Saturday, August 31, 2013

Poem on Religion in Hindi


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जब से धर्म ने लिया है व्यापार का स्वरुप 
बन गया है ये बेहद कुरूप।

अपराधियों की ढ़ाल बन बैठा है 
बाबाओं का माल बन बैठा है 
चूस कर मासूमों  का खून 
 मानवता का काल बन बैठा है।

धर्म की आड़ में हो रहे सब बुरे काम हैं 
मनमानी करने के भी क्या खूब इंतजाम हैं 
छीन कर आम जन का सुख और चैन 
ढोंगी बाबाओं को आराम ही आराम है।

अंध भक्तों का भी ज़वाब नहीं 
उनके अंधविश्वासों का कोई हिसाब नहीं 
खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना 
हकीकत है ये कोई ख़्वाब नहीं।

धर्म का चोला पहन अधर्म बोल रहा है 
पैसों में भावनाओं को तौल रहा है 
इतना सब कुछ हो रहा पर 
खून किसी का ना खोल रहा है।

Monika Jain 'पंछी'

Sunday, August 25, 2013

Poem on Cheating in Love in Hindi


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जानती हूँ तुमने मुझसे कभी 
प्यार किया ही नहीं 
किया था तुमने जो इजहार 
वैसा कुछ कभी था ही नहीं।

जानती हूँ 
झूठी थी तुम्हारी सारी बाते 
और खोखले थे 
तुम्हारे सारे वादे।

जानती हूँ तुम्हारा मेरी परवाह करना 
बस एक दिखावा था 
हाँ जानती हूँ मैं तुम्हारा प्यार 
बस कोरा छलावा था।

 लिखी थी तुमने जो प्रेम कवितायेँ
आज मुझ पर अट्टाहस कर रही है
मेरी  मासूमियत और पागलपन पर 
देखो ! आज वो भी हँस रही है।

हर हाल में मुझको चाहने के 
जीवन भर साथ निभाने के 
वादें तेरे बड़े-बड़े 
थे बस मुझको बहलाने के।

मेरी ना को हाँ में बदलना 
बस यहीं जूनून तुझ पर सवार था 
जानती हूँ इश्क तेरा एक धोखा 
और झूठा तेरा प्यार था।

सब जानते हुए भी ये पागल दिल 
क्यों अनजान बनना चाहता है 
झूठा ही सही लेकिन तेरा 
क्यों प्यार पाना चाहता है ?

Monika Jain 'पंछी'

Friday, August 23, 2013

Poem on Girl in Hindi



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माँ !
क्या हुआ जो मैं लड़की हूँ 
क्या मैं तेरा अंश नहीं 
क्यों मुझसे तेरा वंश नहीं ?

सोच के लड़की हूँ मैं माँ!
क्यों तू इतना घबराती है 
कौन सा ऐसा काम है जिसमें 
लड़की लड़कों से मात खाती है ?

मैं भी पढ़ लिखकर एक दिन 
 पैरों पे खड़ी हो जाउंगी 
नाम करुँगी तेरा रौशन 
सम्मान तेरा मैं बढ़ाऊँगी। 

तेरी जिम्मेदारी अपने 
कन्धों पर मैं उठाऊँगी 
नहीं हूँ बेटा पर तेरे 
सुख-दुःख में साथ निभाऊँगी।  

माँ !
मुझसे ही तो चलती है 
ये सृष्टि और ये दुनिया 
फिर क्यूँ मुझको कमतर समझे 
ओ मेरी प्यारी मैया !


