Thursday, March 7, 2013

Poem on Aam Aadmi in Hindi


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सपनों को बेच खरीदी हमने सुविधा  
पर मन में बनी रही सदा ही दुविधा 
हम भी कुछ अनगढ़ा तराश सकते थे 
इस जग में खुद को तलाश सकते थे। 
रोजी-रोटी के खातिर, जो पथ हमने अपनाया
रहे ढूंढ़ते खुद को लेकिन, कहीं ना हमने पाया 
स्वादरहित जीवनचर्या और खालीपन है आया 
जबसे जीवन यापन का, यह क्रम हमने अपनाया।
दफ्तर की सीढ़ी चढ़ते-चढ़ते, बीत गया जीवन सारा 
लेकिन इतने वर्षों में भी, मिला ना कोई किनारा 
आज भी भरते रहते हैं, दफ्तर के कोरे कागज 
अंत में जबकि मिलने हैं, बस जमीन के दो गज।
'हम भी कुछ हैं' ये भ्रम, हमनें भी कभी पाला था 
इतिहास में अंकित होने का, सपना हमनें पाला था 
अगर ना करते हम अपने, ख्वाबों से कोई समझौता 
तो निश्चय ही जीवन अपना, कितना सुन्दर होता।

Monika Jain 'पंछी'