Saturday, June 15, 2013

Poem on Society Today in Hindi


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आज का आदमी काम से नहीं, दाम से मतलब रखता है 
आज का आदमी दान से नहीं, नाम से मतलब रखता है 
शरीर की चमक से अब आत्मा धुंधली हो गयी है बन्धु 
आज का आदमी गुठली से नहीं, आम से मतलब रखता है। 

आज खरा सोना भी शक की नजर से देखा जाता है 
आँखों देखे हाल पर भी विश्वास नहीं आता है 
संदेह का समीकरण सही है या गलत कैसे जानें बन्धु 
आदमी औरों से तो क्या, अपने आपसे धोखा खाता है।

सुन्दरता का प्रतीक कमल, कीचड़ से रंगा होता है 
तेजस्विता का प्रतीक कनक, सुहागे से चंगा होता है 
किसी के बाह्य स्वरुप को देख, पागल मत बनो बंधु 
परिधान के अन्दर हर एक आदमी नंगा होता है।

गलतियाँ आदमी को संभलने का मौका देती है 
युक्तियाँ आफत से बच निकलने का मौका देती है 
आवश्यकता है आदमी इन बातों को आचरित करे 
सूक्तियां सन्मार्ग पर चलने का मौका देती हैं। 

आदमी ही आदमी को भिखमंगा बना रहा है 
कभी बिल्ला तो कभी उसे रंगा बना रहा है 
धरती को माँ, उसने माना है सदा ही 
पर वृक्ष काट उसको वह नंगा बना रहा है। 

राष्ट्रसंत, प्रवर्तक श्री गणेश मुनिजी शास्त्री