Saturday, August 10, 2013

Poem on Aaj ki Nari in Hindi


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मैं शादी में विश्वास करती हूँ 
पर शादी की प्रमाणिकता के लिए 
अपनी मांग में सिन्दूर 
गले में मंगलसूत्र
हाथों में चूड़ियाँ 
पाँव में पायल और 
बिछिया पहनने में नहीं।

ये शृंगार के लिए पहने जाए 
इसमें मुझे आपत्ति नहीं 
पर शादी के नाम पर 
इन्हें थोपा जाए 
ये मुझे मंजूर नहीं।

बेटी को जायदाद में 
बराबर का हक़ मिले 
इसमें मेरा विश्वास है 
पर शादी के नाम पर 
होने वाले लेनदेन और 
दहेज़ में नहीं।

जीवनसाथी के प्रति 
सम्मान को मैं जरुरी मानती हूँ 
पर अपने पति को 
नाम से ना बुला सकने के 
रिवाज को नहीं।

पति की लम्बी उम्र 
कौन नहीं चाहेगी ?
पर इसके लिए किये जाने वाले 
व्रत और उपवास में 
मेरी मान्यता नहीं। 

परिधान में शालीनता की बात 
मैं अवश्य मानती हूँ 
पर शादी के बाद ससुराल में 
साड़ी ही पहनी जाये 
ये बिल्कुल भी नहीं।

संयुक्त परिवार
आपस में प्यार 
हर रिश्ते को दिल से अपनाना 
अपने सभी कर्तव्यों को निभाना 
त्याग और समर्पण की भावना 
परिवार को एक सुत्र में बांधना 
इन सबमें  विश्वास करती हूँ 
पर बेवजह की परम्पराओं को 
ढ़ोने में नहीं। 

क्योंकि में आजादी का हक़ चाहती हूँ 
बहु नहीं, मैं एक बेटी बनना चाहती हूँ।

Monika Jain 'पंछी'