Saturday, December 29, 2012

Essay on Social Evils in Hindi


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मौत दामिनी की नहीं हुई है, मौत हुई है इंसानियत की। वह इंसानियत जो आज हर गली, हर चौराहे, हर नुक्कड़, हर घर और हर दिल में दम तोड़ती नज़र आ रही है। मैंने कई बार पढ़ा है कि मनुष्य सर्वश्रेष्ठ प्राणी है और मानव जीवन बहुत दुर्लभ  है जो 84 हजार योनियों में भटकने के बाद मिलता है। लेकिन यदि यह तथाकथित सभ्य मानव समाज ऐसा है तो नहीं चाहिए ऐसा दुर्लभ मानव जन्म। 
दामिनी के साथ जो हुआ वह सम्पूर्ण मानव जाति को शर्मसार करता है...... लेकिन मेरी सोच और समझ से बाहर है वे बलात्कार की घटनाये जो अभी भी बदस्तूर जारी है। पिता का बेटी के साथ दुष्कर्म, पड़ोसी का पड़ोसी के साथ दुष्कर्म, 6 महीने की बच्ची का बलात्कार .....क्या हो गया है लोगों को ? 
दो पल की भूख के लिए किसी की जिंदगी नर्क से भी बद्दतर बना देने में नहीं हिचकते । एक छोटी मासूम सी बच्ची जिसे देखकर सिर्फ ममता उमड़नी चाहिए उसे भी अपनी दरिंदगी का शिकार बना देने वाले लोग कौनसी दुनिया के है ? और वो लोग जो ईश्वर को सर्वशक्तिमान मानते है उनका ईश्वर कहाँ छिपा है ? 
कई लोगों से बहस होती है मेरी इस बात को लेकर कि  दुनिया ईश्वर ने बनाई है और जो भी होता है ईश्वर की मर्जी से होता है ...उन सभी लोगों से पूछना है मुझे ...क्या वो ईश्वर कहलाने लायक है जिसकी मर्जी से ये सब हो रहा है ? लोगों के कुतर्कों की फिर भी कमी नहीं ....: कहेंगे की पापों का फल भुगतना पड़ता है। मगर मुझे कोई ये समझाए कि अगर ईश्वर में इतनी ताकत है कि वह किसी के पापों का फल दे सकते हैं तो फिर उनमें क्या इतनी शक्ति नहीं कि वह पाप होने ही न दे ? ईश्वर ऐसा कभी हो ही नहीं सकता। सच तो यह है कि हम इंसान कहें जाने वाले लोग अपनी करतूतों को छिपाने के लिए ऐसे ही घटिया तर्कों का इस्तेमाल करते हैं और जब तक हमारी मानसिकता ऐसे ही संकीर्ण विचारों के इर्द गिर्द घूमेगी तब तक कुछ भी नहीं बदल सकता...कुछ भी नहीं।

Monika Jain 'पंछी'