Monday, August 12, 2013

Poem on Independence in Hindi


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यह स्वतंत्रता कैसी है ?
यह कैसी है आज़ादी ?
महंगाई छूती आसमान और
हर पल बढ़ती आबादी.

सरकार देश की ये कैसी ? 
और कैसे हैं ये नेता ?
लूट-लूट कर देश को खाते
फिर भी पेट ना भरता.

खींचातानी भाषाओं की
क्षेत्रवाद का जहर है फैला
आरक्षण का लगता है
नित रोज यहाँ पर मेला.

अपनो ने अपनो को लूटा
गैरों से क्या करे शिकायत
स्वार्थ में भूखे अंधे नेताओं पर
अब है लानत.

माँ के रक्षक बने है भक्षक
कहाँ गुहार लगायें ?
गुलाम हुई अब आज़ादी भी
कैसे इसे छुड़ायें ?

आह गरीबों की सुनने को
यहाँ न कोई अपना
आज़ाद देश की आज़ादी अब
बन कर रह गयी सपना.

Monika Jain 'पंछी'