Friday, May 10, 2013

Poem on Animal Slaughtering in Hindi


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महावीर जयंती के उपलक्ष्य में अहिंसा को समर्पित मेरी इस कविता का किसी व्यक्ति विशेष या धर्म से संबंध नहीं है. अली शब्द का उपयोग ईश्वर के सभी रूपों के लिए किया गया है. हिंसा चाहे वह किसी भी धर्म का हिस्सा हो और चाहे किसी भी इंसान के द्वारा की जाए ये कविता उसका विरोध करती है. 

धर्म के नाम पर निर्दोष पशुओं की बलि
रज़ा हो नहीं सकती ये तेरी अली

उस निरीह की आँखों मे देखो
जीने का ख़्वाब वहाँ भी पलता है
उस बेबस के दिल मे झाँको
तुम्हारा ख़ुदा वहाँ भी बसता है

दिल के एक कोने में मेरे, टीस सी ये उठ चली
धर्म के नाम पर निर्दोष पशुओं की बलि
रज़ा हो नहीं सकती ये तेरी अली

ये ज़मीं उसकी भी है
आसमाँ उसका भी है
चाँद, सूरज और हवा
सब पे हक उसका भी है

बन के उसके मन की आवाज़, कलम ये मेरी चली
धर्म के नाम पर निर्दोष पशुओं की बलि
रज़ा हो नहीं सकती ये तेरी अली

काट जो देते हो धड़
काँपते नहीं क्या कर
चीख सुनकर उस निरीह की
क्या कुछ भी ना होता असर

जान लेने की रीत ये कैसी चली
धर्म के नाम पर निर्दोष पशुओं की बलि
रज़ा हो नहीं सकती ये तेरी अली

 Monika Jain 'पंछी'