Sunday, June 30, 2013

Poem on India in Hindi


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चीर कर अँधेरा अब उजालों में कदम बढ़ाना है
कर रात को विदा अब नया सवेरा लाना है। 

रोशन हो हर घर का आँगन 
कहीं न छाए मायूसी 
हर बच्चे बूढ़े के होठों पे 
छाए सच्ची ख़ुशी 

रोती आँखों के आंसू को भी अब मुस्काना है 
कर रात को विदा अब नया सवेरा लाना है। 

शिक्षित हो हर भारतवासी 
बेकारी बन न पाये फांसी 
भूखमरी और लाचारी से 
न छाए चहरों पे उदासी 

सोने की चिडियां हमको फिर से कहलाना है 
कर रात को विदा अब नया सवेरा लाना है। 

सत्ता के गलियारों में 
भ्रष्टाचार का हो विनाश 
सरहदों को पार कर 
आतंकवाद न आये पास 

दहशत गर्दों को भी अब शांतिदूत बनाना है 
कर रात को विदा अब नया सवेरा लाना है। 

Monika Jain 'पंछी' 

Sunday, June 23, 2013

Poem on Flood in Hindi


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ये बाढ़ के पानी की प्यास 
पी गयी है ना जाने कितनों को 
और प्रकृति का ये कहर 
लील गया है जाने कितने सपनों को 

मंझर ये तबाही का
अब देखा नहीं जाता 
ऐ बादल! क्यूँ इतना सारा 
पानी तू है बरसाता 

खेर! दोष और शिकायत का 
ये वक्त नहीं है 
यहाँ भी राजनीति की रोटियां सेकना 
कहाँ तक सही है ?

मुश्किलों में जो फंसे हैं 
उन्हें सहने की शक्ति मिल सके 
हर संभव मदद हमारी 
उन लोगों तक पहुँच सके 

जिन्दगी कोई ना खोये 
 कोशिश बस ये करनी होगी 
आपसी सहयोग और एकता से ही 
अब ये  मुश्किल हल होगी


Monika Jain 'पंछी'


Money Quotes in Hindi


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  • धन संग्रह से व्यक्ति धनाढ्य बन सकता है, सुखी नहीं. 
  • जीवन में सुख-शांति के लिए धर्म ही सहायक है, धन नहीं.
  • परिग्रह जीवन के लिए खतरा है.
  • जो व्यक्ति अपने पास मौजूद संसाधनों में जीवन यापन करता है और जो संतुष्ट है, मैं उसे धनी मानता हूँ ~ एस. होव 
  • केवल अपने लिए मांगने वाला भिखारी कहा जा सकता है, परन्तु सबके लिए मांगने वाला देने वाले का स्वामी ही रहेगा ~ महादेवी वर्मा 

Saturday, June 22, 2013

About Maithili Sharan Gupt in Hindi


Information About Maithili Sharan Gupt in Hindi, Biography, Poet, Kavi Jeevan Parichay, Author Profile, Writer, Introduction, Story, History, Autobiography, कवि मैथिलीशरण गुप्त का जीवन परिचय

मैथिलीशरण गुप्त का जन्म 3 अगस्त,1886 को चिरगाँव, जिला झाँसी उत्तर प्रदेश में हुआ था। ये संस्कृत, मराठी, बंगला और अंग्रेजी भाषाओं के अच्छे ज्ञाता थे। खड़ी बोली के स्वरुप निर्धारण और विकास में गुप्त जी का विशेष योगदान रहा है। इन्हें 'राष्ट्रकवि' के रूप में जाना जाता है। भारत सरकार ने इन्हें 'पद्मभूषण' की उपाधि से विभूषित किया था। ये बारह वर्ष तक भारतीय संसद में राज्य सभा के मनोनीत सदस्य भी रहे। 

प्रमुख रचनाएँ : साकेत, यशोधरा, जयभारत, द्वापर, विष्णुप्रिया, जयद्रथ-वध, पंचवटी, नहुष, झंकार, भारत-भारती, मेघनाद-वध आदि। 

