My English Blog : Poems Poetry Rhymes. Send your unpublished creations to p4panchi@gmail.com to get published here.

Poem on Humanity in Hindi


Poem on Humanity in Hindi, Manavta par Kavita, मानवता पर कवितामनुष्यता, Insaniyat Poetry, इंसानियत शायरी, Being Human Slogans, Peace Poems, Humanism, Manushyata Shayari

ना मज़हब की ना भगवान की
ज़रूरत है तो बस इक इंसान की.
गूँज रही चीखों और चीत्कारों को जो सुन पाये
टूट रहे सपनो के टुकड़ो को जो चुन पाये
अंधियारी राहों में खोयी आशाएं जो बुन पाये
ऐसे दयावान की.
ना मज़हब की ना भगवान की
ज़रूरत है तो बस इक इंसान की.
कदम-कदम पे सरहद की दीवारों को जो फोड़ सके
जंग लगे दिल के दरवाजों के ताले जो तोड़ सके
ऐसे ऊर्जावान की.
ना मज़हब की ना भगवान की
ज़रूरत है तो बस इक इंसान की.
इक प्यासे की प्यास बुझाने को जो पानी बन जाये
डूबे सपने पार लगाने को जो कश्ती बन आये
निर्बल का मान बचाने को बन रक्षक जो तन जाये
ऐसे दिल के धनवान की.
ना मज़हब की ना भगवान की
ज़रूरत है तो बस इक इंसान की.
नफ़रत, शोषण, लालच, हिंसा का तांडव जो रोक सके
आतंकवादी राहों पे चलते क़दमों को टोक सके
दहशतगर्दों की दहशत को बन लाठी जो ठोक सके
ऐसे शक्तिमान की.
ना मज़हब की ना भगवान की
ज़रूरत है तो बस इक इंसान की.
निज़ी स्वार्थ की सीमाओं से परे जो सोच सके
खून से लथपथ मानवता के दामन को पौंछ सके
जिससे बिखरी खुशियों को भर सारी दुनिया नाच सके
ऐसे करुनानिधान की.
ना मजहब की ना भगवान की
ज़रूरत है तो बस इक इंसान की.

- Monika Jain 'पंछी'  

5 comments:

  1. really perfect.. main to fan ho gya apka... :)

    ReplyDelete
  2. एक भावपूर्ण आह्वान ..सचमुच इंसान गायब होता गया है तमाम दुनियावी बातों में ...विचारोत्तेजक अभिव्यक्ति!

    ReplyDelete
  3. True, Being a human being is becoming bigger and bigger challenge.

    ReplyDelete
  4. प्रेरणास्पद रचना ...

    ReplyDelete

Due to comment moderation It will take time to publish your comments.Your reactions are my inspiration :)