Thursday, May 30, 2013

Essay on Ideal Student in Hindi



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एक इंसान चाहे कुछ भी बन जाए। कोई भी उपलब्धि पा ले और किसी भी पद पर पहुँच जाए पर रहता हमेशा वह विद्यार्थी ही है क्योंकि सीखने की प्रक्रिया तो कभी खत्म होती ही नहीं। वह तो अनवरत जारी रहती है।

आदर्श विद्यार्थी पर लिखने की बात है तो यूँ तो इस विषय पर हमें स्कूल की पाठ्य पुस्तकों, नैतिक शिक्षा की किताबों, इन्टरनेट आदि पर काफी कुछ मिल जाएगा। बचपन में भी अध्यापकों और माता- पिता से इस सन्दर्भ में कई निर्देश हमें मिलते थे। इसलिए उन सब बातों पर चर्चा नहीं करुँगी। हाँ, एक बात जो मुझे सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण लगती है वही यहाँ मैं कहना चाहती हूँ। 

एक विद्यार्थी के लिए बहुत जरुरी है कि वह जो भी पढ़ रहा है उसे मात्र अपने लक्ष्य की प्राप्ति का साधन ना माने। क्योंकि ज्ञान अपने आप में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। इसलिए जो हम पढ़ते हैं उसे कोई परीक्षा पास करने या डिग्री पाने का साधन मात्र मानना एक बहुत बड़ी गलती है। आप अपनी अंग्रेजी सुधारने के लिए इंग्लिश नोवल्स पढ़ना शुरू करते हैं और सिर्फ अंग्रेजी सुधारने का लक्ष्य लेकर ही इन्हें पढ़ते हैं तो यह उचित नहीं होगा। 

बहुत जरुरी है जो भी आप पढ़ रहें हैं उसे अपने जीवन से जोड़ कर जरुर देखें। अगर कोई बात अच्छी लगती है तो उसे आत्मसात करने का प्रयास भी करें। किताबें दर्पण का काम करती है। हमें अपनी अच्छाइयों और बुराइयों से परिचित भी करवाती है। इसलिए पढ़ते-पढ़ते आपको पता चलता है कि आपमें कुछ त्यागने योग्य है तो उसे त्यागने का प्रयास जरुर कीजिये। 

मैंने कई लोगों को देखा है जिन्हें पढ़ने का बहुत शौक होता है। उन्हें बस पढ़ने को कुछ मिल जाए फिर उन्हें जरा भी बोरियत नहीं लगती। दुनिया भर की किताबें उनके कक्ष की शोभा बढाती है। लेकिन आश्चर्य होता है जब उन लोगों को अपने व्यक्तिगत जीवन में मैं बहुत रिजिड पाती हूँ। सामने वालें को उनकी वजह से चाहे कितनी भी तकलीफ हो रही हो पर अपनी किसी भी आदत में परिवर्तन उन्हें मंजूर नहीं होता। बल्कि वे गर्व से यह कहते हुए पाए जाते हैं कि हम जैसे हैं वैसे ही रहेंगे , किसी के लिए भी खुद को नहीं बदलेंगे। 

यहाँ शायद जो भी पढ़ा जा रहा है सिर्फ मनोरंजन के लिए पढ़ा जा रहा है। क्या पढ़ा जा रहा है इससे उनका कोई ताल्लुकात होता ही नहीं। 

पर मेरी नज़र में यह बहुत जरुरी है कि हम जो भी पढ़े, वह हमारे ज्ञान, चरित्र और हमारे व्यक्तित्व में निखार का कारण अवश्य बने। हर बार कुछ पढ़ने के बाद हम स्वयं को एक कदम आगे पायें। 

Monika Jain 'पंछी'


Poem on Bhagat Singh in Hindi


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कहाँ हो तुम भगत सिंह! 
क्यों नहीं लेते फिर से जन्म 
हमारा ये देश तो आज भी गुलाम है 
पुकारती तुम्हें, देश की आवाम है 