Surdas Biography in Hindi



Biography of Sant Surdas in Hindi, Information About Surdas, Kavi Jeevan Parichay, Poet, Introduction, Life History, Story, Autobiography, Writer, Author Profile, संत कवि सूरदास जी का जीवन परिचय 

कृष्ण भक्त कवियों में सूरदास जी का महत्वपूर्ण स्थान है। उनका जन्म 1478 ई० में आगरा-मथुरा के बीच रुनकता में हुआ था। वे गऊ घाट पर रहते थे। वहीँ उनकी भेंट महाप्रभु वल्लभाचार्य से हुई। सूर का गायन सुनकर महाप्रभु वल्लभाचार्य ने उन्हें अपना शिष्य बना लिया। उन्हीं के कहने पर सूरदास ने कृष्णलीला के पदों की रचना की। 

कहा जाता है कि सूरदास जन्मांध थे, पर उनका प्रकृति चित्रण एवं कृष्ण लीलाओं का वर्णन अदभुत है। सूरदास वात्सल्य, प्रेम और सौन्दर्य के अमर कवि हैं। उन्होंने 'सूरसागर' नामक काव्य की रचना की। कहा जाता है कि इसमें सवा लाख पद थे, पर अब पांच हजार पद ही प्राप्त हैं। सूर के पदों में बृजभाषा का निखरा रूप देखने को मिलता है। 

About Bhavani Prasad Mishra in Hindi


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आधुनिक काल के प्रसिद्ध कवि भवानी प्रसाद मिश्र का जन्म 1914 ई०  में होशंगाबाद (म० प्र०) के टिगरिया नामक गाँव में हुआ था। मिश्रजी का प्रारंभिक जीवन अत्यंत संघर्षपूर्ण रहा। उन्होंने महिला आश्रम (वर्धा) में अध्यापन, 'कल्पना' पत्रिका का संपादन, 'विविध भारती' कार्यक्रम का मुंबई आकाशवाणी केंद्र पर निर्देशन, 'सम्पूर्ण गाँधी - वाड्मय' का संपादन, आदि कार्य सफलतापूर्वक किये। मिश्रजी की कविताओं पर गाँधीवादी विचारधारा का प्रभाव है। 

'बुनी हुई रस्सी' पर उन्हें 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' प्राप्त हुआ। मिश्रजी की भाषा सीधी-सादी एवं सरल है। 

प्रसिद्ध रचनाएँ - 'गीत फरोश', 'बुनी हुई रस्सी', 'शतदल', 'त्रिकाल संध्या', आदि। 
20 फरवरी, 1985 को उनका निधन हो गया। 

Poems of Bhawani Prasad Mishra on this Blog 

भंगुर पात्रता 

About Subramania Bharati in Hindi


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महाकवि सुब्रह्मण्यम भारती का जन्म 1882 ई०  में सुदूर दक्षिण के तिरुनेलवेली के शिवपुरी नामक गाँव में हुआ था। इनके पिता का नाम चिन्नस्वामी अय्यर तथा माता का नाम लक्ष्मी अम्माल था। इनके पिता तमिल और गणित के प्रकांड विद्वान थे। 

भारती की कवित्व शक्ति से प्रभावित होकर एट्टयपुरम के महाराज ने इन्हें 'भारती' की उपाधि से विभूषित किया था। बारह वर्ष की अल्पायु में इनका विवाह चेलम्मा के साथ हो गया। 

भारती ने 'इंडिया' नामक पत्रिका का संपादन करके अपनी राष्ट्रीय भावना को प्रचारित किया। वे प्रतिदिन तिरुवल्लिक्केणी मंदिर जाया करते थे। वहीँ एक पागल हाथी द्वारा चोट पहुंचाए जाने के कारण इनकी हड्डियाँ टूट गयी। 

प्रमुख रचनाएँ - 'पांचाली शपथम्', 'कणन पाट्टु' (कान्हा के गीत), 'कुमिल पाट्टु' (कोयल के गीत) आदि उल्लेखनीय हैं। 

