Thursday, January 26, 2017

Moral Thoughts in Hindi

नैतिक विचार, नैतिकता उद्धरण. Moral Thoughts in Hindi for Students. Ethical Education Status, Morality Quotes, Slogans, Messages, Sms, Sayings, Lines, Proverbs. 
Moral Thoughts in Hindi
Moral Thoughts

  • अगर निर्दोषिता के चरम पर पहुँचे सिद्ध जनों और मासूमियत के चरम पर विद्यमान प्रकृति जैसे पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, बच्चों...आदि के समक्ष भी हमारा अहंकार छोटा नहीं पड़ता तो समझो समस्या बहुत बड़ी है...बहुत बड़ी है। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (17/01/2017) 
  • जो प्रेममय होंगे वे दुनिया के किसी भी कोने में हों, वे एक ही बात सोचते हैं, एक ही बात कहते हैं और एक ही बात लिखते हैं। और यह देख और समझ पाने के लिए भी कुछ-कुछ प्रेममय होना जरुरी है। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (26/01/2017)  
  • जो स्वार्थ के सच्चे अर्थ तक पहुँचा, समझो वह परमार्थ को पहुँच गया। क्योंकि स्व और पर तो कभी जुदा थे ही नहीं। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (20/01/2017)  
  • आप मात्र शब्दों की पोटली लेकर घूमेंगे और चाहेंगे कि विमर्श हो...नहीं हो पायेगा। दरअसल वहां चाहत विमर्श की होती भी नहीं, अहंकार बस येन-केन-प्रकारेण जीतना चाहता है। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (24/12/2016) 
  • मुझे आज तक ये नहीं समझ आया कि कर्म, ज्ञान, भक्ति, क्रिया...जितने भी मार्ग हैं इनके समर्थक एक दूसरे का विरोध क्यों करते हैं? किसी भी रास्ते से जाने वाला क्या दूसरे से बच पायेगा कभी? मुख्य बात है खुद से खुद के बीच की दूरी मिटा देने की। अगर वह हुआ और हम प्रेम/परम में अवस्थित हो पायें तो जो भी होगा वह शुभ ही होगा। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (01/01/2017) 
  • अपनी मृत्यु की तैयारी खुद करनी हो, अपने क्रियाकर्म का सामान खुद जुटाना हो और अपनी समस्त धारणाओं को ध्वस्त होते देखने का साहस हो तो मुक्ति हमारे लिये है। लेकिन यह मृत्यु सांसारिक मृत्यु से भिन्न होगी। मुक्ति मृत्यु है उन सब पहचानों की जो हमने दुनिया से इकट्ठा की है। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (16/12/2016) 
  • वास्तव में परमार्थ क्या है, इसे समझने के लिए और इसके होने के लिए बेहद सूक्ष्म दृष्टि चाहिए...बेहद सूक्ष्म। महावीर, बुद्ध, जीसस, नानक, मीरा...जो भी मुक्त हुए उनके पास यही दृष्टि थी। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (14/01/2017) 
  • ज्ञान की सीमा है अपने असीम अज्ञान को जान लेना। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (14/01/2017) 
  • प्रेम तो कुछ ऐसा है कि मेरा बस चले तो मैं आँगन में चलने वाले नन्हें से कीड़े को भी लव लैटर लिख दूँ। :p कित्ता तो प्यारा होता है। <3 ~ Monika Jain ‘पंछी’ (14/01/2017)  
  • कुछ ख़बरों, कुछ घटनाओं और कुछ लोगों पर कुछ नहीं लिखा जाता...शब्द नहीं बनते। बस इतना ही - हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई....न बनों, न बनाओ। इस दुनिया को इंसानों की बेहद जरूरत है। बेहद! ~ Monika Jain ‘पंछी’ (18/12/2014) 
  • सब कुछ इतना सतत और सम्बंधित है कि शब्द और श्रेणियां सब मिथ्या लगने लगते हैं। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (09/01/2016) 
  • कुछ लोग बिना मांगे मदद करने आते हैं और फिर मदद करने की कुछ अप्रत्यक्ष शर्तें भी बताते हैं, और खुद को मददगार भी कहते हैं। भई, चाहे जो हो पर शर्तों वाली मदद तो बिल्कुल भी नहीं चाहिए और ना ही ऐसे मददगार। दुनिया की कोई भी समस्या इतना कमजोर कभी नहीं बना सकती कि दूसरों की उन शर्तों पर मदद लेनी पड़े, जिन्हें मानने को दिल नहीं कहता। फिर चाहे शर्त टिन्नी-मिन्नी सी ही क्यों ना हो। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (02/10/2012)