Tuesday, May 28, 2013

Poem on Self Realization in Hindi


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जिन्दगी की राह पर चलते हुए 
लगता है जैसे 
छल रहें हैं ये रास्ते 
हर रास्ते के अंत में खड़ा है 
एक और रास्ता 
क्या चल रही हूँ मैं आइनों में ?
या भटक गयी हूँ अपनी मंजिल से ?
कितना भी चलूँ 
वहीँ पहुँच जाती हूँ 
जहाँ से हुई थी कभी शुरू 
क्या मुमकिन होगा कभी ?
कि बना पाऊं एक नया रास्ता 
जो ले चले पार सारी उलझनों से 
और बचा ले मुझे दुनिया के भ्रमों से 
काश! दर्पणों का ये मायाजाल 
तोड़ पाती मैं 
काश! मोह का ये भ्रम जाल 
छोड़ पाती मैं 
काश! पहुँच पाती उस रास्ते पर 
जहाँ से खुद को खोज पाती मैं

Monika Jain 'पंछी'