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Poem on Environment in Hindi


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रहा ना जल पीने लायक
वायु ना जीने लायक
भूमि भी हो गयी है बंझर
कैसा है ये मंझर ?
कान फोड़ती आवाजों का
फैला घातक शोर
उर्वरकों की बीमारी का
भूमि में है जोर.
पानी बिजली कि बर्बादी
नित बढ़ती ये आबादी
कूड़ेदान बनी ये नदियाँ
कलुषित हुयी ये पूरवईयां.
लुप्त हो रहे वन जंगल
लुप्त हो रहे प्राणी
लुप्त हो रही है नदियाँ
और लुप्त हो रही धानी
जल, वायु और ये भूमि
कुछ भी स्वच्छ अब रहा नहीं
रोग मिल रहे ऐसे-ऐसे
जिनकी कोई दवा नहीं.

- Monika Jain 'पंछी'

1 comment:

  1. Nice poem..
    Can i plsss get slogans in hindi itself..?
    I found some in your poem..but i want more on different types of pollution..!
    PLEASE..I request u...

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