Thursday, February 9, 2017

Essay on Social Evils in Hindi

समाज सुधार पर निबंध, सामाजिक समस्या लेख. Hindi Essay on Social Evils in Our Society. Reforms Article, Movement Speech, Problems of India Paragraph, Issues. 
Essay on Social Evils in Hindi

सुधार बनाम मानसिकता

(1)

यहाँ हम घर में कुल तीन सदस्य हैं। जब कभी भी घर में किसी को बर्तन साफ़ करने के लिए रखा जाता है तब भी मम्मी और मेरा ख़याल हमेशा यही रहता है कि बर्तन कम से कम हो। अभी जो आती हैं, वे बुजुर्ग हैं तो थोड़ा एक्स्ट्रा ख़याल रहता है। उनका मेहनताना, समय-समय पर दी जाने वाली खाने-पीने की चीजें और पहनने के कपड़े देना ये सब तो बहुत आम सी बातें हैं। मुझे जो चीज अच्छी लगती है वो है मम्मा द्वारा बराबर उनका हालचाल और परेशानियाँ पूछते रहना। उनका हल बताते रहना। एक दिन बर्तन साफ़ करते समय उनके हाथों में हल्की सी खरोंच आ गयी तो मम्मा अपने हाथों से उनको दवाई लगा रही थी और पट्टी बाँध रही थी। मैं सीढ़ियों से नीचे आ रही थी। बात तो यह भी मामूली सी थी लेकिन पता नहीं क्यों उस दृश्य में अद्भुत सा सम्मोहन था। दोनों के एक्सप्रेशन्स देखते ही बनते थे। जैसे माँ-बेटी हों। मेरी आँखें ऐसे दृश्यों के लिए कैमरे का काम करती है। :) कभी-कभी सोचती हूँ : क्रांति और सुधार के हौव्वे से इतर सभी को कितनी छोटी-छोटी सी चीजों को समझ लेने की जरुरत भर है।

By Monika Jain ‘पंछी’
(23/01/2017)

(2)

एक बात जो अक्सर सोचती हूँ कि अच्छे लोग भी हैं, समाज सुधारक भी हैं, फिर भी सुधार हमेशा इतना ज्यादा वक्त क्यों लेते हैं? कुछ अच्छा जल्दी से नज़र क्यों नहीं आता? आदर्श स्थायी क्यों नहीं होते? परिवर्तन इतना बलिदान क्यों चाहता है?

अपने अनुभव से बस इतना ही जान पायी हूँ कि बुराई में प्राय: मतभेद नहीं होते, बुराई की ओर ज्यादातर लोगों का आकर्षण होता है और वो आसानी से विस्तार भी पा लेती है। जो बहुत लालची है, उसके चोर बनने की गुंजाईश हमेशा रहती है। जो क्रूर है, उसके हत्यारा बनने का रास्ता भी खुला है। जिसके मन में नारी के लिए सम्मान नहीं, कल को वो बलात्कारी बन जाए तो आश्चर्य नहीं।

लेकिन अच्छाई का आकर्षण कम है। उसका विस्तार भी कुछ अपवादों को छोड़कर नहीं हो पाता। फिर हर व्यक्ति के लिए इसकी अलग-अलग परिभाषाएं हैं, भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण है। जो सुधार चाहते हैं उनमें मतभेद भी बहुत ज्यादा मिलते हैं। वे कब मनभेद बनकर उन्हें एक दूसरे के ही विरुद्ध खड़ा कर दे पता नहीं चलता। सुधार की इच्छा रखने वालों में अहंकार भी कम नहीं होता। अपना नाम उन्हें बड़ा प्रिय होता है। किसी भी सुधार को हमेशा सुधार चाहने वालों का ही विरोध सबसे पहले झेलना पड़ता है। ये मनभेद, ये अहंकार ही हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है। मतभेदों का तो कोई विकल्प है ही नहीं, पर मनभेद, अहंकार और यश की चाह पर विजय पाना बहुत जरुरी है। सुधार के रास्ते में ये ही हमारे सबसे बड़े दुश्मन है और हमेशा रहेंगे।

By Monika Jain 'पंछी'
(01/03/2013)

(3)

मौत दामिनी की नहीं हुई है, मौत हुई है इंसानियत की। वह इंसानियत जो आज हर गली, हर चौराहे, हर नुक्कड़, हर घर और हर दिल में दम तोड़ती नज़र आ रही है। मैंने कई बार पढ़ा है कि मनुष्य सर्वश्रेष्ठ प्राणी है और मानव जीवन बहुत दुर्लभ है जो 84 हजार योनियों में भटकने के बाद मिलता है। लेकिन यदि यह तथाकथित सभ्य मानव समाज ऐसा है तो नहीं चाहिए ऐसा दुर्लभ मानव जन्म!

दामिनी के साथ जो हुआ वह सम्पूर्ण मानव जाति को शर्मसार करता है...लेकिन मेरी सोच और समझ से बाहर है वे बलात्कार की घटनायें जो अभी भी बदस्तूर जारी है। पिता का बेटी के साथ दुष्कर्म, पड़ोसी का पड़ोसी के साथ दुष्कर्म, 6 महीने की बच्ची का बलात्कार ...क्या हो गया है लोगों को? दो पल की भूख के लिए किसी की जिंदगी नर्क से भी बद्दतर बना देने में नहीं हिचकते।

एक छोटी मासूम सी बच्ची जिसे देखकर सिर्फ ममता उमड़नी चाहिए उसे भी अपनी दरिंदगी का शिकार बना देने वाले लोग कौनसी दुनिया के हैं? और वो लोग जो ईश्वर को सर्वशक्तिमान मानते हैं उनका ईश्वर कहाँ छिपा है?

कई लोगों से बहस होती है मेरी इस बात को लेकर कि दुनिया ईश्वर ने बनाई है और जो भी होता है ईश्वर की मर्जी से होता है...उन सभी लोगों से पूछना है मुझे ...क्या वो ईश्वर कहलाने लायक है जिसकी मर्जी से ये सब हो रहा है? लोगों के कुतर्कों की फिर भी कमी नहीं...कहेंगे कि पापों का फल भुगतना पड़ता है। मगर मुझे कोई ये समझाए कि अगर ईश्वर में इतनी ताकत है कि वह किसी के पापों का फल दे सकते हैं तो फिर उनमें क्या इतनी शक्ति नहीं कि वह पाप होने ही न दे? ईश्वर ऐसा कभी हो ही नहीं सकता। सच तो यह है कि हम इंसान कहें जाने वाले लोग अपनी करतूतों को छिपाने के लिए ऐसे ही घटिया तर्कों का इस्तेमाल करते हैं और जब तक हमारी मानसिकता ऐसे ही संकीर्ण विचारों के इर्द गिर्द घूमेगी तब तक कुछ भी नहीं बदल सकता...कुछ भी नहीं।
 
By Monika Jain 'पंछी'
(29/12/2012)

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