11 सितम्बर, 1921 ई०  को इनका निधन हो गया। 

About Rahim Das in Hindi


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कवि रहीम का पूरा नाम अब्दुर्रहीम खानखाना था। उनका जन्म 1556 ई०  में लाहौर में हुआ था। उनके पिता बैरमखां सम्राट अकबर के संरक्षक थे। रहीम अकबर की सेना के सेनापति, मंत्री एवं वीर योद्धा थे। अकबर के नवरत्नों में उन्हें प्रमुख स्थान प्राप्त था। 

कवि रहीम ने नीति, भक्ति, शृंगार, एवं शांत रस की व्यंजना की है। उन्होंने अपने दोहों में सरल भाषा का प्रयोग किया है।

प्रमुख रचनाएँ - 'रहीम सतसई', 'रहीम रत्नावली', 'मदनाष्टक' आदि। 
रहीम की मृत्यु 1627 ई० में हुई। 


About Kanhaiyalal Mishra Prabhakar in Hindi


Information About Kanhaiyalal Mishra 'Prabhakar' in Hindi, Biography, Writer, Author Profile, Lekhak Jeevan Parichay, Life Introduction, History, Story, Autobiography, कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' का जीवन परिचय 

कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' का जन्म 29 मई, 1906 ई०  को सहारनपुर जिले के देवबंद गाँव में हुआ था। वे पंद्रह वर्ष की आयु में विद्यालय की पढ़ाई छोड़, स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। उन्होंने 1929 में अपने को स्वतंत्रता-संग्राम के लिए गांधीजी के हाथों सौंप दिया और 1930 से 1947 तक स्वतंत्रता - संग्राम की जुझारू टोली में रहे। साथ ही 1930, 1932 और 1942  में वे जेल भी गए। 

वे उन थोड़े से साधकों में हैं, जिन्हें साहित्य और पत्रकारिता में एक साथ प्रथम श्रेणी की सफलता मिली। उनके साहित्य पर अनेक विश्वविद्यालयों में शोध - कार्य हो चुका है और हो रहा है। मेरठ विश्वविद्यालय ने उन्हें डी०  लिट ०  की मानक उपाधि  से सम्मानित किया है। उन्होंने लघुकथा, निबन्ध, संस्मरण और रिपोतार्ज को नई शक्ति दी तथा अनेक विधाओं में लिखा। उनकी अपनी शैली के इतने भेदोपभेद हैं कि उन्हें 'शैलियों का शैलीकार' कहा जाता है। 

प्रमुख रचनाएँ - 'तपती पगडंडियों पर पद यात्रा', 'ज़िन्दगी मुस्कुराई', 'बाज पायलिया के घुंघारे', 'मोटी हो गयी सेना', 'क्षण बोले कण मुस्काए', 'दीप जले, शंख बजे' आदि। 

About Anton Chekhov in Hindi


Information About Anton Chekhov in Hindi, Writer Profile, Author, Life Introduction, Lekhak Jeevan Parichay, Biography, History, Story, Autobiography, हिंदी लेखक अंतोन चेख़व का जीवन परिचय 

अंतोन चेख़व का जन्म सन 1860 में दक्षिणी रूस के तगनोर नगर में हुआ था। वे पढ़ने लिखने के बाद मास्को विश्वविद्यालय से डॉक्टर बनकर निकले। उन्होंने डॉक्टर के रूप में बहुत कम कार्य किया। उनका पहला नाटक 'निवानोव' 1887 में रंगमंच पर खेला गया। उसके बाद उनका सम्बन्ध मास्को थियेटर से बना रहा। सत्य के प्रति आस्था और निष्ठा, यही चेख़व की धरोहर है। 