Monika Jain 'पंछी'

Wednesday, August 21, 2013

Suvichar in Hindi


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किसी दार्शनिक से  किसी समय एक जिज्ञासु ने पूछा - राष्ट्र की व्यवस्था के लिए मूलभूत किन-किन चीजों की आवश्यकता होती है ? उस दार्शनिक ने जवाब दिया - अनाज, सेना और सुसंस्कार। ये तीन बिंदु ऐसे हैं जिनपर किसी भी राष्ट्र की सुरक्षा टिकी है। जिज्ञासु ने पुनः पूछा - यदि इनमें से किसी चीज की कमी हो तो क्या उससे काम चल जाएगा। दार्शनिक ने कहा - सेना के अभाव में अनाज और संस्कार के बल पर राष्ट्र टिक सकता है। जिज्ञासु ने पुनः पूछा - यदि किसी दो की कमी हो तो फिर क्या होगा ? दार्शनिक ने कहा - कदाचित सैनिक के अभाव में राष्ट्र चल सकता है, अनाज के अभाव में राष्ट्र चल सकता है, लेकिन जिस राष्ट्र के सुसंस्कार समाप्त हो गए, उसका अस्तित्व कुछ नहीं रह सकता। 

रेलवे में यात्रा करने वाला व्यक्ति समय की अनुकूलता देखकर तय करता है कि आगे आने वाले रेलवे जंक्शन पर जहाँ गाड़ी काफी देर ठहरती है, जहाँ पर निवृत होने की सब सामग्री मिल जाएगी, वहां पर भोजनादि से भी निवृत होकर सुख प्राप्त करेंगे. वैसे ही अनंतकाल तक अलग-अलग योनियों में भटकने के बाद मनुष्य गति रेलवे जंक्शन के समान है. यदि इस रेलवे जंक्शन पर हमने संसार से निवृति का प्रयास नहीं किया तो छोटे - छोटे स्टेशनों पर तो शांति मिलने वाली नहीं है.

Courtesy : Swadhyay Sandesh 

Short Poems in Hindi



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गैरों के हाथों छूटे तो 
अपनों ने ग़ुलाम बना लिया
आज़ादी को तो बस एक 
भ्रम का नाम बना दिया
क्यों मनाये हर वर्ष 
आज़ादी का उत्सव
जब आज़ादी को ही कुछ लोगों ने 
ग़ुलाम बना दिया.

कल्पना के वायवी पंख लगाकर 
दूर सेर कर आई हूँ
अब कुछ ऐसी शक्ति दो 
ये पंख कभी न खो पाए
पलकों के नीचे जीवन के 
सपने संजोती आई हूँ
पर खुली आँखों में भी 
सपने कभी न सो पाए. 

 Monika Jain 'पंछी'


Monday, August 19, 2013

Story of King and Beggar in Hindi


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एक भिखारी बैठा था। उसी रास्ते से राजा की सवारी निकलने वाली थी पुलिस ने आकर कहा - हटो, राजा की सवारी आ रही है। भिखारी बोला - क्यों हटूं, रास्ता सभी का है। पुलिस ने कहा - राजा वह होता है जो हर किसी को अपने देश से निकाल सकता है। अच्छा! इतना समर्थ हैं राजा। तो उससे कहो - इन सारे मच्छर मक्खियों को राज्य के बाहर निकाल दो। उसके उत्तर से पुलिस चकित हो गयी। उसने कहा - राजा बहुत बड़ा आदमी होता है, उसके महल पर रात दिन पहरा लगता है। अच्छा, तो वह एक कैदी है।

इतने में राजा की सवारी आ गयी। वह एक मंदिर के आगे आकर रुकी। राजा मूर्ति के सामने खड़े होकर मांगने लगा - हे प्रभो! मेरे वैभव सम्पदा को बढ़ाना आदि। भिखारी कोने में खड़ा-खड़ा सुन रहा था। राजा की दृष्टि उस पर पड़ी। उसने कहा - कुछ चाहते हो ? मांगो, जो मांगना है। उस भिखारी ने कहा - आया तो था कुछ मांगने। किन्तु अभी मैंने देखा है कि आप भी भिखारी हैं। मैं छोटा भिखारी हूँ, आप बड़े भिखारी हैं। भिखारी भिखारी को क्या देगा। 

