Sunday, June 23, 2013

Poem on Flood in Hindi


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ये बाढ़ के पानी की प्यास 
पी गयी है ना जाने कितनों को 
और प्रकृति का ये कहर 
लील गया है जाने कितने सपनों को 

मंझर ये तबाही का
अब देखा नहीं जाता 
ऐ बादल! क्यूँ इतना सारा 
पानी तू है बरसाता 

खेर! दोष और शिकायत का 
ये वक्त नहीं है 
यहाँ भी राजनीति की रोटियां सेकना 
कहाँ तक सही है ?

मुश्किलों में जो फंसे हैं 
उन्हें सहने की शक्ति मिल सके 
हर संभव मदद हमारी 
उन लोगों तक पहुँच सके 

जिन्दगी कोई ना खोये 
 कोशिश बस ये करनी होगी 
आपसी सहयोग और एकता से ही 
अब ये  मुश्किल हल होगी


Monika Jain 'पंछी'