उनके प्रारंभिक लेखन में हास्य - विनोद का काफी पुट मिलता है। चेख़व ने उन मौकापरस्त लोगों को बेनकाब करती कहानियां लिखी जिनके लिए पैसा और पद ही सब कुछ था। परन्तु बाद के लिखे हुए नाटक प्राय: दुखांत हैं। उनके नाटकों और कहानियों में विशेष अंतर यह है कि नाटकों में जहाँ उन्होंने बहुत से व्यक्तियों का चरित्र चित्रण किया है, वहां कहानियों में एक-एक व्यक्ति का चित्रण है। 

प्रसिद्ध नाटक : 'वाल्या मामा', 'तीन बहनें', 'सीगल', और 'चेरी का बगीचा'।

प्रमुख कहानियां - गिरगिट, क्लर्क की मौत, वान्का, तितली, एक कलाकार की कहानी, घोंघा, इओनिज, रोमांस, दुल्हन। 

इनकी मृत्यु सन 1904 में हुई। 

Friday, June 21, 2013

About Harishankar Parsai in Hindi


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हरिशंकर परसाई का जन्म 22 अगस्त, 1924 को मध्य प्रदेश के होशंगाबाद नामक गाँव में हुआ था। वे एक यथार्थवादी, चिंतनशील, संवेदनशील, सहित्यधर्मी, सृजनशील तथा प्रतिभा संपन्न रचनाकार थे। 

उनकी प्रारंभिक शिक्षा इटारसी में हुई। पढ़ने की तीव्र अभिलाषा के कारण ही उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से हिंदी में एम० ए० किया था। परसाई जी अपने लेखन के प्रति ईमानदार थे। उन्होंने अपने अनुभव एवं लेखन के साथ कभी समझौता नहीं किया। 

साहित्य अकादमी ने सन् 1982 में 'विकलांग श्रद्धा का दौर' नामक रचना के लिए परसाई जी को 'अकादमी पुरस्कार' से सम्मानित किया। उसी वर्ष जबलपुर विश्वविद्यालय ने अपने रजत जयंती समारोह के अवसर पर उनको 'डी० लिट०' की मानक उपाधि प्रदान की। 

प्रमुख रचनाएँ - 'भोलाराम का जीव', 'वैष्णव की फिसलन', सदाचार का तावीज', 'एकलव्य ने गुरु को अंगूठा दिखाया', 'राजनीति का बँटवारा', 'आमरण अनशन', 'गांधीजी का शाल', 'बेईमानी की परत', 'ठिठुरता हुआ गणतंत्र', तथा 'विकलांग श्रद्धा का दौर' आदि। 

दो उपन्यास - 'तट की खोज' तथा 'रानी नागफनी की कहानी'।

Monday, June 17, 2013

Poem on Rainy Season in Hindi


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ये बारिश की बूंदे 
सिर्फ पानी की बूंदे नहीं है मेरे लिए 
इनमें बसे हैं, ना जाने कितने लम्हें 
जो जीए थे मैंने सिर्फ तेरे लिए 

मेरी आँखों पर इनकी छुअन 
जगा देती है उन ख्वाबों को 
जो हम तुम मिलकर देखा करते थे 
और होठों पर इनका स्पर्श पाकर 
गुनगुनाने लगती हूँ वो सारे गीत 
जो तुम बस मेरे लिए गाते थे 

ये सिर्फ मुझे नहीं भिगोती 
भिगो देती हैं मेरी रूह को कुछ ऐसे 
बुझते अंगारों पर डाले हो 
घी के छींटे किसी ने जैसे 

काश! मौसम की इस पहली बारिश को 
देख पाती तुम्हारे साथ 
जीती उन सारे लम्हों को फिर से 
तेरे हाथों में देकर अपना हाथ 

Monika Jain 'पंछी'

Poem on Save Trees in Hindi

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सुनो-सुनो क्या नानी कहती
हवा सुहानी अब ना बहती

पेड़ों से जो थी हरियाली
घर का आँगन अब है खाली

चिड़ियाँ अब ना गीत सुनाती
घर आँगन में अब ना आती

पेड़ों के कट जाने से
रूठे बादल बरसाने से

धरती माँ अब बाँझ हुई
घनघोर अँधेरी साँझ हुई

पंछी का रैन बसेरा छूटा
मीठा था जो ख़्वाब वो टूटा

विष में घुलती वायु है
घटती मानव की आयु है

पेड़ों से मानव प्यार करो
मित्रों सा व्यवहार करो

पेड़ लगाकर मानव तुम
खुद अपना उपकार करो.

