Poem on Air Pollution in Hindi


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साँसों को भी मिलना मुश्किल
 शुद्ध हवा का झोंका 
विकास और विज्ञान के नाम पर
 कैसा है ये धोखा 
अपना चैन-ओ-अमन हमने 
कैसी आग में झोंका
हे मानव! अपने क़दमों को
 क्यों न तुमने रोका.

कुछ पाने की कीमत कितनी 
बड़ी ये हमने चुकाई है 
खुद अपनी साँसों को जहरीली 
हवा हमने पिलाई है
विज्ञान और विकास की ये 
कैसी आंधी आई है
खुद अपने हाथों ही हमने 
अपनी चिता सजाई है

नित रोज नए रोगों से लड़ना 
है हमको स्वीकार 
लेकिन कभी ना रोकेंगे 
हम विकास की रफ़्तार
प्रदूषण जब तक कर दे ना 
धरती को तार-तार 
तब तक रुकना नहीं हमें 
बिल्कुल भी स्वीकार.

Monika Jain 'पंछी' 

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