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Poem on Nature in Hindi


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खयालों के समंदर में खोयी सोचती हूँ कभी-कभी 
क्यों रौशनी हर रात अंधेरे में समा जाती है ?
क्यों ओस की बूंदे भाप बनकर उड़ जाती है ?
जब लौटना ही है किनारों पे आकर
तो क्यों लहरे बार-बार थपेड़े खाती है?

सवालों के ज़वाब कुछ यूं भी मिलते हैं कभी-कभी

जो न होता अँधेरा तो रौशनी को कौन सराहता ?
जो न उड़ती ओस तो उसकी सुन्दरता कौन निहारता ?
जो न लौट कर आती लहरे किनारों पे फिर से
तो तूफानों में फँसा नाविक हौंसला कहाँ से पाता ?

Monika Jain 'पंछी'

8 comments:

  1. बदरा से बरसी बूंदे, धरती की प्यास बुझाये ,
    सूखे रह गए मेरे नैना , जाने किसकी आस लगाये.
    बहुत कोमल सा अहसास...यह प्यास ही एक दिन मंजिल तक ले जायेगी, मुबारक हो यह आस !

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  2. नैन परिंदों को आपने एक सुंदर काव्यात्मक अभिव्यक्ति दी है। एकाध ज्स्गह को छोड़कर कविता में प्रवाह है।

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  3. इन्द्रधनुष से रंग चुराकर ख़्वाब सजाये सपनीले,
    बदरा संग खेले आँख-मिचौनी ये दो नैन सजीले

    beautifully written nice poem

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  4. i didnt gt my answer but still it was a nice poem awesome

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