पहले गोरो से
अब कालो से 
डर लगता है 
देश के ही रखवालों से 

क्रांति के दूत भगत सिंह! 
तुम आते क्यों नहीं 
एक बार फिर से 
क्रांति की अलख जगाते क्यों नहीं 

तुम्हारी उम्मीदों का सूरज 
कब का अस्त हो चुका है 
तुम्हारा क्रांति का सन्देश 
जाने कहाँ लुप्त हो चुका है 

नौजवानों में फिर से ऊर्जा भरने को 
देश के लिए कुछ कर गुजरने को 
भगत सिंह! तुम्हें आना ही होगा 
क्रांति का सन्देश जन-जन तक पहुँचाना ही होगा

Monika Jain 'पंछी'

Wednesday, May 29, 2013

Essay on Love in Hindi


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"Love Always Hurts" जिसे भी प्यार में असफलता मिली हो, धोखा मिला हो या जिसने अपने आसपास प्यार की कहानियों का दुखद अंत देखा हो, उनके मुंह से ये वाक्य सुना जा सकता है। पर एक पल के लिए सोचिये कि क्या सच में प्यार हमें दुःख देता है ? नहीं यह प्यार नहीं बल्कि हमारी अपेक्षाएं और उम्मीदें होती हैं जो हमें दुःख पहुँचाती है। ये rejection होता है जो हमें hurt करता है या फिर कहिये ये absence of love है जो हमारे दुःख का कारण बनता है। 

तो फिर क्यों ना प्यार उनसे किया जाए जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरुरत हो और जिनसे बदले में कुछ मिलने की उम्मीद भी ना हो। ना रहेंगी उम्मीदें और ना पहुंचेगी दिल को कोई भी तकलीफ। प्यार करिए प्रकृति से और उन मासूम जीवों से जिन्हें धोखा देना नहीं आता।  प्यार करिए उन जरूरतमंद लोगों  से जिन्हें सच में प्यार की बहुत जरुरत है। 

क्यों ना एक दिन हम किसी अनाथालय हो आयें और अपना प्यार वहां लुटा आयें। या फिर किसी वृद्दाश्रम में जाकर सूनी आँखों को थोड़ी चमक दे आयें। बिना उम्मीद का ये प्यार बाँट कर आइये और देखिये उस दिन आप कितनी सुकून की नींद सोते हैं। अपेक्षाओं से भरे प्यार में रातें अक्सर आंसुओं से गीले तकिये के साथ गुजरती है। 

जिस दिन हमें उनसे प्यार करना आ गया जिन्हें हमारे प्यार की सच में जरुरत है उस दिन हमारी जिन्दगी से प्यार को लेकर जो भी शिकायते हैं वे हमेशा के लिए दूर हो जायेंगी और शायद सही मायनों में हम प्यार का मतलब भी समझ जाएँ जिसे आज तक दुनिया की कोई भी किताब नहीं समझा पायी। 

Monika Jain 'पंछी'

Poem on Condition of Woman in Society in Hindi


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जिंदगी के हाशिये पे आज जो खड़ी, वो नारी है 
उसको यहाँ तक पहुँचाने में 
जाने-अनजाने हम सभी जिम्मेदार हैं 
सिर्फ ऐसा कहती दुनिया सारी है 
जिंदगी के हाशिये पे आज जो खड़ी, वो नारी है 

घर में रहना, चुपचाप सब कुछ सहना 
उसकी नियति है, उसका धर्म है 
चुल्हा-चोका, बर्तन, बस यही तो उसके कर्म है 
जीवन के इस दांव में, सबकुछ वो हारी है 
जिंदगी के हाशिये पे आज जो खड़ी, वो नारी है 

दिन में काम, रात को काम 
उसको नहीं कभी चैन आराम 
परिवार में सबको खुश रखना 
उसकी ही जिम्मेदारी है 
जिंदगी के हाशिये पे आज जो खड़ी, वो नारी है 

