Monday, February 18, 2013

Poem on Air in Hindi


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मैं हवा हूँ 
नहीं रोक सकती मुझे 
तुम इंसानों की बनायी हुई सरहदें 
मैं आज़ाद हूँ 
जिस ओर चाहूँ उधर बहने के लिए 
अपने दिल की हर बात बेख़ौफ़ कहने के लिए  
ये नफ़रत की दीवारें 
जो तुमने बना रखी है अपने चारों ओर 
नहीं छू सकती ये मेरा कोई भी छोर 
मैं आज़ाद हूँ मस्त गगन में घूमने के लिए 
पंछी, नदियाँ और पेड़ों संग झूमने के लिए 
ईर्ष्या, द्वेष और नफ़रत के इन पिंजरों में 
जब तक तुम रहोगे कैद 
तब तक तुम्हारी आज़ादी और गुलामी में 
नहीं रहेगा कोई भी भेद 
क्योंकि आज़ादी को महसूस करने के लिए 
तुम्हें हवा बनना होगा 
दिलों की दरारें भरने की 
तुम्हें दवा बनना होगा

Monika Jain 'पंछी'