Wednesday, March 20, 2013

Poem on Cow in Hindi


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हे मानव! 
क्या मुझे माँ इसलिए कहते हो 
ताकि जब तक देती हूँ मैं दूध 
देते हो मुझे अपने आँगन का छप्पर 
और जब नहीं देती दूध तो 
दिखा देते हो मेरी जगह सड़क पर।

घुमती हूँ जहाँ आवारा पशु बनकर 
भरती हूँ पेट कागज और पोलिथिन खाकर 
सहती हूँ सर्दी की ठिठुरन और गर्मी की मार 
बारिश में भी नहीं खुलता, इस माँ के बेटे का द्वार।

ले जाते हैं मुझे क़त्ल खाने में 
और मार देते हैं मुझे बेरहमी से 
फिर खाते हैं मेरा गोश्त 
मेरे ही बेटे बेशर्मी से।

मत कहो मुझे माँ 
हे स्वार्थी मानव !
तुम नहीं बन सकते किसी के बेटे 
तुम हो बस एक दानव। 


Monika Jain 'पंछी'