Essay on Teachers Day in Hindi


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कैसे हो हमारे शिक्षक 

यूँ तो हमेशा स्कूल और डिस्ट्रिक्ट टॉपर रहने और सभी गतिविधियों में सबसे अच्छी परफॉरमेंस की वजह से मैं हमेशा प्रिंसिपल सहित लगभग सभी टीचर्स की चहेती स्टूडेंट रही हूँ. हाँ, अपवाद स्वरुप एकाध ऐसे टीचर्स भी मिले हैं जिनकी वजह से कुछ कड़वे अनुभव भी रहे हैं. लेकिन मोटे तौर पर मैं यही कहूँगी कि ज्यादातर टीचर्स से हमेशा मुझे प्यार और सम्मान ही मिला है. पर फिर भी मैं यह नहीं कह सकती कि मुझे अच्छे शिक्षक मिलें. क्योंकि टीचर्स का फेवरेट होना आपके अपने गुणों की वजह से होता है. पर टीचर्स आपके फेवरेट बने इसके लिए उनमें वैसे गुण होने चाहिए जो उन्हें एक आदर्श शिक्षक के तौर पर स्थापित करे. वैसे ये मेरे निजी अनुभव है. मैं अच्छी तरह से जानती हूँ कि कुछ शिक्षक बहुत अच्छे होते हैं, जो आपके जीवन की दशा और दिशा दोनों को बदल देते हैं, जिनका आपके जीवन निर्माण में बहुत योगदान होता है, और जिन्हें आप अपनी सफलताओं का मुख्य श्रेय दे सकते हैं. ऐसे अध्यापक जिन्हें मिलते हैं वे सचमुच बहुत भाग्यशाली होते हैं. पर ये भी सच है कि ऐसे शिक्षक कुछ ही होते हैं. 

आज इस विषय पर लिखने की वजह एक खबर थी जिसमें एक 9 वीं क्लास के बच्चे ने अपने एक टीचर की रोज-रोज की डांट और पिटाई से परेशान होकर फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. यह खबर पढ़ते ही मुझे बचपन की एक घटना याद आ गई. बात तब की है जब मैं पहली कक्षा में पढ़ती थी. अपने शर्मीले स्वभाव के कारण मैं ज्यादा बात नहीं करती थी. एक दिन स्कूल में प्रवेश करते समय एक अध्यापिका पास में ही बैठी थी. मुझे ध्यान नहीं रहा और मैं बिना नमस्ते किये आगे बढ़ गयी. आगे जाने पर उन्होंने मुझे वापस बुलाया और एक जोरदार तमाचा मेरे गालों पर पड़ा. मैं कुछ भी समझ नहीं पायी. बाद में पता चला तमाचे का कारण था मेरा नमस्ते ना करना. यूँ तो किसी भी घटना के लिए कई कारक जिम्मेदार होते हैं. छात्र, अभिभावक, शिक्षक सबकी अपनी-अपनी भूमिकाएँ और कर्तव्य है. इन सबके बारे में भी लिखूंगी. लेकिन आज यहाँ बस शिक्षकों के बारे में बात करना चाहती हूँ.

शिक्षकों का छात्रों को पीटना, इसे मैं किसी भी तरह से उचित नहीं ठहरा सकती. अनुशासन और गलती करने पर दंड देने के कई और तरीके हैं. पर यहाँ-वहाँ बेवजह बिना सोचे समझे हाथ उठाना और अपनी भड़ास निकालना बिल्कुल गलत है. अध्यापक का किसी छात्र से द्वेष रखना और बार-बार उसे मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना देना भी एक बहुत बड़ा अपराध है, जिस पर अक्सर किसी का ध्यान नहीं जाता. कई ख़बरें सुनने को मिलती है, जिसमें शिक्षक की पिटाई की वजह से कोई स्टूडेंट बेहोश हो जाता है, किसी के कान का पर्दा फट जाता है, किसी को बुखार आ जाता है, तो कोई आत्महत्या तक कर लेता है. मैं यह नहीं कह रही कि छात्रों की गलती नहीं होती. बेशक उनकी गलती होती है. लेकिन सुधारने के ये तरीके अमानवीय है, क्रूर है, अनैतिक है. 