सबकी सेवा वह करती 
सबका रखती है वो ध्यान 
हरपल सहती खुद अपमान 
कभी नहीं कहता कोई उसको सॉरी है 
जिंदगी के हाशिये पे आज जो खड़ी, वो नारी है 

दिन के उजाले में उसकी 
तारीफ करने से सभी डरते हैं 
छुप-छुप कर रातों को कहते 
तू कितनी प्यारी है 
जिंदगी के हाशिये पे आज जो खड़ी, वो नारी है 

यह मतलबी स्वार्थी, मर्दों की दुनिया है 
यहाँ न्याय और समानता महज इत्तेफाक है 
नारी अस्तित्व की बात करना एक मजाक है 
घुट-घुट कर जीवन जीना उसकी लाचारी है 
जिंदगी के हाशिये पे आज जो खड़ी, वो नारी है 

पढ़ने में, उसके आगे बढ़ने में 
बाधक रहें हैं सब, किस्मत उसकी गढ़ने में 
जिस राह पे चलती है वो 
वह रही सदा दोधारी है 
जिंदगी के हाशिये पे आज जो खड़ी, वो नारी है

बेटा न जन पाने का ताना 
रिश्तेदार और पड़ोसियों ने साधा 
सबसे ज्यादा उस पर निशाना 
ये दोषी, अक्षम, धरती पर बोझ भारी है 
जिंदगी के हाशिये पे आज जो खड़ी, वो नारी है

कुछ लेनदेन की अगर हो बात 
तुझे देने को बढ़ते ना हाथ 
मिलता भी है तो हर बार 
अंत में आती बारी है 
जिंदगी के हाशिये पे आज जो खड़ी, वो नारी है

माना की वह आगे बढ़ रही है 
अपनी किस्मत अपने हाथ गढ़ रही है 
फिर भी उसके पास बची 
अभी बहुत लाचारी है 
जिंदगी के हाशिये पे आज जो खड़ी, वो नारी है

नारी लक्ष्मी है, नहीं है शक 
पर नारायण मिला नहीं उसे आजतक 
जग का कल्याण तू ही करेगी 
तू दानी अवतारी है 
जिंदगी के हाशिये पे आज जो खड़ी, वो नारी है

तू उजाला है, नहीं है अन्धकार 
तू ही करती सबकी नैया पार 
हिम्मत मत हार 
एक दिन होगी तेरी जय-जयकार 
तू ही शुभ फलदायी, ओमकारी है 
जिंदगी के हाशिये पे आज जो खड़ी, वो नारी है

Anil Kumar Bihari 
                                  

Tuesday, May 28, 2013

Poem on Self Realization in Hindi


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जिन्दगी की राह पर चलते हुए 
लगता है जैसे 
छल रहें हैं ये रास्ते 
हर रास्ते के अंत में खड़ा है 
एक और रास्ता 
क्या चल रही हूँ मैं आइनों में ?
या भटक गयी हूँ अपनी मंजिल से ?
कितना भी चलूँ 
वहीँ पहुँच जाती हूँ 
जहाँ से हुई थी कभी शुरू 
क्या मुमकिन होगा कभी ?
कि बना पाऊं एक नया रास्ता 
जो ले चले पार सारी उलझनों से 
और बचा ले मुझे दुनिया के भ्रमों से 
काश! दर्पणों का ये मायाजाल 
तोड़ पाती मैं 
काश! मोह का ये भ्रम जाल 
छोड़ पाती मैं 
काश! पहुँच पाती उस रास्ते पर 
जहाँ से खुद को खोज पाती मैं

Monika Jain 'पंछी' 

Saturday, May 25, 2013

Poem on Broken Dreams in Hindi


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कब तक खुद से दगा करती रहूँ मैं ?
कब तक सपनों में जीती रहूँ मैं ?
अधरों की फीकी मुस्कान के लिए
कब तक अश्कों को पीती रहूँ मैं ?

पलकों में छिपे आंसू पूछते हैं मुझसे
क्यों हमें बहने नहीं देती ?
होठों में छिपा दर्द, पूछता है मुझसे
क्यों मुझे कहने नहीं देती ?

