Monday, March 3, 2014

Laghu Katha in Hindi


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(1)

विनम्रता 

कटोरी सदा घड़े के ऊपर रखी रहती है, लेकिन वह हमेशा खाली ही रहती है. अपनी रिक्तता पर दुखी होते हुए एक दिन कटोरी ने घड़े से कहा, ‘ आप अपने निकट आने वाले सभी को जल से भर देते हो पर मुझ पर कभी यह अनुग्रह नहीं करते. ऐसा क्यों ?’ 

घड़े ने कहा, ‘ दूसरे सभी विनम्रता झुकते हैं और मांगते हैं लेकिन तुम हमेशा अहंकार से मेरे सिर पर सवार रहती हो. तुम्हें देना भी चाहूँ तो कैसे दूँ ? विनम्रता के बिना कुछ भी तो नहीं मिलता.

Courtesy : स्वाध्याय सन्देश 

(2)

मन का विष 

बहुत समय पहले रंजना नाम की एक महिला श्यामनगर में रहती थी. उसके परिवार में तीन सदस्य थे - वह स्वयं, उसका पति और उसकी सास. रंजना की अपनी सास से बिल्कुल भी नहीं बनती थी. समय के साथ-साथ उनके सम्बन्ध सुधरने की बजाय बिगड़ते गए. एक दिन बात इतनी बिगड़ गयी कि रंजना घर छोड़ कर अपने पीहर चली गयी. 

वह अपनी सास से बदला लेना चाहती थी. इसी इरादे से वह एक वैद्य के पास गयी और बोली, ‘ वैद्य जी, मैं अपनी सास से बहुत परेशान हूँ. मैं जो भी कार्य करूँ उसमें कमी निकालना उनकी आदत बन चुकी है. आप किसी भी तरह मुझे उनसे छुटकारा दिलवा दीजिये.’

वैद्य ने कहा, ‘बेटी, मैं तुम्हारी सहायता करूँगा पर जैसा मैं कहूँ तुम्हें वैसा ही करना होगा, नहीं तो तुम किसी समस्या में फंस जाओगी.’ वैद्य ने उसे कुछ जड़ी-बूटियाँ दी और कहा, ‘ये जड़ी बूटियां धीमे विष का कार्य करती है. इससे व्यक्ति की छह-सात माह में मृत्यु हो जाती है. तुम हर रोज एक पकवान बनाकर उसमें इन्हें मिलाकर अपनी सास को खिला देना. लेकिन इस बीच तुम्हें अपनी सास के साथ अच्छा बर्ताव करना होगा और उनकी सेवा भी ताकि तुम पर उन्हें शक ना हो. नहीं तो तुम पकड़ी जाओगी. अब तुम ख़ुशी-ख़ुशी ससुराल जाओ.’

अगले दिन रंजना अपने ससुराल आ गयी. उसने अपना व्यवहार बिल्कुल बदल लिया. और जैसा वैद्य ने कहा वैसा ही करने लगी. उसे गुस्सा भी आता तो वैद्य की बात याद करके खुद पर नियंत्रण कर लेती. धीरे-धीरे घर का माहौल बदलने लगा. सास जो पहले बहु की बुराई करती फिरती थी अब उसकी तारीफ़ करते ना थकती. रंजना भी नाटक करते करते सच में बदल गयी थी. उसे अपनी सास अब अच्छी लगने लगी थी. छह महीने खत्म होने को थे और उसे अपनी सास की मृत्यु का भय सताने लगा. वह वैद्य जी के पास गयी और बोली, ‘मैं अपनी सास को मारना नहीं चाहती. वे मुझसे बहुत प्यार करती हैं. कृपया ऐसी दवा दे दीजिये जिससे उनपर विष का प्रभाव खत्म हो जाए.’

वैद्य ने कहा, ‘मैंने तुम्हें कोई विष नहीं दिया था. विष तो तुम्हारी सोच में था. सुनकर ख़ुशी हुई कि तुम्हारी सेवा और प्रेम से तुम्हारा मन पवित्र हो गया. अब तुम चिंता मत करो और अपने परिवार के साथ ख़ुशी-ख़ुशी रहो. रंजना ने राहत की सांस ली और ख़ुशी-ख़ुशी अपने घर चली गयी. 

ये लघु कथाएं ( laghu katha ) आपको कैसी लगी ?

Note : The above short stories are not my own creations.