Poem on Attraction in Hindi


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कशिश 

इस कशिश को बस कशिश ही रहने दो 
ना तुम कुछ कहो 
ना मुझे कुछ कहने दो. 
कि अहसासों की स्वीकारोक्ति 
खत्म कर देगी तिलिस्म 
उन खुबसूरत पलों का 
जो जन्म ले रहे हैं 
तेरी-मेरी बातों के बीच. 
कि आगे बढ़ने की चाहत 
कर देगी हमें बहुत दूर 
जहाँ से नामुमकिन होगा वह सामीप्य 
जो दूर रहकर भी 
अब तक होता रहा महसूस. 
कि जिस सुकून की तलाश में 
बढ़ना चाहते हैं कदम 
वह है मृग मरीचिका सा 
जो सिर्फ बढ़ाएगा हमारी बेचेनियाँ 
और भर देगा हमारे बीच 
सदा का खालीपन. 
कि कैसे बताऊँ तुम्हें 
कि इन रंगीन ख्वाबों और अक्सों को 
छूने को जैसे ही बढ़ेंगे हाथ 
बुलबुलों से हो जायेंगे ये अदृश्य 
और रह जायेगी 
फकत बेरंग, उदासीन खामोशियाँ.
मैं नहीं चाहती उस मुस्कुराहट को खोना 
जो रहती है मेरे होठों पर 
जब महसूस होते हो तुम आसपास.
मैं नहीं चाहती उस मीठे इंतजार का कत्ल 
जिसे रहती है हमेशा 
तुम्हारे कुछ कहने की आस. 
मैं नहीं चाहती 
जन्म लें वे अपेक्षाएँ 
जिन्हें पूरा ना कर पाने की मजबूरी 
बिखेर दे हर ओर शिकायतों से भरी एक चुप्पी. 
मैं नहीं चाहती 
कि एक दूसरे को पाने की चाहत में 
हम खो दें सदा के लिए
ये खूबसूरत से अहसास भी 
जो ले आते हैं तुम्हें मेरे दिल के पास. 
कि रहने दो मुझे इस नशे में चूर 
जीने दो बनकर सिर्फ तुम्हारे ख्वाबों की हूर 
कि होती है ख्वाबों की दुनिया अक्सर 
हकीकत से बेहत सुन्दर 
कि झूठ ही सही 
कम से कम यहाँ 
मैं महसूस तो सकती हूँ तुम्हें 
अपनी रूह के अन्दर.

By Monika Jain ‘पंछी’ 

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