Hindi Thoughts: Hindi Kahani for Children

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Hindi Kahani for Children


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बात उन दिनों की है जब मैं 7th या 8th क्लास में पढ़ती थी. एक दिन सड़क पर हमउम्र बच्चों के साथ खेल रही थी. पानी की प्यास लगी तो घर की ओर दौड़ कर आई. बरामदे से गुजरते समय पानी के टैंक के पास कुछ अजीब सा काला-काला नज़र आया. पास गयी तो देखा बहुत सारी चींटियों का झुण्ड किसी चीज़ को घेरे हुए था. और नजदीक गयी तो देखा वो तो चिड़ियाँ का नन्हा सा गुलाबी-गुलाबी चूज़ा था जिसके अभी पंख भी नहीं आये थे. शायद कुछ दिन पहले ही जन्म लिया था और चलने की कोशिश में ऊपर के रोशनदान में बने चिड़ियाँ के घोंसले से नीचे घिर गया था. 

एक तो इतनी ऊपर से गिरने पर लगी चोट और दूसरी तरफ इतनी सारी चींटियों का आक्रमण मुझे लगा चूज़ा तो मर चूका है. मैं उदास मन से मम्मी को बताने के लिए उठ कर जाने ही वाली थी कि उस चूज़े कि कुछ हलचल सी महसूस हुई. पहले लगा कि चींटियाँ ही उस मरे हुए चूज़े को हिला रही होगी क्योंकि संघटन में कितनी शक्ति होती है इसकी कहानियां मैं पढ़ चुकी थी. लेकिन ध्यान से देखा तो पता चला कि चूज़ा अभी भी जिंदा था और अपने जीवन की रक्षा का आखिरी प्रयास कर रहा था. 

हमें कभी एक चींटी भी काँट लेती है तो हम तुरंत उसे हटा कर दूर फ़ेंक देते हैं. उस पर वह चूज़ा जिस पर सैकड़ों चींटियाँ चिपकी हुई थी यह दृश्य देखकर मेरा बाल मन विचलित हो गया और उस बच्चे को बचाने के उपाय करने लगी. सबसे पहले तो मैंने फूँक मार मार कर बहुत सारी चींटियों से उस चूज़े का पीछा छुड़ाया. फिर दौड़ दौड़ कर अंदर जाती. कभी गत्ता लेकर आती, कभी रुई तो कभी रुमाल. और डरते-डरते चीटियों को कभी रुई से हटाकर तो कभी गत्ते से चूज़े को इधर-उधर सरकाकर चीटियों को हटाने का प्रयास करती. 

मेरे सर पर बस उस चूज़े को बचाने का जूनून सवार हो गया था पर इस काम में मुझे डर भी बहुत लग रहा था क्योंकि एक तो मैं इतनी छोटी थी ऊपर से चींटियाँ और चूज़ा दोनों कितने ज्यादा नाजुक होते है . कुछ भी करने से पहले ही मेरे हाथ कांपने लग जाते थे. ढेर सारी कोशिशों के बाद अंत में उसके शरीर से सारी चींटियाँ हटाने में मैं सफल हुई. ख़ुशी तो इतनी हुई जैसे युद्ध के मैदान से जीत कर आ रही हूँ. डरते कांपते हाथों से चूज़े को एक गत्ते की सहायता से दुसरे गत्ते पर लिया और उठाकर अपने कमरे में ले आई और स्टडी टेबल पर रख दिया. 

डर के मारे वह नवजात चूज़ा तो एकदम दुबका हुआ था. चींटियों का डर अभी भी उसके दिमाग में घूम रहा होगा ऊपर से वह मुझसे भी डर रहा होगा. मैंने उसका नाम चूंचूं रखा. उसे बचा तो लिया पर अब मेरे सामने नयी चुनौती थी उसे कुछ खिलाने की. पापा बाहर जॉब करते थे वहां नहीं थे ऐसे में कोई ऐसा नही था जो उसे फिर से घोंसले में रख दे. क्योंकि घोंसला बहुत ऊपर था और उसका फिर से गिरने का डर भी था. बाहर जाकर देखा तो वहां कोई चिड़ियाँ भी नहीं थी जो उसे खाना खिला देती. 

मैं रसोई में गयी और एक कटोरी में दूध और एक छोटा सा चम्मच लेकर आई. डरते कांपते हाथों से दूध चम्मच में भरकर धीरे-धीरे उसके मुंह के पास ले गयी. पता नहीं क्यों मेरे हाथ बहुत काँप रहे थे और ऐसा लग रहा था मानो वह दूध तो उसके मुंह तक पहुँचने से पहले ही गिर जायेगा. डरते - डरते मैं चम्मच उसके मुंह तक लेकर गयी पर यह क्या वह तो चम्मच के पास आने पर डर के मारे और दुबका जा रहा था. मैंने कई बार कोशिश की पर उसने मुंह नहीं खोला. दिन भर तो मैं उसे कुछ भी खिलाने में नाकाम रही. शाम को मैं रुई लेकर आई और दूध में डुबोकर उसकी नन्ही सी चोंच पर दूध की बूंदे टपकाने लगी. शायद थोड़ा सा दूध उसकी चोंच के किनारों से उसके मुंह में चला गया था क्योंकि पहली बार उसका हल्का सा मुंह खुला था. पर रुई वाला तरीका मुझे पसंद नहीं आया क्योंकि सारा दूध तो बाहर गिर रहा था. 