मैंने ज्यादातर शिक्षकों में पक्षपाती रवैया देखा है. जाति, पारिवारिक संबंधों, सुन्दरता, बौद्धिकता, व्यक्तिगत स्वार्थ, ट्यूशन आदि ऐसे कई कारण हमेशा महसूस किये हैं जिनकी वजह से कुछ स्टूडेंट्स टीचर्स के लिए खास होते हैं और कुछ उन्हें फूटी आँख नहीं सुहाते. मुझे याद है 11 वीं और 12 वीं कक्षा में गणित के एक सर हमेशा बच्चों को ट्यूशन पढ़ने के लिए फाॅर्स करते रहते थे, और जो उनके पास पढ़ने नहीं जाता था, वे पूरे साल उनके पीछे पड़े रहते, उनके मार्क्स काट लेते, उन्हें अपमानित करने और पीटने का कोई मौका नहीं छोड़ते. और यह बात आज भी कई स्टूडेंट्स से कई टीचर्स के लिए सुनने को मिलती है. जब मैं 9 वीं कक्षा में थी तो जिला स्तरीय किसी प्रतियोगिता के लिए मुझसे एक विषय पर 20-30 पन्नों का निबंध तैयार करवाया गया. जिसे मैंने कड़ी मेहनत करके तैयार किया, और फिर वह निबंध मुझसे लेकर उन अध्यापिका ने बड़ी क्लास की अपनी कुछ प्रिय स्टूडेंट्स को यह कहकर दे दिया कि उनका आखिरी साल है इसलिए उन्हें प्रतियोगिता में जाने देना चाहिए. यही बात बेस्ट स्टूडेंट अवार्ड के लिए भी हुई. ऐसे ही क्लास के कई बच्चों के साथ पक्षपाती व्यवहार देखा है. कई बार अच्छी स्टूडेंट होने की वजह से मुझे भी इस पक्षपाती रवैये का लाभ मिला है. लेकिन मैं इसे सही नहीं मानती. एक शिक्षक के लिए उसके सभी स्टूडेंट्स बराबर होने चाहिए. उसका व्यवहार सभी के प्रति न्याय वाला होना चाहिए पक्षपात पूर्ण नहीं. हाँ बस कमजोर, गरीब विद्यार्थियों पर विशेष ध्यान शिक्षा की दृष्टि से दिया जाना चाहिए और उन्हें आगे बढ़ने के अवसर मिलने चाहिए. 

मुझे याद है बचपन में टीचर्स कुछ इंटेलीजेंट बच्चों को चुनते और उनसे बाकी सारे बच्चों की कॉपीज चेक करवाते. कई बार इस तरह कॉपीज चेक की है. यहाँ तक कि पासबुक्स पकड़ा दी जाती और पूरे साल ब्लैकबोर्ड पर उस पासबुक से बाकी बच्चों के लिए आंसर लिखने पड़ते. अपनी पढ़ाई को छोड़कर ये सब काम करना कितना थकाऊ और नीरस होता था इसका अंदाजा है मुझे. इसके अलावा कुछ बच्चों से टीचर्स अपने कई पर्सनल काम भी करवाती थी. यहाँ तक कि कभी-कभी बच्चों से अपना बैग उठवाना, अपनी चेयर्स, ब्लैकबोर्ड आदि साफ करवाना और अपने चाय-नाश्ते वाले कप-प्लेट भी धुलवाये जाते. आज भी यह सब होता है. प्रतिभावान छात्रों द्वारा कमजोर बच्चों की मदद करना गलत नहीं है, स्कूल की साफ़-सफाई में योगदान देना भी गलत नहीं है, लेकिन शिक्षकों द्वारा इस तरह अपनी जिम्मेदारियाँ बच्चों पर थोप देना बिल्कुल गलत है. यह सिर्फ शिक्षकों के आलसी और लापरवाही भरे व्यवहार को दर्शाता है. 

