Friday, September 13, 2013

Poem on Crime in Hindi


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चलो हो गयी फांसी की सजा 
खुश हूँ कि इस धरती से 
चार दरिंदों का बोझ 
कम हो जायेगा.
पर कुकुरमुत्तो की तरह 
उग आये बलात्कारियों 
के मन में ये फैसला 
क्या कोई खौफ जगा पायेगा?

ना जाने कितने बलात्कार है ऐसे 
जिनकी चीखे बंद दीवारों में 
कैद होकर रह जाती है 
और ना जाने कितने मासूम हैं ऐसे 
जिनकी रूह को 
हर रोज सजाये मौत दी जाती है. 

सिर्फ एक फैसलें में सजाये मौत 
ऊँट के मुंह में जीरे सी अटक रही है 
ना जाने कितने दरिन्दे 
घूम रहें हैं खुलेआम 
बस यहीं बात मुझे 
दिन-रात खटक रही है. 

सिर्फ फांसी समस्या का 
पूर्ण समाधान नहीं है 
जब तक ना बदलेगी मानसिकता 
तब तक अपराधों पर 
कोई लगाम नहीं है. 

सबसे पहले बदल डालो
ये महज़ डीग्रीयां देने वाली पढ़ाई
जिसने साक्षर कर दिया सबको 
पर इंसान को इंसान तक ना बना पाई.

मेरे देश के पिता और माताओं 
तुम भी कुछ अपनी भूमिका निभाओं 
भेद ना करो अपने बच्चों में 
और बचपन से ही 
संस्कारों की पौध उगाओं. 

नेता, पुलिस और 
कानून के ठेकेदारों 
जरा तुम भी लाज खाओं 
अपने पेशे और पद को 
अब इतना भी ना लजाओं.
इन्साफ करों अपने पद 
और कुर्सी के साथ 
मरने से पहले थोड़ा पून्य
तुम भी कमा कर जाओ. 

Monika Jain 'पंछी'