Saturday, August 31, 2013

Poem on Religion in Hindi


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जब से धर्म ने लिया है व्यापार का स्वरुप 
बन गया है ये बेहद कुरूप।

अपराधियों की ढ़ाल बन बैठा है 
बाबाओं का माल बन बैठा है 
चूस कर मासूमों  का खून 
 मानवता का काल बन बैठा है।

धर्म की आड़ में हो रहे सब बुरे काम हैं 
मनमानी करने के भी क्या खूब इंतजाम हैं 
छीन कर आम जन का सुख और चैन 
ढोंगी बाबाओं को आराम ही आराम है।

अंध भक्तों का भी ज़वाब नहीं 
उनके अंधविश्वासों का कोई हिसाब नहीं 
खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना 
हकीकत है ये कोई ख़्वाब नहीं।

धर्म का चोला पहन अधर्म बोल रहा है 
पैसों में भावनाओं को तौल रहा है 
इतना सब कुछ हो रहा पर 
खून किसी का ना खोल रहा है।

Monika Jain 'पंछी'