Tuesday, December 25, 2012

Story on Moral Values in Hindi



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शिव और पार्वती कैलाश जा रहे थे. मार्ग में गंगा स्नान की भीड़ को देखकर पार्वती बोली - भगवन् ! देखिये , लोग कितने धर्मनिष्ठ और श्रद्धालु हैं. शंकर हँसे और बोले - पार्वती ! सच्ची श्रद्धा तो विरले में ही होती है. ये सभी तो श्रद्धालु कम, दुराचारी ज्यादा हैं. स्नानार्थियों की परीक्षा के लिए दोनों नीचे उतर आये. पार्वती एक ब्राह्मणी का वेश बनाकर खड़ी हो गयी और शंकर ने दीन- अपाहिज के समान रूप बना लिया. जो भी वहां से जाता, पार्वती जी उससे कहती - मेरे अपाहिज पति को गंगा तक पहुंचादो. सहायता की बात तो दूर, सभी वहां से बिदककर निकल जाते. कितने ऐसे भी थे जो पार्वती पर कुदृष्टि  डालते और अपाहिज पति को छोड़ने के लिए कहते. शिवजी पार्वती की और देखते और मुस्कुराते. अंत में एक वृद्ध किसान आया. उसने कहा - मांजी ! आप आगे-आगे चलिए, मैं इन्हें पहुंचा देता हूँ. शिवजी प्रगट हुए और बोले - श्रद्धा यह है. जो लोक सेवा की प्रेरणा न दे वह श्रद्धा  नहीं है. 

Courtesy : स्वाध्याय सन्देश