Tuesday, March 12, 2013

Ishwar par Kavita


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लहरें ( Hindi Version By Kuldip Singh Bagga & Balwant Singh Bagga)

परमात्मा है हर लहर में मगर 
लहर में उसे देखने वाली नहीं कोई नज़र 

सागर की यह लहर सागर को हिलाती है
सोई ज़िन्दगी सागर की लहर ही जगाती है
मैल-झाग समेट कर किनारे पे बिछाती है
सागर की गहराहियों से मोती ढूंढ लाती है
सागर की यह लहर सागर ही तो है मगर 
लहर में उसे देखने वाली नहीं कोई नज़र

चाँद की यह लहर चांदनी बिछाती है 
कूचे हर कोने में झांक के इठलाती है
चकोर के रूठे हुए हृदय को रिझाती है
सरोवर और आकाश में एक नज़र आती है
चाँद की यह लहर चाँद ही तो है मगर 
लहर में उसे देखने वाली नहीं कोई नज़र

मेघ की यह लहर घटा घूर-घूर आती है 
पपीहे से आलाप, नाच मोर से कराती है 
सुहागनों को झूलों में बिठाल के झुलाती है
तप्ती हुई धरती को सुकून पहुँचाती है 
मेघ की यह लहर मेघ ही तो है मगर
लहर में उसे देखने वाली नहीं कोई नज़र

पवन की यह लहर मंद-मंद आती है 
फूल, बेल पत्तियों को नाच यह नचाती है 
सुगंधी की झोलियाँ भर-भर लाती है 
तप्ते हुए हृदयों को सुकून पहुंचाती है 
पवन की यह लहर पवन ही तो है मगर 
लहर में उसे देखने वाली नहीं कोई नज़र 

फूल की यह लहर फूल को खिलाती है 
खिले हुए फूल की सुगंधी को लुटाती है 
भंवरे और बुलबुल को आशिक बनाती है 
बड़े-बड़े मानियों की भेंट बन जाती है 
फूल की यह लहर फूल ही तो है मगर 
लहर में उसे देखने वाली नहीं कोई नज़र 

जीव की यह लहर जब जीव को हिलाती है
जीव को हिलाए लहर नम्र भाव पाती है 
नम्र-नम्र भाव, लहर सहज पद पाती है 
सहज पद पाए लहर ब्रह्म बन जाती है
जीव की यह लहर ब्रह्म ही तो है मगर 
लहर में उसे देखने वाली नहीं कोई नज़र