Sunday, March 3, 2013

Poem on Village in Hindi


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गाँव से शहर को आये 
बीत गये हैं कई वर्ष 
पर आज तक ना मिल सका
 गाँव जैसा स्पर्श।
गाँव की धूप में भी ठंडक का वास है  
शहर की छाँव में भी जलन का अहसास है।
गाँव में बहा पसीना भी महकता है 
शहर का सुगन्धित इत्र भी दहकता है।
गाँव के कण-कण में बिखरा है अपनापन 
शहर की भीड़ में भी खा रहा अकेलापन।
गाँव की सौंधी मिट्टी में बचपन की जान है 
शहर के महंगे खिलौने बड़े बेईमान है।
गाँव के तालाब में अक्स देख हम संवर जाते हैं  
शहर के चमकीले आईने अक्सर धोखा दे जाते हैं। 
काश! लौट पाना होता मुमकिन 
तो दौड़ आता गाँव में 
नींद आती सालों बाद 
पीपल की छाँव में।

Monika Jain 'पंछी'