Tuesday, January 22, 2013

Poem on Bachpan in Hindi


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दिन वो मस्त मोला मस्तियों के 
जब खुशियों को हमने पुकारा 
आंसुओं को हमने नकारा.
मस्त रहते अपनी मस्ती में 
चाहे आग लगे बस्ती में.
झूम-झूम कर झूलों की 
मस्ती में आता था सावन 
हर तरफ मिलता था अपनापन 
कुछ इस तरह बीता मेरा बचपन.
पहले खिलौना टूटता था 
तो आंसू आते थे 
आज दिल टूटता है 
तो आंसू आते हैं.
खिलौना तो पापा नया दिलाकर समझा देते थे 
पर अब कौन समझाये 
दिल का ये दर्द किसे सुनाये.
सच बचपन कितना अच्छा था 
बारिश में गीला होना 
दिन भर धूल में खेलना 
बिना किसी चिंता के 
दिन भर घूमते रहना.
माँ को चिंता मेरे खाने की 
बहन को चिंता मेरे पढ़ने  की 
और मुझे पड़ी रहती सिर्फ खेलने की
सच बचपन कितना अच्छा था.

By Vikas Jain