Friday, September 6, 2013

Essay on Independence Day in Hindi


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मुझे याद है बचपन में जब भी 15 अगस्त आने वाला होता था तो मैं खासा उत्साहित रहती थी। तब तो बस एक दम साफ़ सुथरी चमकती हुई यूनिफार्म पहनकर, रिबिन लटकाकर, पीटी, परेड में हिस्सा लेना या पारंपरिक वेशभूषा पहन कर किसी सांस्कृतिक प्रोग्राम में प्रस्तुति देना, पढ़ाई और भारी बस्ते से मिलने वाली छुट्टी, ग्राउंड में घूम-घूम कर अमरूद और चाट-पकोड़ी खाना यही बस मेरे लिए स्वतंत्रता दिवस के मायने थे। विविध प्रतियोगिताओं और पढ़ाई में अव्वल आने के लिए हर साल मिलने वाले ईनामों की वजह से यह दिन मेरे लिए बड़ा रोमांचकारी होता था और मुझे इस दिन का बेसब्री से इंतजार रहता था।  तब आज़ादी के सही मायने कहाँ पता थे ? 

जैसे-जैसे बड़ी हुई आज़ादी के इस उत्सव के प्रति रोमांच और उत्साह धीरे-धीरे जाता रहा। हाँ बस सुबह से ही सुनाई देने वाले देशभक्ति गीतों की स्वरलहरियों की वजह से मन देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत जरुर हो जाता है। पर देश के ताजा हालातों के बारे में सोचकर कई सवाल खड़े हो जाते हैं इस तथाकथित आज़ादी को लेकर। 

देश में हो रहे नित नए कांडों के  बारे में पढ़ती हूँ, सुनती हूँ तो सोचती हूँ जिन देशभक्तों ने हमें आज़ादी दिलाने के लिए अपनी जान की भी परवाह नहीं की, ना जाने कितनी यातनाएं सही उनके बलिदानों का क्या खूब मखौल उड़ाया है हमने। आज़ादी है लेकिन बलात्कारियों को बलात्कार करने की, आज़ादी है भ्रष्टाचारियों को गरीब के पेट पर लात मार अपनी जेबें भरने की, आज़ादी है पाखंडियों को धर्म की ए बी सी डी ही बदल देने की, आज़ादी है आतंकवादियों को लाखों निर्दोषों की जान लेने के बाद भी खुले आम घुमने की, आज़ादी है अपराधियों को सत्ता में रहकर हम पर शासन करने की.. अगर आज़ादी नहीं है तो बस अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने की और ईमानदार बनकर सुख-चैन से जीवन जीने की। 

जो चीज़े बिना किसी यत्न के आसानी से मिल जाती है उनकी क़द्र नहीं होती शायद यही वजह है कि स्वतंत्रता सेनानियों के रक्त से रंजित इस स्वतंत्रता को हम सही मायनों में संभाल नहीं पाए। और यह आज़ादी बनाम स्वछंदता बस राजनीति, धर्म, अपराधियों, पैसे, पद और कानून के ठेकेदारों की दासी बनकर रह गयी है। 


Monika Jain 'पंछी'