Poem on Humanity in Hindi


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ना मज़हब की ना भगवान की
ज़रूरत है तो बस इक इंसान की.
गूँज रही चीखों और चीत्कारों को जो सुन पाये
टूट रहे सपनो के टुकड़ो को जो चुन पाये
अंधियारी राहों में खोयी आशाएं जो बुन पाये
ऐसे दयावान की.
ना मज़हब की ना भगवान की
ज़रूरत है तो बस इक इंसान की.
कदम-कदम पे सरहद की दीवारों को जो फोड़ सके
जंग लगे दिल के दरवाजों के ताले जो तोड़ सके
ऐसे ऊर्जावान की.
ना मज़हब की ना भगवान की
ज़रूरत है तो बस इक इंसान की.
इक प्यासे की प्यास बुझाने को जो पानी बन जाये
डूबे सपने पार लगाने को जो कश्ती बन आये
निर्बल का मान बचाने को बन रक्षक जो तन जाये
ऐसे दिल के धनवान की.
ना मज़हब की ना भगवान की
ज़रूरत है तो बस इक इंसान की.
नफ़रत, शोषण, लालच, हिंसा का तांडव जो रोक सके
आतंकवादी राहों पे चलते क़दमों को टोक सके
दहशतगर्दों की दहशत को बन लाठी जो ठोक सके
ऐसे शक्तिमान की.
ना मज़हब की ना भगवान की
ज़रूरत है तो बस इक इंसान की.
निज़ी स्वार्थ की सीमाओं से परे जो सोच सके
खून से लथपथ मानवता के दामन को पौंछ सके
जिससे बिखरी खुशियों को भर सारी दुनिया नाच सके
ऐसे करुनानिधान की.
ना मजहब की ना भगवान की
ज़रूरत है तो बस इक इंसान की.

- Monika Jain 'पंछी'  

5 टिप्‍पणियां:

  1. एक भावपूर्ण आह्वान ..सचमुच इंसान गायब होता गया है तमाम दुनियावी बातों में ...विचारोत्तेजक अभिव्यक्ति!

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  2. True, Being a human being is becoming bigger and bigger challenge.

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