कब तक दिल की आवाज़ अनसुनी करती रहूँ मैं ?
कब तक सपनों में जीती रहूँ मैं ?
अधरों की फीकी मुस्कान के लिए
कब तक अश्कों को पीती रहूँ मैं ?

आंधियाँ आती है, तूफ़ान आते हैं
पलकों में छिपे मोती गिरना चाहते हैं
तड़पती रूह, सिसकती आँहे
हर कदम पे दम तोड़ती मेरी राहें 

कब तक उन राहों को ढूँढती रहूँ मैं ?
कब तक सपनों में जीती रहूँ मैं ?
अधरों की फीकी मुस्कान के लिए
कब तक अश्कों को पीती रहूँ मैं ?

छाया है घनघोर अँधेरा
पास नहीं कोई भी मेरा
घुट-घुट कर जीने को मजबूर
काँपता है ये दिल मेरा

कब तक टूटे दिल की धड़कने सुनती रहूँ मैं ?
कब तक सपनों में जीती रहूँ मैं ?
अधरों की फीकी मुस्कान के लिए
कब तक अश्कों को पीती रहूँ मैं ?

Monika Jain 'पंछी'

Wednesday, May 22, 2013

Poem on Earth Day in Hindi


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अगर बचाना है हमें अपनी धरती को 
तो रखना होगा हमें इसे स्वच्छ 
बनाना होगा सुन्दर और स्वस्थ 
करना होगा प्रदूषण मुक्त 
और रखना होगा जल से युक्त 

जरुरत नहीं है किसी भी अभियान की 
बस जरुरत है थोड़ी सी बुद्धि और ज्ञान की 
हमारी छोटी सी कोशिश बदलाव ला सकती है 
भविष्य के खतरों से हमें बचा सकती है 

अगर ना फैंके हम इधर-उधर कचरा 
ना उत्सर्जित होने दें विषैली गैसे 
ना काटे हरे-भरे पेड़ 
तो भूमि प्रदूषण हो कैसे 

ना खोदे हर कहीं गर्त 
बस मान ले ये छोटी सी शर्त 
तो हमारी पहल रंग लाएगी 
और हमारी धरती स्वर्ग बन जायेगी 

Monika Jain 'पंछी'

Tuesday, May 21, 2013

Essay on Reservation in Hindi


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जिस देश का संविधान धर्म निरपेक्ष होने का दावां करता है , उसी देश में धर्म और जाति के आधार पर आरक्षण  संविधान की वैधता पर एक प्रश्न चिन्ह है। उक्त कथन कुछ लोगों को दलित विरोधी लग सकता है लेकिन एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र में आरक्षण का बस एक ही आधार होना चाहिए और वह है आर्थिक। 
  • गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी क्या जाति और धर्म विशेष से जुड़ी समस्याएं हैं ? 
  • क्या सवर्ण जातियों के लोग गरीब नहीं हो सकते ? 
  • पहले शिक्षा में आरक्षण, फिर नौकरी में आरक्षण और फिर पदोन्नति में आरक्षण। ये अति पक्षपाती रवैया क्यों ? 
  • क्या सवर्ण जातियों में पैदा होने वाले मेधावी छात्रों ने कोई अपराध किया है ? 
  • और सबसे बड़ा सवाल सवर्ण और दलित का ये भेद हो ही क्यों ? 
समानता के नाम पर जातिगत आरक्षण की बात असमानता की आग में घी डालने जैसी है जिस पर राजनैतिक रोटियां सेकी जाती है। जातिगत आरक्षण से आर्थिक असमानता कम नहीं होती बल्कि और भी बढ़ जाती है क्योंकि जो आरक्षण के वास्तविक हकदार हैं उन्हें आरक्षण का लाभ मिलता ही नहीं। पिछड़ी जातियों के सम्पन्न लोग ही ज्यादातर इसका फायदा उठाते हैं। 

