Saturday, March 2, 2013

Bal Shram par Kavita


Keywords : Bal Shram par Kavita, Poor Children, Lost Childhood, Balsharm Poem, Baal Shramik Poetry, Baal Mazdoori, Bal Mazdoor, Slogans, बाल श्रम पर कविता, बाल मजदूरी, बाल मजदूर, बाल श्रमिक, Child Labour, Shayari, Sms, Messages, Flowers Poems

फूल जो खिले ही थे कुम्हला गए
और कहीं से धूल के कण आ गए
भेंट भ्रमरों से भी तो ना हो सकी 
कोमल ह्रदय पे शूल कैसे छा गए।
दिन तो थे ये बाग़ में महकने के 
पंछियों के संग-संग चहकने के 
बहती हवा के संग-संग बहकने के 
और सूरज की तरह लहकने के
फिर कहाँ से ये अँधेरे छा  गए 
फूल जो खिले ही थे कुम्हला गए।
मासूमियत कहाँ ये इनकी खो गयी 
थी जो बचपन की रवानी सो गयी 
जाने कहाँ मुस्कान इनकी बह गयी 
इक कहानी जो अधूरी रह गयी 
मोड़ ये जीवन में कैसे आ गए 
फूल जो खिले ही थे कुम्हला गए।

Monika Jain 'पंछी'