Wednesday, January 25, 2017

Poem on Mehangai in Hindi

बढ़ती महंगाई की मार समस्या पर कविता, आर्थिक असमानता शायरी. Poem on Inflation in Hindi. Dearness Poetry Lines, Economic Development Inequality Slogans, Rhymes. 
Poem on Mehangai in Hindi

हाय! मार गयी महंगाई

जाड़े में ठिठुरता बदन
सड़कों पर अधनंगा तन
बरसात में टपकता छप्पर
बर्तन बिछे हुए फर्श पर।

सब्जी के है भाव चढ़े
पेट्रोल के भी दाम बढ़े
सुरसा सी बढ़ती महंगाई
कौन हनुमान करेगा लड़ाई?

विकास की दर बढ़ाने की बात
गरीब के पेट पर मारकर लात
विश्व के नक़्शे पर चमकने की चाह
आर्थिक असमानता की नहीं परवाह।

ये कैसा झूठा विकास?
तोड़ कर आम जनता की आस
नेताओं की ये बेवफाई
हाय! मार गयी महंगाई।

By Monika Jain 'पंछी'

(22/01/2013)
 
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