मैं फिर से चम्मच से उसे दूध पिलाने की कोशिश करने लगी. अबकी बार थोड़े आत्मविश्वास से चम्मच उसकी चोंच के पास लेकर गयी पर उस चूंचूं के बच्चे ने इतना बड़ा मुंह खोला कि डर के मारे मेरे हाथ से चम्मच ही गिर गया और दूध बिखर गया. चम्मच गिरने कि आवाज़ से डर कर वह पीछे सरक गया.अब मैंने तय किया कि कुछ भी हो जाये चम्मच नहीं छोडूंगी. और इस तरह कई कोशिशों के बाद उसे चम्मच से दूध पिलाने में मैं सफल हो गयी. मेरे लिए तो यह एक खेल तमाशे जैसा था. बार बार उसे कुछ न कुछ खिलाने कि कोशिश करती रहती. कभी दूध, कभी पानी तो कभी पानी में आटा घोलकर ले आती. ३-४ बार उसने खाया पर शायद बाद में उसका पेट भर गया था. और मैं चाहकर भी उसे कुछ और नहीं खिला पायी.

रात को उसे स्टडी टेबल पर रखकर मैं सो गयी. सुबह उठी तो सबसे पहले नज़र टेबल पर ही गयी. पर यह क्या वहां तो चूंचूं महोदय जी ने बीठ ही बीठ कर रखी थी और ख़ुद ना जाने कहाँ ग़ायब थे. मैं डर गयी. नीचे की तरफ नज़र दौड़ाई तो देखा चूंचूं जी तो एक कौने में दुबके हुए थे. मैं उसे गत्ते में उठाकर कमरे से बाहर ले आई. वहां पर एक दो चिड़ियाँ भी थी जो उसे देखकर चीं चीं कर रही थी. मैं वहां से दूर हट गयी. और कुछ देर बाद देखा. चिड़ियाँ अपनी चोंच में कुछ लाती और चूंचूं को खिला कर चली जाती और चूंचूं भी बड़ा बड़ा मुंह खोलकर चीं चीं करके हुए खा रहा था. जब चिड़ियाँ चली गयी तो मैंने भी उसे कुछ खिला दिया हालाँकि जब मैं उसे कुछ खिलाती थी तो गिरता ज्यादा था और वह खाता कम था. पर मुझे उसे कुछ खिलाने में बड़ा मज़ा आता था. और नए नए तरीके ढूंढ़ती रहती उसे कुछ खिलाने के.

स्कूल की छुट्टियाँ थी इसलिए मुझे स्कूल तो जाना नहीं था. पर मैं थोड़ा सा भी इधर-उधर जाती और वह ग़ायब हो जाता. फिर उसे ढूंढ़कर लाती. पूरे दिन उसी में व्यस्त रहने की वजह से मम्मी से डांट भी पड़ी. वो दिन भी चूंचूं के साथ खेलते-खेलते गुज़र गया. अगले दिन जब मैं उसे पानी पिला रही थी तो कुछ पानी उसके ऊपर गिर गया था. सर्दी के दिन थे. मुझे लगा इसे ठण्ड लग जाएगी इसलिए मैं उसे छत पर धूप में ले गयी और बीच में बनी एक दीवार पर रख दिया. और ख़ुद टहलने लगी. कुछ देर बाद सामने से एक गिलहरी आती हुयी नज़र आई. गिलहरी से मुझे चूज़े को कोई खतरा नहीं लगा इसलिए मैंने उसे नहीं भगाया. पर यह क्या? जो मैंने देखा उसके बाद मेरी आँखे खुली की खुली रह गयी. गिलहरी तेजी से दौड़ते हुए चूंचूं के पास आई और उसे मुंह में दबाकर ले गयी. मैं उसके पीछे दौड़ी पर वह दीवारों के सहारे-सहारे ना जाने कहाँ चली गयी. 

मुझे अभी तक भी विश्वास नहीं हो रहा था की जो चूंचूं कुछ देर पहले मेरी आँखों के सामने था अब वह मुझे कभी नज़र नहीं आएगा. दौड़ कर नीचे आई और बाहर चारों तरफ देखा पर ना वो गिलहरी और ना ही चूंचूं कहीं भी नज़र आया. आँखें भीग गयी. मन ही मन ख़ुद पर भी गुस्सा आ रहा था कि चूंचूं को ऊपर लेकर ही क्यों गयी. गिलहरी पर भी बहुत गुस्सा आया और गिलहरी से ये नाराज़गी कई सालों तक रही. रात को बार-बार स्टडी टेबल पर नज़र जा रही थी जिसे चूं चूं ने कितना गन्दा कर दिया था पर वह वहां नहीं था . कमरे के हर कौने में नज़र जाती पर अब चूंचूं कहीं भी दुबका हुआ दिखाई नहीं दिया. आँख से एक आंसू लुढ़क पड़ा और करवट बदल कर सो गयी.

- Monika Jain 'पंछी' 

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