Tuesday, January 22, 2013

Poem on Money in Hindi


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काश! हमें भी मिल जाते 
खूब सारे पैसे 
सच हो जाते फिर तो मन के 
सपने कैसे कैसे।
खाते लड्डू, पेड़े, बर्फी 
रसगुल्ले की मिठाई 
चॉकलेट और टॉफी के संग 
करते मौज मनाई।
नए-नए खिलौने लाते 
हम तो करते मस्ती 
हाथ कटोरा लेकर फिर ना 
फिरते बस्ती बस्ती।
कूड़े और कचरे में हम ना 
बचपन अपना खोते 
आधी सूखी रोटी खाकर 
भूखे हम ना सोते।
स्कूल पढ़ने जाते हम भी 
नया-नया बस्ता लेकर 
पढ़ लिखकर बन जाते अफसर 
नहीं मारता कोई ठोकर।
जाते पिकनिक सैर, सपाटा 
कुल्लू और मनाली 
जेबे रहती गरम-गरम 
कभी ना होती खाली।

Monika Jain 'पंछी'