कॉलेज में अच्छे टीचर्स मिले हैं लेकिन बचपन में ज्यादातर ऐसे ही शिक्षक मिले जिन्हें अपने विषय का आधा अधुरा ज्ञान होता था. कुछ टीचर्स किसी स्टूडेंट से रीडिंग करवाकर तो कुछ पासबुक से आंसर लिखवाकर अपने कर्तव्यों की इति श्री समझ लेते थे. एग्जाम की कॉपीज में सही आंसर को गलत, गलत को सही कर देते थे. विरोध तो दूर की बात इस ओर ध्यान दिलाना भी बड़े साहस का काम था. कब टीचर बिगड़ जाए, कब तमाचे पड़ जाए, कब पूरे साल का पंगा हो जाए कुछ पता नहीं. आपसी गप्पों, स्वेटर बुनने, नाश्ते-खाने की बातों से ही टीचर्स को फुर्सत नहीं मिलती थी. हाँ कुछ अपवाद थे, जो अच्छा पढ़ाते थे. पर ऐसे टीचर्स बस अपवादस्वरूप एकाध ही थे. 

शिक्षक की अपने विषय पर अच्छी पकड़, कुशाग्रता और निपुणता होना जरुरी है, ताकि वह छात्रों की समस्याओं और जिज्ञासाओं का निदान कर सके. जरुरी नहीं कि शिक्षक के पास हर जिज्ञासा का तुरंत समाधान हो, लेकिन उसे नया सीखने, सिखाने और विषय के गहन अध्ययन के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए. टालने और जिज्ञासाओं को दबाने वाली प्रवृति नहीं होनी चाहिए. अपनी बात सरल, रोचक और प्रभावी तरीके से कहने का हुनर होना चाहिए. सदियों से चले आ रहे एक ही ढर्रे पर चलने के बजाय शिक्षकों को बच्चों को पढ़ाने के नए-नए रचनात्मक तरीकों पर विचार करना चाहिए. ऐसे तरीके अपनाएं जाने चाहिए जो स्टूडेंट्स में पढ़ाई के प्रति रूचि उत्पन्न करें, उनमें नया सीखने की ललक और उत्साह पैदा करें. कुल मिलकर कक्षा का माहौल उबाऊ और नींद लाने वाला नहीं होना चाहिए. 

कई शिक्षक शुरू में बहुत धीरे-धीरे पाठ्यक्रम करवाते हैं और एग्जाम आने पर धड़ाधड़ पढ़ाना शुरू कर देते हैं. इसके लिए एक्स्ट्रा क्लासेज लेते हैं. किसी को समझ आ रहा है या नहीं, इससे उन्हें कोई सरोकार नहीं होता. बच्चे बेचारे एग्जाम्स की तैयारी करें, ट्यूशन करें, अपना होमवर्क पूरा करें या 2-3 घंटे की एक्स्ट्रा क्लासेज अटेंड करें. इसलिए एक अध्यापक को समय का पाबन्द होना बहुत जरुरी है. समय के साथ उन्हें अपना पाठ्यक्रम पूरा करवाना चाहिए और विद्यार्थियों पर होमवर्क का अनावश्यक भार नहीं डालना चाहिए.

गुरु अगर नम्र है, मृदु भाषी है, बच्चों के प्रति स्नेह रखने वाला है, अपने विषय में पारंगत है, अनुशासन की पालना करने और करवाने वाला है, समय का पाबन्द है, निष्पक्ष है, मार्गदर्शक है, अपने कर्तव्यों के प्रति ईमानदार है तो वह स्वतः ही अपने शिष्यों से सम्मान और आदर पायेगा. सम्मान माँगा नहीं जाता, अर्जित किया जाता है, यह बात एक शिक्षक पर भी लागू होती है. शिक्षक की भूमिका हर एक व्यक्ति के जीवन में महत्पूर्ण है, चाहे वह किसी भी पद पर हो. इसलिए शिक्षकों के कर्तव्य और जिम्मेदारियों का दायरा और भी ज्यादा बढ़ जाता है. एक अच्छा शिक्षक ही देश को अच्छा नागरिक दे सकता है. यह बात शिक्षक को कभी नहीं भूलनी चाहिए और अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों को बखूबी निभाना चाहिए. 

Monika Jain ‘पंछी’

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