Monday, February 22, 2016

Essay on Change in Hindi

Hindi Essay on Be the Change You want to See in the World. Social System Changes Article, Parivartan Paragraph, Badlav Speech, Citizen Responsibility, Society, Samaj Sudhar. परिवर्तन, सुधार, बदलाव.
 
बनों वह बदलाव, जो तुम देखना चाहते हो
 
लेखन कभी मेरा क्षेत्र नहीं था. आज से लगभग तीन साल पहले जब लिखना शुरू किया तब किसी ने कहा, 'तुम्हारे शब्दों में दुनिया को बदलने की ताकत है.' कल फिर किसी ने कहा, 'काश! आप और आप जैसे लोग बच्चों के शिक्षक होते तो यह दुनिया कितनी सुन्दर होती.' ऐसी प्रतिक्रियाएं निश्चित रूप से अनमोल हैं. लेकिन एक चीज हम सब लोगों के लिए समझना बेहद जरुरी है. एक पाठक या एक लेखक की जिम्मेदारी बस यहीं खत्म नहीं हो जाती. बल्कि यहीं से जिम्मेदारियां शुरू होती है. माता-पिता और शिक्षक ये तीन लोग निसंदेह पूरी दुनिया को बेहतर बनाने की ताकत रखते हैं. लेकिन सबसे पहली जरुरत होती है खुद को बेहतर बनाना.
 
कुछ दिन पहले किसी ने कहा, ‘मुंशी प्रेमचंद का ‘हामिद’ दुनिया में कहीं नहीं मिलता।’ क्यों नहीं मिलता? क्योंकि हम हमेशा हामिद की तलाश में रहते हैं। हम कभी भी हामिद बनना नहीं चाहते। हम हमेशा सोचते हैं हमें कहीं कोई महावीर और बुद्ध जैसा दिख जाए, लेकिन हम उनकी राह पर चलने की कोशिश कभी नहीं करेंगे। हम अक्सर अपनी अच्छाईयों की तुलना अपने से कमतर से करेंगे और खुद को बेहतर समझेंगे। लेकिन अगर तुलना करनी भी हो तो हमेशा आदर्श व्यक्तित्व से ही होनी चाहिए। अच्छाई को लेकर हमारी अपेक्षाएं हमेशा दूसरों से जुड़ी रहती है, लेकिन जिस दिन ये अपेक्षाएं खुद से जुड़ जायेंगी, उस दिन दुनिया खुद-ब-खुद अच्छी बन जायेगी।
 
हम भ्रष्टाचार रहित देश चाहते हैं, लेकिन अगर भ्रष्टाचार शब्द का सही अर्थ हमें मालूम होता तो हेलमेट को जानकार घर पर भूल आने के बाद चालान से बचने के लिए ट्रैफिक पुलिस को हम 50-100 को नोट न थमाते। हम हमेशा जगह-जगह गन्दगी फैली होने की शिकायत करते हैं, लेकिन अगर सफाई के मायने हमें पता होते तो प्रकृति को निहारने गए हम, अपने पेट को भरने के बाद बचे प्लास्टिक और पोलीथिन के कचरे को प्रकृति की गोद में न छोड़ आते। हम अच्छी शिक्षा चाहते हैं लेकिन जब कुछ अच्छा पढ़ाया जा रहा होता है, तब भी हम ध्यान नहीं देते क्योंकि हम तो ट्युशन पढ़ने जाते हैं। हम न्याय देखना चाहते हैं, लेकिन अपने पारिवारिक और सामाजिक जीवन में हम न्याय के कितने समर्थक हैं, यह सोचना नहीं चाहते। हम सच का नहीं पैसे और ताकत का समर्थन करते हैं। अपने स्वार्थ के खातिर वृद्ध माता-पिता को वृद्धाश्रम छोड़ आते हैं। अपनी बेटी के लिए जैसे ससुराल की कामना करते हैं, वैसा अपनी पत्नी या बहु को नहीं दे पाते। हमें अपनी माँ, बेटी और बहन की इज्जत बहुत प्यारी है, लेकिन दूसरों की बेटियों और बहनों को हम बुरी नजर से देखना नहीं छोड़ेंगे।