 Monika Jain 'पंछी'

Sunday, June 16, 2013

Story on Heaven and Hell in Hindi


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एक साधक था। एक योद्धा उसके पास आया और कहने लगा - महाराज! स्वर्ग क्या है और नरक क्या है, मुझे बताएं। उसके हाथ में तलवार थी। उसे देखकर साधक बोला - तुम बहुत बड़े योद्धा बनते हो। व्यर्थ ही तलवार लटका रखी है किन्तु तुममें तेज नाम की चीज नहीं है। इतना कहना योद्धा का अपमान करना था। वह सोचने लगा - मैंने तो इन्हें कुछ कहा भी नहीं और इन्होंने इतनी बकवास कर डाली। साधक ने जब देखा की उसने क्रोध में आकर तलवार खींच ली है और क्रोध में उबलने लगा है तब उसने कहा - यही नरक है। यह सुनते ही योद्धा के हाथ से तलवार गिर गयी। वह क्षमा मांगने लगा। तब साधक ने कहा - यही स्वर्ग है। 
वस्तुतः अपने अहम् पर चोट लगने से जो कषाय बढ़ता है वह नरक का द्वार है और कषाय की उपशांति ही स्वर्ग का द्वार है। 

Courtesy : Swadhyay Sandesh

Saturday, June 15, 2013

Poem on Society Today in Hindi


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आज का आदमी काम से नहीं, दाम से मतलब रखता है 
आज का आदमी दान से नहीं, नाम से मतलब रखता है 
शरीर की चमक से अब आत्मा धुंधली हो गयी है बन्धु 
आज का आदमी गुठली से नहीं, आम से मतलब रखता है। 

आज खरा सोना भी शक की नजर से देखा जाता है 
आँखों देखे हाल पर भी विश्वास नहीं आता है 
संदेह का समीकरण सही है या गलत कैसे जानें बन्धु 
आदमी औरों से तो क्या, अपने आपसे धोखा खाता है।

सुन्दरता का प्रतीक कमल, कीचड़ से रंगा होता है 
तेजस्विता का प्रतीक कनक, सुहागे से चंगा होता है 
किसी के बाह्य स्वरुप को देख, पागल मत बनो बंधु 
परिधान के अन्दर हर एक आदमी नंगा होता है।

गलतियाँ आदमी को संभलने का मौका देती है 
युक्तियाँ आफत से बच निकलने का मौका देती है 
आवश्यकता है आदमी इन बातों को आचरित करे 
सूक्तियां सन्मार्ग पर चलने का मौका देती हैं। 

आदमी ही आदमी को भिखमंगा बना रहा है 
कभी बिल्ला तो कभी उसे रंगा बना रहा है 
धरती को माँ, उसने माना है सदा ही 
पर वृक्ष काट उसको वह नंगा बना रहा है। 

राष्ट्रसंत, प्रवर्तक श्री गणेश मुनिजी शास्त्री 

Friday, June 14, 2013

Way of Talking Story in Hindi


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एक राजा था। उसने स्वप्न में देखा कि उसके सारे दांत गिर गए हैं। इससे वह चिंतित हुआ प्रातः होते ही उसने ज्योतिषियों को बुलाया और उसका फल पूछा। एक ज्योतिषी ने कहा - महाराज! स्वप्न बड़ा अशुभ है, इसका बुरा फल होने वाला है। क्या फल होगा ? पूछने पर उसने बताया महाराज! इसका फल यही है कि आपके देखते देखते आपकी सारी संतान मर जायेगी। यह सुनकर राजा चिंतित हुआ और अशुभ बात कहने वाले को जेल में डाल दिया। दूसरे ज्योतिषी को बुलाया तो उसने कहा - महाराज! बहुत अच्छा स्वप्न है। राजा आश्चर्य चकित हुआ, पूछा - यह कैसे ? तो उसने उत्तर दिया - आप इतनी दीर्घायु प्राप्त करेंगे कि आपकी मृत्यु कोई नहीं देख सकेगा। राजा उससे प्रसन्न हुआ और उसे पुरस्कार दिया। 
बात एक ही है, सिर्फ कहने में अंतर है। फलितार्थ एक ही है। 

