicians are following the policy of ‘divide and rule’. No sincere efforts have ever made to fill the gap between these two major religious communities. 

Thank you Rishabh for sharing this poem on communal riots depicting it’s ugly face and the need of communal harmony.