Thursday, February 21, 2013

Poem on Fire in Hindi


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कलम से अपनी मैं कागज पर 
आग लिखना चाहती हूँ 
कितनी ताकत है शब्दों में 
आजमाना चाहती हूँ.
चाहती हूँ जल जाये इसमें 
नफ़रत के सारे सौदागर 
चाहती हूँ बन सोना निखरे 
प्यार के है जो ढाई आखर .
चाहती हूँ मैं चिता जलाना 
अन्याय और अनीति की 
चाहती हूँ मैं ज्योत जलाना 
प्यार और प्रीति की.
बरस पड़े अंगारे बनकर 
शब्द मनुजता के दुश्मन पर 
टिम टिम करते तारे बनकर 
भारी पड़े अंधेरों पर.
रोशन कर दे जहाँ जो सारा 
वो दीपक बनना चाहती हूँ 
कलम से अपनी मैं कागज पर 
आग लिखना चाहती हूँ.

Monika Jain 'पंछी'