Wednesday, May 29, 2013

Poem on Condition of Woman in Society in Hindi


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जिंदगी के हाशिये पे आज जो खड़ी, वो नारी है 
उसको यहाँ तक पहुँचाने में 
जाने-अनजाने हम सभी जिम्मेदार हैं 
सिर्फ ऐसा कहती दुनिया सारी है 
जिंदगी के हाशिये पे आज जो खड़ी, वो नारी है 

घर में रहना, चुपचाप सब कुछ सहना 
उसकी नियति है, उसका धर्म है 
चुल्हा-चोका, बर्तन, बस यही तो उसके कर्म है 
जीवन के इस दांव में, सबकुछ वो हारी है 
जिंदगी के हाशिये पे आज जो खड़ी, वो नारी है 

दिन में काम, रात को काम 
उसको नहीं कभी चैन आराम 
परिवार में सबको खुश रखना 
उसकी ही जिम्मेदारी है 
जिंदगी के हाशिये पे आज जो खड़ी, वो नारी है 

सबकी सेवा वह करती 
सबका रखती है वो ध्यान 
हरपल सहती खुद अपमान 
कभी नहीं कहता कोई उसको सॉरी है 
जिंदगी के हाशिये पे आज जो खड़ी, वो नारी है 

दिन के उजाले में उसकी 
तारीफ करने से सभी डरते हैं 
छुप-छुप कर रातों को कहते 
तू कितनी प्यारी है 
जिंदगी के हाशिये पे आज जो खड़ी, वो नारी है 

यह मतलबी स्वार्थी, मर्दों की दुनिया है 
यहाँ न्याय और समानता महज इत्तेफाक है 
नारी अस्तित्व की बात करना एक मजाक है 
घुट-घुट कर जीवन जीना उसकी लाचारी है 
जिंदगी के हाशिये पे आज जो खड़ी, वो नारी है 

पढ़ने में, उसके आगे बढ़ने में 
बाधक रहें हैं सब, किस्मत उसकी गढ़ने में 
जिस राह पे चलती है वो 
वह रही सदा दोधारी है 
जिंदगी के हाशिये पे आज जो खड़ी, वो नारी है

बेटा न जन पाने का ताना 
रिश्तेदार और पड़ोसियों ने साधा 
सबसे ज्यादा उस पर निशाना 
ये दोषी, अक्षम, धरती पर बोझ भारी है 
जिंदगी के हाशिये पे आज जो खड़ी, वो नारी है

कुछ लेनदेन की अगर हो बात 
तुझे देने को बढ़ते ना हाथ 
मिलता भी है तो हर बार 
अंत में आती बारी है 
जिंदगी के हाशिये पे आज जो खड़ी, वो नारी है

माना की वह आगे बढ़ रही है 
अपनी किस्मत अपने हाथ गढ़ रही है 
फिर भी उसके पास बची 
अभी बहुत लाचारी है 
जिंदगी के हाशिये पे आज जो खड़ी, वो नारी है

नारी लक्ष्मी है, नहीं है शक 
पर नारायण मिला नहीं उसे आजतक 
जग का कल्याण तू ही करेगी 
तू दानी अवतारी है 
जिंदगी के हाशिये पे आज जो खड़ी, वो नारी है

तू उजाला है, नहीं है अन्धकार 
तू ही करती सबकी नैया पार 
हिम्मत मत हार 
एक दिन होगी तेरी जय-जयकार 
तू ही शुभ फलदायी, ओमकारी है 
जिंदगी के हाशिये पे आज जो खड़ी, वो नारी है

Anil Kumar Bihari