Thursday, April 16, 2015

Poem on Seasons in Hindi


पिछले दिनों में प्रेम की रचनात्मकता, प्रेम के सृजन, प्रेम की ऊर्जा से भरी बहुत कविताएं लिखी. आज सोचा देखती हूँ उदासी में कितनी होती है सृजनशीलता. ऋतुओं के बदलने से शायद इतना कुछ नहीं बदलता, जितना बदल जाता है जीवन किसी अपने के बदलने से. मौसम की मार फिर भी सह लेता है तन पर चोट जो लगी हो मन पे, उसे सहना होता है बड़ा मुश्किल. पढ़िए बदलती ऋतु और बदलते रिश्तों की यह कविता. 

Hindi Poem : Season / Climate Change

बदलते मौसम के बदलते रंग 

बदलते मौसम के बदलते रंग 
बदलते तुम और बदलती मैं.

तुम जो गर्मियों में शीतल हवा के झोंके से थे 
आज सूरज का ताप बन झुलसा रहे हो मेरे सपने. 

तुम जो आम सा मीठापन देकर तर कर जाते थे होंठ 
आज ख़ुश्क पपड़ियों से लगे हो उतरने. 

तुम जो सर्द कुहासे में बन जाते थे एक धूप का टुकड़ा 
आज छोड़ गए हो मेरी यादों को जाड़े में ठिठुरने. 

तुम जो कम्बल सी गर्माहट बन देते थे मुझे जीवन 
आज ओलों से बरसकर लगे हो मुझपे गिरने. 

तुम जो बसंत की सरसों बन महक जाते थे मेरी साँसों में 
आज पतझड़ के सूखे पत्ते बन लगे हो झर-झर झड़ने. 

तुम जो घोल जाते थे मेरी आवाज़ में एक सुकून सा सुरीलापन 
आज छोड़ गए हो मेरे शब्दों को बेजुबान हो भटकने. 

तुम जो बरखा की फुहारों से भीगा जाते थे तन-मन को 
आज बन अकाल छोड़ गए बूँद-बूँद को तरसने.

तुम जो कागज की नाव में भी जगा देते थे पार जाने का हौंसला 
आज बाढ़ का बन पानी लगे हो मुझे डूबोने.

तुम जो ओस की बूँद बन चमका देते थे मेरी उम्मीदों के पत्ते 
आज गला कर चल दिए हो मेरी आशाओं के पन्ने. 

बदलते मौसम के बदलते रंग 
बदलते तुम और बदलती मैं.

By Monika Jain ‘पंछी’ 

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