कैसा लगता होगा उस मेधावी छात्र को जिसका आरक्षण की वजह से चयन नहीं हो पाया ? उस से कम अंक लाने वाले उससे आगे बढ़ रहें हैं ये उसकी मेहनत और बुद्धिमता पर एक तमाचा है और साथ ही एक पक्षपात पूर्ण व्यवहार। और अगर वह मेधावी छात्र एक सवर्ण जाति के गरीब परिवार से हो तो उसका भविष्य तो निराशा के अन्धकार में ही डूब जायेगा। 

राष्ट्र की उन्नति के लिए सबसे ज्यादा जरुरी है आर्थिक असमानता दूर करना, जातिगत भेदभाव को जड़ से मिटाना और प्रतिभाओं का सम्मान करना ताकि उनमें मेहनत का ज़ज्बा हमेशा बना रहे। 

Monika Jain 'पंछी' 

Poem on Daughter in Hindi


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बेटी
परियों का रूप है
पावन सी धूप है

बेटी
एक ठंडी हवा का झोंका है
हर ताप को जिसने सोखा है

बेटी
भोर का उजेरा है
चिड़ियों का बसेरा है

…बेटी…
पंछी की चहचहाहट है
होठों की मुस्कराहट है

बेटी
चंदा की चांदनी है
सूरज की रौशनी है

…बेटी…
फूलों की बगिया है
बहती हुई नदियां है

…बेटी…
स्नेह है प्यार है
मीठा सा दुलार है

...बेटी...
मधुर सा संगीत है
खुशियों का गीत है

Monika Jain 'पंछी'

Sunday, May 19, 2013

Skin Care Home Remedies in Hindi


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  • रोज सुबह 20 ग्राम शहद ठंडे पानी में मिलाकर चार पांच महीने तक पीने से त्वचा सम्बन्धी रोग दूर होते है.
  • सौंफ रक्त को शुद्ध करने वाला एवं चर्म रोग नाशक है. प्रतिदिन 10 ग्राम सौंफ बिना मीठा मिलाये वैसे ही चबा -चबा कर नियमित कुछ दिनों तक खाने से रक्त शुद्ध होता है और त्वचा का रंग साफ़ होता है.
  • गर्मी के दिनों में नीम का शरबत पीये. इससे खून साफ़ होता है और ठंडक भी मिलती है.
  • नीम के पत्ते डाल कर उबाले गए पानी से स्नान करने से चर्म रोग मिटते है.
  • दाद, खाज, फुंसी, फोड़े इत्यादि चर्म रोगों में ताजे संतरे के छिलके पीस कर लगाने से लाभ होता है.
  • सर्दी के दिनों में तिल का शुद्ध तेल शरीर पर मलने से शरीर में गर्मी आती है. रक्त की गति तीव्र होती है और त्वचा का रूखापन भी समाप्त होता है.
  • गर्मी की घमौरियों पर बर्फ का टुकड़ा मलने से घमौरियां मुरझा जाती है और राहत मिलती है.
  • हाथ पाँव में जलन की शिकायत होने पर सौंफ के साथ बराबर मात्रा में धनिया व मिश्री मिलाकर पीस कर छान ले. खाना खाने के बाद 5-6 ग्राम की मात्रा में यह चूर्ण लेने से राहत मिलती है.
  • नीम की पत्तियों को पीसकर हाथ पेरों पर लेप करने से जलन शांत होती है.
  • चर्म रोगों में फिटकरी बड़ी गुणकारी होती है. जिस स्थान पर चर्म रोग हुआ हो उस स्थान को बार -बार फिटकरी के पानी से धोने से लाभ होता है.
  • बादाम का तेल चहरे पर विशेषकर आँखों के आसपास मलने से झुर्रियां नहीं पड़ती.