Courtesy : Swadhyay Sandesh

Thursday, June 13, 2013

Poem on Hindustan Pakistan in Hindi


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ये जो हिन्द पाक में तनातनी है 
स्थिति इनकी ये कबसे बनी है ?

इतने सालों में निकला नहीं 
इसका कोई हल 
सरकारे भी राजनीति कर 
जनता को रही है छल 
निदान नहीं सिर्फ आपसी वार्तालाप 
संपर्क ट्रेने और मेल मिलाप 
मिटनी चाहिए दिल से आपसी दुश्मनी है 

ये जो हिन्द पाक में तनातनी है 
स्थिति इनकी ये कबसे बनी है ?

इंसान से इंसान की नफरत 
ये तो हो गयी है इंसानी फितरत 
आतंक मचाना, खून बहाना 
चोट करना लगाकर घात 
अब हो गयी है आम बात 
कठिन नहीं यह काम 
होती बहुत आसानी है 

ये जो हिन्द पाक में तनातनी है 
स्थिति इनकी ये कबसे बनी है ?

कुर्सी की खातिर हुआ बँटवारा 
फिर दंगों ने हजारों को मारा 
बच्चे बूढ़े हुए अनाथ 
औरतें हुई बेघर बेसहारा 
रुक सी गयी जीवन की धारा 
वर्षों से खेलते रहें 
सरहदों पर खेल खूनी है

ये जो हिन्द पाक में तनातनी है 
स्थिति इनकी ये कबसे बनी है ?

आतंकियों ने की सीमाएँ पार 
लिए हाथ में बन्दूक और तलवार 
झूठी नफ़रत और घृणा से 
किया इंसानी सीने पर वार 
करुण क्रंदन और चीखें कह रही है 
सुहागनों की मांग और माताओं की गोद 
अब तो हो गयी सूनी है 

ये जो हिन्द पाक में तनातनी है 
स्थिति इनकी ये कबसे बनी है ?

अनिल कुमार बिहारी 
ट्यूब बारीडीह, जमशेदपुर 

Monday, June 10, 2013

Poem on Eye Donation in Hindi


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आज जब देखा एक नेत्रहीन को 
सोचा 

कितने भाग्यशाली हैं हम 
जो देख सकते हैं सारी दुनिया
सोचो जरा उनके बारे में 
जिन्हें नसीब ना हो पायी 
जीवन की रंग बिरंगी झलकियाँ 

जीवन के हर रंग से है वो बेखबर 
प्रकृति की सुन्दरता देखने को 
नहीं मिली उन्हें कोई नज़र 

क्या हमारा कर्त्तव्य नहीं 
कि हम कर दें उनके अंधेरों को रोशन 
मृत्यु के बाद अपने नेत्र दान कर 
दे दें उन्हें एक नया जीवन 

कितना अच्छा होगा 
जब हमारे जाने के बाद भी हमारी आँखें 
इस रंग बिरंगी दुनिया को देख पायेगी 
अब तक जिनके सोये थे सपने 
उनके जीवन में नए रंग लाएगी 

Monika Jain 'पंछी' 

Friday, June 7, 2013

Essay on Crime, Human Values in Hindi


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अख़बार के पन्ने पलटते हुए सहसा नज़र एक ख़बर पर पड़ी. खबर कुछ यों थी- एक घर के बाहर तीन महिलाएँ आई और पानी पिलाने को कहा. मकान मालकिन अकेली थी और जब पानी लेने अंदर गयी तो एक महिला ने शीशी खोलकर रुमाल में नशीला पदार्थ डाल दिया. जब मकान मालकिन पानी लेकर बाहर आई तो उसे रुमाल सुंघा दिया गया. वह बेहोश होकर घिर गयी और फिर वे तीनो महिलाएँ घर से कुछ जेवर और रुपये लेकर फरार हो गयी. 

