Friday, March 29, 2013

Poem on Air Pollution in Hindi


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साँसों को भी मिलना मुश्किल
 शुद्ध हवा का झोंका 
विकास और विज्ञान के नाम पर
 कैसा है ये धोखा 
अपना चैन-ओ-अमन हमने 
कैसी आग में झोंका
हे मानव! अपने क़दमों को
 क्यों न तुमने रोका.

कुछ पाने की कीमत कितनी 
बड़ी ये हमने चुकाई है 
खुद अपनी साँसों को जहरीली 
हवा हमने पिलाई है
विज्ञान और विकास की ये 
कैसी आंधी आई है
खुद अपने हाथों ही हमने 
अपनी चिता सजाई है

नित रोज नए रोगों से लड़ना 
है हमको स्वीकार 
लेकिन कभी ना रोकेंगे 
हम विकास की रफ़्तार
प्रदूषण जब तक कर दे ना 
धरती को तार-तार 
तब तक रुकना नहीं हमें 
बिल्कुल भी स्वीकार.

Monika Jain 'पंछी' 

8 comments:

  1. nice 1..........<3 i love it

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  2. Too good its very nice

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    1. Actually I was not able to understand it was against the air pollution or of favour.............

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    2. all of the students in my class must have copied this one and only poem in this topic.This we have project in this topic

      me Sumiran Modi
      a student of dav rajabagicha

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    3. plz add some more poems on the same topic

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  3. veryyyyyyyyyyyyyyyyyyy gooddddddddddddddddddddddddddd poem

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