Saturday, May 25, 2013

Poem on Broken Dreams in Hindi


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कब तक खुद से दगा करती रहूँ मैं ?
कब तक सपनों में जीती रहूँ मैं ?
अधरों की फीकी मुस्कान के लिए
कब तक अश्कों को पीती रहूँ मैं ?

पलकों में छिपे आंसू पूछते हैं मुझसे
क्यों हमें बहने नहीं देती ?
होठों में छिपा दर्द, पूछता है मुझसे
क्यों मुझे कहने नहीं देती ?

कब तक दिल की आवाज़ अनसुनी करती रहूँ मैं ?
कब तक सपनों में जीती रहूँ मैं ?
अधरों की फीकी मुस्कान के लिए
कब तक अश्कों को पीती रहूँ मैं ?

आंधियाँ आती है, तूफ़ान आते हैं
पलकों में छिपे मोती गिरना चाहते हैं
तड़पती रूह, सिसकती आँहे
हर कदम पे दम तोड़ती मेरी राहें 

कब तक उन राहों को ढूँढती रहूँ मैं ?
कब तक सपनों में जीती रहूँ मैं ?
अधरों की फीकी मुस्कान के लिए
कब तक अश्कों को पीती रहूँ मैं ?

छाया है घनघोर अँधेरा
पास नहीं कोई भी मेरा
घुट-घुट कर जीने को मजबूर
काँपता है ये दिल मेरा

कब तक टूटे दिल की धड़कने सुनती रहूँ मैं ?
कब तक सपनों में जीती रहूँ मैं ?
अधरों की फीकी मुस्कान के लिए
कब तक अश्कों को पीती रहूँ मैं ?

Monika Jain 'पंछी'