अब प्रश्न ये उठता है कि आगे से जब भी कोई उसी घर के सामने पानी पिलाने को कहेगा तो क्या वह महिला पानी पिलाएगी ? भले ही कोई भला इंसान जो बहुत ज्यादा प्यासा हो तो भी उसे शायद प्यासा ही वहां से जाना पड़े और वह महिला ही क्यों जो भी इस खबर को पढेंगे या इसके बारे में सुनेंगे वे भी आगे से सतर्क हो जायेंगे. मेरे घर में भी आज तक जब भी कोई घर के बाहर पानी पिलाने को कहता था तब तक बिना किसी संदेह और डर के हमेशा पानी पिला दिया जाता था पर इस खबर का असर शायद आने वाले दिनों में दिखे. 

लिफ्ट लेने के बहाने गाड़ी रुकवाकर लूट और हत्या की घटनाएँ भी हमने सुनी है. और इसका असर ये है कि अब कोई मुसीबत का मारा घंटो हाथ हिलाता रहे पर कोई गाड़ी उसकी मदद के लिए नहीं रूकती. 

हमारे पड़ोस में एक आंटी रहती थी. एक बार उनका भाई उनके घर रुका था और वह अपनी बहन की ही ज्वेलरी लेकर फरार हो गया. मतलब अब रिश्तों पर भी आसानी से भरोसा नहीं किया जा सकता और किसी रिश्तेदार को घर पे ठहराने से पहले भी शायद सोचना पड़े. 
चाइल्ड रेप के ज्यादातर मामलों में नज़दीकी पहचान वाले ही दोषी पाए जाते है. ऐसे में किस पर भरोसा किया जाये? 

सड़क पर दुर्घटना होती है पर लोग आँख बंद करके निकल जाते है. कोई किसी की मदद करता भी है तो पुलिस और राजनीति के चक्र में ऐसा फंसता है कि आगे से मदद करने लायक ही नहीं बचता. 

इन सब घटनाओं की वजह से मुझे एक ऐसा समाज दिखाई पड़ रहा है जहाँ कोई किसी की मदद या तो करता ही नहीं या करने से पहले हजार बार सोचता है क्योंकि उसे डर है कि सामने वाला इंसान कहीं उसे ही न ठग ले....जहाँ लोगों के सामने कोई भी अवांछनीय घटना हो रही है पर सब आँखों पर पट्टी बांधे हुए है ....जहाँ कोई चीख-चीख कर मदद के लिए पुकार रहा है पर जिन कानो पर वह चीख पड़ती है वे सब कान बहरे है..... जहाँ लोगों के बीच असुरक्षा और अविश्वास बढता जा रहा है ....जहाँ लोगों में स्वार्थ इस कदर बढ़ गया है कि पैसो से बड़ा न ही कोई रिश्ता बचा है ना ही कोई नैतिक मूल्य

किस दिशा में बढ़ रहे है हम ? क्या यहीं हमारी मंज़िल है ? ऐसे कई प्रश्न मेरे दिमाग़ में उठ रहे थे. तभी एक दोस्त ने एक कहानी याद दिलाई. 

एक बार एक साधु एक बिच्छू को पानी में डूबते हुए देखता है और उसे बचाने की कोशिश करता है पर बिच्छू उसे डंक मार देता है. ऐसा ३-४ बार होता है. एक राहगीर जो वहाँ से गुजर रहा होता है वह साधु से पूछता है आप क्यों इसे बचा रहे है जबकि यह आपको डंक मार रहा है. साधु बोलता है यह बिच्छू की प्रवृति है कि वह डंक मारे और यह मेरी प्रवृति है की मैं उसे बचाऊँ. मैं अपने धर्म से पीछे कैसे हाथ सकता हूँ . 