Saturday, May 18, 2013

Essay on Blind Faith in Hindi


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हमारे देश में मंदिरों में भगवान की मूर्ति को स्नान कराने के लिए दूध, दही, घी, पानी  आदि का उपयोग किया जाता है जो अंततः नालियों की शोभा बनता है। हमारे देश की नालियाँ तो उन गरीब बच्चों से भी कई ज्यादा भाग्यशाली है जिन्हें दो वक्त का खाना भी नसीब नहीं होता। फिर 35 रुपये लीटर का दूध, 400 रुपये किलो का घी, दही आदि तो उनके लिए दिवा स्वप्न सा ही है। 

देश में करोड़ों लोग गरीबी, भूखमरी और कुपोषण के शिकार हैं। इस बात को नजरंदाज कर मंदिरों में दूध, दही , घी की नदियाँ बहाने वाले महान भक्तों से मैं पूछना चाहती हूँ कि क्या उन्हें सच में ऐसा लगता है कि वो कोई अच्छा काम कर रहें हैं जिससे प्रसन्न होकर भगवान उनकी मनोकामनाएं पूरी करेंगे। अगर उन्हें ऐसा लगता है तो फिर उनसे बड़ा मुर्ख और कोई नहीं। 

मेरी नज़र में उनका यह कृत्य अमानवीय है। दूध, दही, घी और अन्य खाने की उपयोगी वस्तुओं का इस तरह व्यर्थ उपयोग जो लाखों लोगों के जीवन को बचाने में काम आ सकती थी, एक घोर अपराध है। बेहतर होता अगर भगवान के नाम पर ही ये चीजे जरुरतमंदों में बाँट दी जाती। 

Monika Jain 'पंछी' 

Friday, May 17, 2013

Poem on Beti in Hindi



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त्याग की सूरत है बेटी
ममता की मूरत है बेटी

सस्कारों की जान है बेटी
हर घर की तो शान है बेटी

खुशियों का संसार है बेटी
प्रेम का आधार है बेटी

शीतल सी एक हवा है बेटी
सब रोगों की दवा है बेटी

ममता का सम्मान है बेटी
मात-पिता का मान है बेटी

आँगन की तुलसी है बेटी
पूजा की कलसी है बेटी

सृष्टि है, शक्ति है बेटी
दृष्टि है, भक्ति है बेटी

श्रद्धा है, विश्वास है बेटी

Monika Jain 'पंछी'

Thursday, May 16, 2013

Beti Bachao Abhiyan Kavita in Hindi


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वंश-वंश करते मानव तुम
वंश बेल को काट रहे हो
एक फल की चाहत में तुम
पूरा बाग उजाड़ रहे हो

फूल रहे ना धरती पर तो
फल तुम कैसे पाओगे ?
कैसे वंश बढ़ाओगे ?

उम्र की ढ़लती शाम में जब
बेटा खड़ा ना होगा साथ
याद करोगे अंश को अपने
खुद मारा जिसको अपने हाथ

ना कुचलों नन्ही कलियों को
उनको भी जग में आने दो
बनकर फूल खिलेंगी एक दिन

Monika Jain 'पंछी'

Tuesday, May 14, 2013

Essay on Religion in Hindi


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अक्सर ऐसा होता है मंदिर में दर्शन हेतु जाने वाले दर्शनार्थी भीख माँगने वाले ग़रीब बच्चों के जमावड़े से पीछा छुड़ाते हैं, उन पर झल्लातें है और बिना उनकी मदद किए आगे बढ़ जाते हैं. भगवान की मूर्ति के समक्ष मेवा प्रसाद चढ़ाते है, उन्हें वस्त्र आभूषणों से सजाते हैं. दान पेटी में डालने के लिए उनकी जेब से १०,२० या ५०-१०० के नोट भी निकल जाते है. मानो ऐसा करने से ईश्वर उन्हें आशीर्वाद देंगें और उनके कष्टों को हर लेंगें. ये तो ऐसा हुआ जैसे ईश्वर के घर में भी बस पैसे की पूछ है तो फिर इंसान और ईश्वर में क्या अंतर रहा?

