Friday, March 4, 2016

Life Quotes in Hindi

जीवन पर विचार, जिंदगी सुविचार. Life Truth Experience Quotes in Hindi. Changing Status Lines, Statements, Dialogues, Comments, Sms, Proverbs, Slogans, Messages.


Life Quotes
  • 02/03/2016 - समस्त झूठी पहचानों से खुद को मुक्त करके स्वयं को और इस सम्पूर्ण जगत को जीवन के एक अंश के रूप में जब हम देखने लगते हैं तो सब कुछ हमें स्वत: ही जुड़ा हुआ महसूस होने लगता है। उस दिन हम इंसान नहीं रह जाते...किसी देश, धर्म, जाति, क्षेत्र, गौत्र, लिंग विशेष के नहीं रह जाते...हम मात्र जीवन रह जाते हैं।...और जिस दिन हम मात्र जीवन बन जायेंगे, उस दिन मृत्यु का अस्तित्व रहेगा ही नहीं। ~ Monika Jain ‘पंछी’
  • 'मेरा' से 'मैं' तक का सफ़र कुछ जुड़ने का नहीं छूटने का सफ़र है। मेरा घर, मेरी किताब, मेरा पैसा, मेरी दोस्त, मेरा बच्चा, मेरा देश, मेरा शहर, मेरी जाति, मेरा धर्म, मेरा शरीर, मेरे विचार...न जाने कहाँ-कहाँ तक पहुँच जाता है मेरा विस्तार और मेरी पहचान। छोड़ने का मतलब हमेशा सब कुछ त्यागना नहीं होता। छूटना इन तमाम चीजों पर अधिकार, आसक्ति और मोह का छूटना है। छूटना उस पहचान का छूटना है जो हमारी है ही नहीं। छूटने का सम्बन्ध मुख्य रूप से भीतर से है। बाहर तो जब तक जीवन है ज़िन्दगी के रंगमंच पर किरदार निभाने ही होते हैं। ~ Monika Jain ‘पंछी’
  • प्यारे दोस्तों, अक्सर दो चरमों (extremes) के बारे में ही क्यों सोचते हो? भाषा की सीमा है कि वह द्वैत में ही बात करती है। लेकिन समझ के लिए ऐसी कोई सीमा नहीं है। कुछ होने और कुछ न होने के बीच में ही अधिकतर चीजें अलग-अलग जगहों पर विद्यमान होती है। जीवन-मृत्यु, सुख-दुःख, सफ़ेद-काला, प्रकाश-अंधकार दो छोर भले ही हो, लेकिन अधिकांश हिस्सा इनके बीच ही कहीं आता है। ~ Monika Jain ‘पंछी’
  • 03/02/2017 - सिर्फ अधूरी इच्छाएं (अच्छी-बुरी) ही जन्म लेती है। प्रेम तो सदैव अजन्मा और अमर होता है। अपने अहंकार को खाद-पानी देते हम किसी दूसरे अहंकार से नफरत कर सकते हैं, लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि वह दूसरा अहंकार भी हमारी ही किसी अतीत की इच्छा का जन्म है। जिस क्षण हम अखंडित होंगे तभी हमें पता चलेगा कि दूसरा तो कोई होता ही नहीं। हर कदम पर हमारा सामना सिर्फ खुद से ही है। इसलिए समानुभूति के उस स्तर तक पहुँचने के लिए अक्सर मैं ’हम’ या ‘मैं’ शैली में लिखती हूँ। अहंकार के शमन के लिए 'मैं' को 'हम' और 'हम' को 'मैं' बना लेना एक अच्छा तरीका है और दोनों में ही यह जरुरी नहीं कि बात मेरे ही सन्दर्भ में हो। उस समय मन में यह ख़याल नहीं होता कि मूल मुद्दे पर ध्यान नहीं दिया जाएगा बल्कि व्यक्तिगत आंकलन किये जायेंगे, निष्कर्ष निकाले जायेंगे, पूर्वाग्रह पाले जायेंगे। लेकिन समानुभूति से बाहर निकलते ही पता चलता है कि हमारा खंड-खंड जीवन इसी के लिए अभिशप्त है। जितने ज्यादा हम खंडित उतने ही हमारे निष्कर्ष। जब-जब हमारा मन खंडित नहीं होगा, संस्कारों के प्रभाव में नहीं होगा...तब-तब वह सिर्फ प्रेम के बारे में ही सोचेगा। बल्कि सोचेगा क्या ‘प्रेम’ ही होगा। ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • 22/06/2016 - जिजीविषा को बहुत ज्यादा महत्व दिया जाता है। इसे एक प्रेरणास्पद गुण की तरह देखा जाता है। लेकिन जब भी मैं सोचती हूँ कि मेरी जीवेषणा न जाने कितनी मृत्युओं पर खड़ी है तो इस शब्द का आकर्षण एकदम छू हो जाता है। देखा जाए तो यह जीवेषणा सबको मारकर भी खुद को नहीं बचा सकती। पर इसका मतलब यह नहीं कि मैं मृत्यु-एषणा का समर्थन कर रही हूँ। सूक्ष्म रूप में मृत्यु-एषणा सिर्फ वहीं हो सकती है जहाँ सशर्त जीवेषणा है - शर्तें पूरी नहीं हुई इसलिए हमें नहीं जीना।
    यह जानते हुए कि एक समष्टि दृष्टिकोण से पृथ्वी पर जीवन का कोई उद्देश्य नहीं है...यह एक चक्र के सिवा और कुछ भी नहीं...जीने की जद्दोजहद और प्रतिस्पर्धा को इतना अधिक महत्व देना एक भ्रम में जीना लगता है। जीवन एक खेल से ज्यादा कुछ भी तो नहीं। काश! हम इसे बस एक खेल की तरह खेलना सीख पाते। पूर्ण सजगता और भागीदारी से शामिल होते हुए भी अनछुए और गंभीरता से मुक्त। ~ Monika Jain ‘पंछी’
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