आज के समय यह कहानी कितनी प्रासंगिक है ये तो नहीं कह सकती पर हाँ सतर्क रहकर भी हम अपने कर्तव्यों का पालन कर सकते हैं. 

 Monika Jain 'पंछी' 

Wednesday, June 5, 2013

Good Morning Quotes in Hindi


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  • मेरा हर दिन सर्वश्रेष्ठ है। यह मेरी ज़िन्दगी है और यह क्षण मेरे पास दोबारा नहीं होगा ~ बर्नी सीगल 
  • जिसका व्यक्तित्व जितना ऊँचा होगा उतना ही वह गंभीर होगा ~ अज्ञात 
  • ऐसी बहुत सी चीजें हैं जो हम फ़ेंक देते यदि हमें इस बात की चिंता नहीं होती कि कोई और उन्हें उठा लेगा ~ ऑस्कर वाइल्ड 
  • संसार एक कड़वा वृक्ष है जिसके दो ही फल मीठे हैं - मधुर वाणी और सज्जनों की संगति ~ चाणक्य 
  • दरिद्र से दरिद्र हिंदुस्तानी मजदूर भी शिक्षा के उपकारों का कायल है। उसके मन में यह अभिलाषा होती है कि मेरा बच्चा पढ़ जाए। इसलिए नहीं कि उसे कोई अधिकार मिलेगा, बल्कि केवल इसलिए कि विद्या मानवी शील का एक शृंगार है ~ मुंशी प्रेमचंद

Monday, June 3, 2013

Poem on Hope in Hindi


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आशा! आशा! आशा! 
सबकी है ये आशा 
कब पूरी होगी 
अपनी अभिलाषा 

जितना जाओ पास 
उतना दूर वो जाती है 
फिर भी ये अभिलाषा 
छोड़ी नहीं जाती है 

मन की इस अभिलाषा को 
हम श्रम से सजाते हैं 
और अपने जीवन पथ पर 
आगे बढ़ते जाते हैं 

जीवन में वे ही सफल कहलाते हैं 
जो आशा को कर्म के साथ अपनाते हैं 
वो नहीं जो सारी उम्र 
आशा के भरोसे रह जाते हैं 

Naveen Kumar
                         

Saturday, June 1, 2013

Poem on Aids Day in Hindi


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पार्क में आँख मिचौनी खेल रहे बच्चों से 
कुछ पल के लिए नज़रें हटी 
तो देखा 
एक कोने में 
एक मासूम सी बच्ची 
अकेले खुद से बातें करते 
खेल रही थी कुछ पत्थर के टुकड़ों से 

उसकी मासूमियत से खिंची 
 मैं उसके पास गयी 
पर मुझे देख वो मासूम 
सहम सी गयी
मैंने प्यार से उसके सर पे हाथ फेरा 
 वो अचानक उठकर 
दूर जा खड़ी हुई 

उसका ये बर्ताव 
मैं समझ नहीं पायी 
बच्चे होते हैं मनमौजी
 यह सोचकर लौट आई  

खेलते बच्चों के ग्रुप से 
एक बच्चा पास आया 
और दूर बैठी उस लड़की कि ओर
 इशारा करके बोला

दीदी अब उस लड़की को कभी नहीं छूना 
उसे एड्स है आप उससे दूर ही रहना 
हमारे मम्मी पापा ने हमें मना किया है 
उसके साथ कभी ना खेलने का आदेश दिया है 

यह कहकर वह बच्चा फिर से खेलने दौड़ गया 
पर मेरे मन मस्तिष्क में 
ना जाने कितने सवाल छोड़ गया 

मैं देर तक उस मासूम को देखती रही
क्यों घिरा उस पर ये वज्र 
जिसकी कोई गलती भी नहीं 
उस पर उसका बहिष्कार करता यह संकीर्ण समाज 
उफ्फ ! जितना भी सोचूं 
मैं खुद में और ज्यादा उलझती गयी

Monika Jain 'पंछी'