मंदिरों के निर्माण कार्य में कई लोग करोड़ों का दान कर देते है ईश्वर को खुश करने और समाज में अपना मान सम्मान और रुतबा बढ़ाने के लिए. पर जब प्रश्न किसी ग़रीब का उठता है तो उस समय कुछ लोगों की मानसिकता उस ग़रीब की ग़रीबी से भी ज़्यादा ग़रीब बन जाती है.

कई बार मेरे जहन में ये प्रश्न उठते है की मंदिरों और अन्य धार्मिक स्थलों के निर्माण कार्य पर करोड़ों रुपये बहाना धर्म है या फिर दर-दर भटकने वाले निराश्रितो के लिए आश्रय का कोई स्थल बनवाना धर्म है? भगवान की मूर्ति के सामने मावे- मेवा का प्रसाद चढ़ाना धर्म है या फिर किसी भूखे ग़रीब के लिए दो वक्त के खाने की व्यवस्था करना धर्म है? एक पत्थर की मूर्ति को नये नये आभूषण और वस्त्रों से सजाना धर्म है या फिर एक फटे कपड़ो से ढके अधनंगें तन को कपड़े पहनाना धर्म है? आख़िर क्या है सच्चा धर्म

हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और ना जाने कितने धर्मों में मनुष्य और भगवान को बाँट कर हम अपनी ढपली अपना राग बजाते रहते है. पर अगर ये सब करने की बजाय हमनें मानवता को अपना धर्म बनाया होता और ईश्वर को मंदिरों और अन्य धार्मिक स्थलों मे सजाने की बजाय अपने दिल मे बसाकर समाज के दीन- दुखी, निर्धन,निराश्रित तबके के उत्थान के लिए कुछ कदम उठाए होते तो आज हमारा समाज कितना खुशहाल होता और तब शायद हम सच्चे अर्थों में अपना धर्म निभा पाते. 

कुछ ग़रीब लोग की गयी मदद का अनावश्यक फायदा उठाते हैं और भीख माँगने को ही अपना पेशा बना लेते है. ग़लत कार्यो में धन का उपयोग करते है.ये सब तर्क अपनी जगह सही है पर इन सब तर्को से हम अपने कर्तव्यों से भाग नहीं सकते. इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए ही हमे अपना मानव धर्म निभाना चाहिए. इसके लिए पैसो का दान करने की बजाय हम उनके लिए कुछ ऐसा करें जिससे वे स्वाभिमान के साथ अपना जीवन यापन कर सके.

- Monika Jain 'पंछी'

Monday, May 13, 2013

Jain Navkar Mantra Meaning in Hindi


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जैन दर्शन में अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय एवं साधु ये पांच विशिष्ट पद माने गए हैं. सिद्ध संसार-दशा, जन्म, मृत्यु, रोग, शोक, दुःख, राग, द्वेष आदि से सर्वथा मुक्त हैं. वे अशरीरी- परमात्मा है. अरिहंत भी परमात्मा दशापन्न ही है पर अभी शरीर के बंधन से मुक्त नहीं हैं. आयुष्य समाप्ति पर उनका सिद्धत्व सुनिश्चित हैं. आचार्य उपाध्याय और साधु ये तीनो साधक हैं. इनका लक्ष्य भी सिद्धि प्राप्ति है पर ये अभी उस दिशा में प्रयत्नशील हैं.

जैन धर्म के महामंत्र जिसे ’ नमस्कार सूत्र ’ कहा जाता है में इन सभी पांच पदों ( अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधुओं) को नमस्कार किया गया है. यह मंत्र प्राकृत भाषा में है.

 नमस्कार सूत्र, नमोकार मंत्र, नवकार मंत्र, जैन महामंत्र, पंच परमेष्टि सूत्र 

णमो अरिहंताणं
णमो सिद्धाणं
णमो आयरियाणं
णमो उवज्झायाणं
णमो लोए सव्व साहूणं
एसो पंच णमोक्कारो, सव्वपावप्पणासणो
मंगलाणं च सव्वेसिं, पढमं हवई मंगलं

Namokar Mantra Meaning in Hindi

श्री अरिहंत भगवान्, श्री सिद्ध भगवान्, श्री आचार्य महाराज, श्री उपाध्याय महाराज और लोक में वर्तमान सभी साधु मुनिराज इन पांच परमेष्ठियों ( जो मोक्ष और संयम में स्थित हैं) को मेरा नमस्कार हो. उक्त पांच पदों को किया गया नमस्कार सभी पापों का नाश करने वाला है और सभी प्रकार के लोकिक मंगलों में प्रथम (प्रधान) मंगल है.