आन्दोलन या क्रांति, ये शब्द कितने अच्छे लगते हैं न हमें? इनका हिस्सा बनकर कितना गर्व महसूस करते हैं हम। न सर्दी देखते हैं, न बारिश। समय की परवाह भी नहीं करते। लेकिन जब बीच सड़क कोई दर्द से कराहता मदद की गुहार लगा रहा होता है तब हम बहरे और अंधे बन जाते हैं। तब हम दुनिया के सबसे व्यस्त इंसान नजर आते हैं।

हमें बेहतर समाज चाहिए, बेहतर न्यायिक व्यवस्था चाहिए, बेहतर सरकार, बेहतर तंत्र, बेहतर शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ, सब कुछ बेहतर चाहिए। लेकिन बेहतरी का यह रास्ता अगर कहीं से शुरू होता है तो हमारे ही भीतर से। पर हम खुद को नहीं बदलना चाहते...तो फिर हम दोयम दर्जे के आत्मकेंद्रित और स्वार्थी इंसान किस मुंह से बदलाव और परिवर्तन की बातें करते हैं?

मुझे याद आते हैं कुछ लोग जो कपड़े समय पर न धुल पाने पर पसीने से तरबतर कपड़ों की सड़ांध से परेशान होकर डीयो या परफ्यूम छिड़ककर खुद को और कपड़ों को सुगन्धित बनाकर बेफिक्र हो जाते थे। बिल्कुल यही...बिल्कुल यही हम अपनी समस्यायों के साथ भी करते हैं। हम समाधान करते हैं और समस्याएं नित नए रूपों में उभरकर सामने आती है। हमें एक परेशानी से निजात नहीं मिलता कि दूसरी परेशानी सर उठाये खड़ी नजर आती है। हमने प्लेग को मात दी तो बर्ड फ्लू का खतरा पैदा हुआ, बर्ड फ्लू को हराया तो स्वाइन फ्लू ने आ झपटा। प्रदुषण, ग्लोबल वार्मिंग, गरीबी, बेरोजगारी, बलात्कार, चोरी, महंगाई...हमारे पास समस्यायों के भंडार हैं। समस्यायों पर ढेरों चर्चाएँ होती है, पर समाधान? क्या सच में हम समाधान ढूंढते हैं? हम सिर्फ सतही बातें करते हैं। हम जानते हुए भी यह स्वीकार नहीं करते कि दुनिया की अधिकांश समस्याएं वैचारिक प्रदूषण से उपजी है। और यही वैचारिक प्रदूषण नित नयी-नयी समस्यायों के रूप में हमारे सामने आता है। जब तक हम सबने अपने मन को शुद्ध करने के प्रयास शुरू नहीं किये तब तक समस्यायों से मुक्ति एक दिवा स्वप्न है।

गरीब अमीर बन जायेंगे, अमीर गरीब बन जायेंगे...नौकर मालिक की जगह पा लेगा, मालिक नौकर की...सवर्ण दलित बन जायेंगे, दलित सवर्ण...महिलाएं पुरुष की जगह पा लेगी और पुरुष महिलाओं की...पर समानता या समाधान तब तक दिवा स्वप्न रहेगा, जब तक हमारे मन से मालकियत, नियंत्रण, अहंकार और स्वार्थ की अति खत्म नहीं होती, जब तक हम अपने मन का कचरा साफ़ नहीं करते, जब तक हम दूसरों के साथ वैसा व्यवहार नहीं करते जैसा हम खुद के साथ चाहते हैं. जब तक हम वह बदलाव नहीं बनते जो हम देखना चाहते हैं.
 
By Monika Jain ‘पंछी’
 
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