Wednesday, May 7, 2014

Poem on Silence in Hindi


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ख़ामोशी क्यों कभी ख़ामोश नहीं रहती ?

ख़ामोशी क्यों कभी ख़ामोश नहीं रहती ?
मन के समंदर में
उठते हैं तूफ़ान
और उमड़ती है अनगिनत लहरें 
किनारों की तलाश में
पर हर लहर को किनारों का
सहारा नहीं मिलता.

खयालों के गणित में
उठते हैं अनगिनत सवाल
अबूझे और असुलझे
जवाबों की तलाश में
पर हर सवाल के नसीब में
सुलझा कोई ज़वाब नहीं होता.

क्यों उलझनों में उलझा मन
सुलझने की चाह में
और उलझ जाता है
क्यों मन की लहरों का तूफ़ान
थमने की बजाय
और उबल जाता है.

खुद जवाब ही कभी कभी
समय के झंझावातों में उलझ
सवाल बन जाते हैं 
लहरों से टकराते-टकराते
सागर के किनारें भी
एक दिन बदल जाते हैं.

इस ख़ामोशी में छिपे हैं 
सेकड़ों अहसास
चाहते हैं बोलना बेहिसाब 
सुबकते हैं, चिल्लाते हैं 
शोर मचाते हैं 
कुछ ना कहकर भी 
कितना कुछ बोल जाते हैं.

दर्द भी है, तकरार भी है 
इस ख़ामोशी में कई चुप्पे 
इकरार भी हैं 
ना जाने कितने महरूम ख़्वाबों की 
ये सख्त पहरेदार भी है. 

कभी छलकती है आँखों से 
कभी होठों पे दम तोड़ जाती है 
कभी तड़पती है बातों में 
कभी कलम से कागज़ पर उतर आती है 
कितना कुछ कहती है ये ख़ामोशी 
फिर भी सदा खुद को बेचैन पाती है. 

तूफ़ान के आने से पहले और 
तूफ़ान के जाने के बाद भी 
अश्कों के बहने के साथ और 
आँखें सूख जाने के बाद भी 
शोर भरे दिन में 
और सन्नाटे की रात में भी 
ना जाने कितना दर्द ख़ामोशी है सहती 
ख़ामोशी क्यों कभी ख़ामोश नहीं रहती ? 

By Monika Jain 'पंछी'

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