Navkar Mantra Meaning In English  

I bow to Arihants . I bow to Siddhas . I bow to the Aacharyas . I bow to the Teachers . I bow to all the Sadhhus. This five  foldbow (mantra) destroys all sins and obstacles  and of all auspicious mantras, is the first and foremost one.


नोट :
  •  सिद्ध भगवान् मोक्ष में स्थित हैं और शेष चार पद ( अरिहंत, आचार्य, उपाध्याय और साधु ) संयम में स्थित हैं.
  • सिद्ध भगवान् निराकार है वे हमें दिखाई नहीं देते हैं. अरिहंत ही हमारी उनसे पहचान करवाते हैं. इसलिए अरिहंतो को सिद्धों से पहले नमस्कार किया गया है .
  • अरिहंत और सिद्ध ये तो देव पद है और शेष तीन गुरु पद हैं.

Sunday, May 12, 2013

Poem on Mother in Hindi


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तू धरती पर ख़ुदा है माँ !
तू सवेरा ज़ुदा है माँ !

पंछी को छाया देते पेड़ों की डाली है तू
सूरज से रौशन होते चेहरे की लाली है तू
पौधों को जीवन देती मिट्टी की क्यारी है तू
सबसे अलग सबसे ज़ुदा माँ सबसे न्यारी है तू

तू रौशनी का ख़ुदा है माँ !
तू सवेरा ज़ुदा है माँ !

सूरज से तपते आँगन में बारिश की बौछार है तू
जीवन के सूने उपवन में कलियों की बहार है तू
खतरों से रक्षा करती सदा खड़ी दीवार है तू
ईश्वर का सबसे प्यारा और सुन्दर अवतार है तू

तू फरिश्तों की दुआ है माँ !

 Monika Jain 'पंछी'




Friday, May 10, 2013

Poem on Animal Slaughtering in Hindi


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महावीर जयंती के उपलक्ष्य में अहिंसा को समर्पित मेरी इस कविता का किसी व्यक्ति विशेष या धर्म से संबंध नहीं है. अली शब्द का उपयोग ईश्वर के सभी रूपों के लिए किया गया है. हिंसा चाहे वह किसी भी धर्म का हिस्सा हो और चाहे किसी भी इंसान के द्वारा की जाए ये कविता उसका विरोध करती है. 

धर्म के नाम पर निर्दोष पशुओं की बलि
रज़ा हो नहीं सकती ये तेरी अली

उस निरीह की आँखों मे देखो
जीने का ख़्वाब वहाँ भी पलता है
उस बेबस के दिल मे झाँको
तुम्हारा ख़ुदा वहाँ भी बसता है

दिल के एक कोने में मेरे, टीस सी ये उठ चली
धर्म के नाम पर निर्दोष पशुओं की बलि
रज़ा हो नहीं सकती ये तेरी अली

ये ज़मीं उसकी भी है
आसमाँ उसका भी है
चाँद, सूरज और हवा
सब पे हक उसका भी है

बन के उसके मन की आवाज़, कलम ये मेरी चली
धर्म के नाम पर निर्दोष पशुओं की बलि
रज़ा हो नहीं सकती ये तेरी अली

काट जो देते हो धड़
काँपते नहीं क्या कर
चीख सुनकर उस निरीह की
क्या कुछ भी ना होता असर

जान लेने की रीत ये कैसी चली
धर्म के नाम पर निर्दोष पशुओं की बलि
रज़ा हो नहीं सकती ये तेरी अली

 Monika Jain 'पंछी'