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Bal Shram par Kavita


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फूल जो खिले ही थे कुम्हला गए
और कहीं से धूल के कण आ गए
भेंट भ्रमरों से भी तो ना हो सकी 
कोमल ह्रदय पे शूल कैसे छा गए।
दिन तो थे ये बाग़ में महकने के 
पंछियों के संग-संग चहकने के 
बहती हवा के संग-संग बहकने के 
और सूरज की तरह लहकने के
फिर कहाँ से ये अँधेरे छा  गए 
फूल जो खिले ही थे कुम्हला गए।
मासूमियत कहाँ ये इनकी खो गयी 
थी जो बचपन की रवानी सो गयी 
जाने कहाँ मुस्कान इनकी बह गयी 
इक कहानी जो अधूरी रह गयी 
मोड़ ये जीवन में कैसे आ गए 
फूल जो खिले ही थे कुम्हला गए।

Monika Jain 'पंछी'


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