Saturday, May 18, 2013

Essay on Blind Faith in Hindi


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हमारे देश में मंदिरों में भगवान की मूर्ति को स्नान कराने के लिए दूध, दही, घी, पानी  आदि का उपयोग किया जाता है जो अंततः नालियों की शोभा बनता है। हमारे देश की नालियाँ तो उन गरीब बच्चों से भी कई ज्यादा भाग्यशाली है जिन्हें दो वक्त का खाना भी नसीब नहीं होता। फिर 35 रुपये लीटर का दूध, 400 रुपये किलो का घी, दही आदि तो उनके लिए दिवा स्वप्न सा ही है। 

देश में करोड़ों लोग गरीबी, भूखमरी और कुपोषण के शिकार हैं। इस बात को नजरंदाज कर मंदिरों में दूध, दही , घी की नदियाँ बहाने वाले महान भक्तों से मैं पूछना चाहती हूँ कि क्या उन्हें सच में ऐसा लगता है कि वो कोई अच्छा काम कर रहें हैं जिससे प्रसन्न होकर भगवान उनकी मनोकामनाएं पूरी करेंगे। अगर उन्हें ऐसा लगता है तो फिर उनसे बड़ा मुर्ख और कोई नहीं। 

मेरी नज़र में उनका यह कृत्य अमानवीय है। दूध, दही, घी और अन्य खाने की उपयोगी वस्तुओं का इस तरह व्यर्थ उपयोग जो लाखों लोगों के जीवन को बचाने में काम आ सकती थी, एक घोर अपराध है। बेहतर होता अगर भगवान के नाम पर ही ये चीजे जरुरतमंदों में बाँट दी जाती। 

Monika Jain 'पंछी'