Tuesday, February 25, 2014

Prerak Prasang in Hindi


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(1) 

विश्वास 

अपनी जिज्ञासाओं का समाधान लेने और परामर्श के लिए कई लोग महान संत कन्फ्युशियस के पास आते रहते थे. एक बार राजनीति से सम्बंधित कुछ प्रश्नों पर विचार विमर्श करने के लिए कुछ राजनेता उनके पास आये. एक राजनेता ने पूछा, ‘ सच्चे अर्थों में एक आदर्श शासक कौन हो सकता है ? ‘ प्रश्न के उत्तर में कन्फ्युशियस ने कहा, ‘जिसके पास जनता के पालन-पोषण के लिए पर्याप्त साधन हो, देश की सुरक्षा के लिए पर्याप्त सेन्य बल और शस्त्र हो और जिस पर जनता का पूरा विश्वास हो वही सबसे अच्छा शासक सिद्ध हो सकता है.’ राजनेताओं ने पूछा, ‘इनमें सबसे महत्वपूर्ण क्या है ?’ संत कन्फ्युशियस बोले, ‘ इनमें सबसे महत्वपूर्ण जनता का विश्वास है. अगर शासक के प्रति जनता का विश्वास डगमगा गया तो उसका पतन निश्चित है.’ शस्त्र आदि साधन तो धन से खरीदे जा सकते हैं लेकिन विश्वास सबकुछ न्यौछावर करने पर भी नहीं खरीदा जा सकता.’ राजनेताओं को कन्फ्युशियस की बात समझ में आ गयी.

(2) 

ख़ास मुसाफिर 

भारत में अंग्रेजों के शासन के समय एक बार एक रेलगाड़ी अधिकांशतः अंग्रेज यात्रियों से भरी हुई थी. एक डिब्बे में एक सांवले रंग और मंझले कद का भारतीय गंभीर मुद्रा में बैठा था. अंग्रेज उसे मुर्ख और अनपढ़ समझकर उसका मजाक उड़ा रहे थे. पर उस व्यक्ति ने किसी पर ध्यान नहीं दिया. 

अचानक उस यात्री ने गाड़ी की जंजीर खींच ली. गाड़ी रुक गयी. सभी उसे भला-बुरा कहने लगे. कुछ देर में गार्ड वहां आ गया और उसने सवाल किया, ‘जंजीर को किसने और क्यों खींचा ?’ वह व्यक्ति बोला, ‘ मैंने खींची है क्योंकि मुझे गाड़ी की स्वाभाविक गति में अंतर महसूस हुआ और मेरा अनुमान है कि यहाँ से लगभग एक फलांग की दूरी पर पटरी उखड़ी हुई है.’ 

गार्ड और वह व्यक्ति जब बाहर निकलकर कुछ दूरी पर पहुंचे तो देखा सच में एक जगह रेल की पटरी के जोड़ खुले हुए थे और सब नट बोल्ट बिखरे पड़े थे. दुसरे यात्री भी वहां आ गये. सभी यह देखकर दांग रह गए. सभी ने उस व्यक्ति की अपनी सूझबूझ से सभी की जान बचाने के लिए प्रशंसा की और अपने दुर्व्यवहार के लिए माफ़ी मांगी. जब उस व्यकी से गार्ड ने उसका परिचय पूछा तो उसने बताया, ‘मैं एक इंजीनियर हूँ और मेरा नाम डॉ. एम. विश्वेश्वरैया है.

(3) 

अनमोल सिक्का 

चरखा संघ के लिए धन इकट्ठा करने हेतु गांधीजी देश भर में भ्रमण कर रहे थे. इसी सन्दर्भ में वे ओडिशा में एक सभा को संबोधित कर रहे थे. उनके भाषण के खत्म होने पर एक बूढी महिला जिसके कपड़े फटे हुए थे, बाल सफ़ेद थे, कमर झुकी हुई थी भीड़ में से होते हुए गांधीजी की ओर आ रही थी. गाँधीजी के पास पहुँच कर उसने उनके चरण छुए और फिर अपनी साड़ी के पल्लू में बंधा एक ताम्बे का सिक्का निकालकर गांधीजी के चरणों में रख दिया. गांधीजी ने सिक्का अपने पास संभालकर रख लिया. जमनालाल बजाज चरखा संघ के कोष को संभाल रहे थे. उन्होंने गांधीजी से वह सिक्का माँगा पर गांधीजी ने देने से मना कर दिया. जमनालाल जी जो चरखा संघ कोष के लिए हजारों के चेक संभाल रहे थे हँसते हुए बोले, ‘ आप एक सिक्के के लिए मुझ पर यकीन नहीं कर रहे हैं.’ गांधीजी ने कहा, ‘ यह ताम्बे का सिक्का उन हजारों से बहुत कीमती है. लाखों की पूँजी वाले हजार रुपये देदे तो कोई बड़ी बात नहीं है पर यह सिक्का उस औरत की कुल जमा पूँजी थी. जिसे भी उसने दान दे दिया. उसकी उदारता और बलिदान बहुत बड़ा है इसलिए इस ताम्बे के सिक्के का मूल्य मेरे लिए एक करोड़ से भी अधिक है.

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