Courtesy : Swadhyay Sandesh 

Sunday, August 18, 2013

Story on Resolution in Hindi


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गुरु के साथ शिष्य चले जा रहे थे।  रास्ते में एक बड़ी चट्टान दिखी। शिष्य ने गुरु से पूछा - गुरुदेव! यह चट्टान बड़ी कठोर है, क्या चट्टान से कठोर कोई चीज है ? गुरु कुछ बोलें, इससे पहले ही दूसरा शिष्य बोला - चट्टान से भी कठोर लोहा है जो इस चट्टान को भी तोड़ सकने की सामर्थ्य रखता है।  तो पहले वाले शिष्य ने पुनः पूछा - गुरुदेव! तो क्या लोहे से भी ज्यादा कोई कठोर चीज है ? तीसरे शिष्य ने तुरंत जवाब दिया - लोहे से भी ज्यादा प्रभावशाली अग्नि है जो लोहे को भी गला देने की सामर्थ्य रखती है। तभी चौथे शिष्य ने कहा कि गुरुदेव! अग्नि से ज्यादा प्रभावशाली है पानी जो अग्नि को भी बुझा देने का सामर्थ्य रखता है।  शिष्य की बात पूरी हो ही नहीं पायी थी कि अगले शिष्य ने कहा - गुरुदेव! मुझे तो पानी से भी प्रभावशाली दिखाई पड़ती है हवा। जो पानी को भी उड़ा ले जाती है। शिष्यों का यह क्रम चल रहा था। अगला शिष्य कुछ बोलने वाला ही था कि गुरु बोले - सुनो, सबसे ज्यादा प्रभावशाली यदि कुछ है तो वह है मनुष्य के मन का संकल्प। मनुष्य अपने संकल्प के बल पर पाषाण को तोड़ सकता है, लोहे को गला लगा सकता है, आग को बुझा सकता है और पानी को उड़ा सकता है। सब कुछ मनुष्य के संकल्प पर है। मनुष्य का संकल्प यदि दृढ़ है तो बुरे से बुरे संस्कारों को भी जीता जा सकता है।

Courtesy : Swadhyay Sandesh 

Miss You Shayari in Hindi


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भीगने का शौक है ना तुम्हें 
पर ये बारिश हर एक के लिए होती है 
जरा देखो मेरी इन आँखों में 
जो बस तुम्हारी याद में रोती है.

कब से तेरी यादों में खोयी हूँ 
ना जाने कितनी बार रोयी हूँ 
शायद तू आ जाए मेरे सामने 
बस इसी इंतजार में 
आँखें खोल कर सोयी हूँ.  

तू भी नहीं आता और 
ये मौत भी नहीं आती है 
फिर ये कमबख्त यादें 
क्यों हर पल मुझे सताती है.  

ज़िंदगी के कुछ खास लम्हें
जो बिताये थे तुमने और हमने 
बन चुका है अब यादों का एक पिटारा 
जो खुलता है कभी ख़ुशी कभी गम में. 

कितनी अजीब है ना ये यादें 
बे-मौसम की बारिश सी आती है 
भीग जाती है मेरी पलके 
पर दिल को सूना छोड़ जाती है. 

Monika Jain 'पंछी'

Beautiful Quotes in Hindi


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  • कोई भी बात इसलिए सच्ची नहीं हो सकती कि वह बहुत दिनों से बहुत लोगों द्वारा कही जाती रही है ~ शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय 
  • मनुष्य का उद्दार पुत्र से नहीं, अपने कर्मों से होता है. यश और कीर्ति भी कर्मों से प्राप्त होती है. संतान वह सबसे कठिन परीक्षा है, जो ईश्वर ने मनुष्य को परखने के लिए दी है. बड़ी-बड़ी आत्माएं, जो सभी परीक्षाओं में सफल हो जाती हैं, यहाँ ठोकर खाकर गिर पड़ती हैं ~ मुंशी प्रेमचंद 
  • हमारा युग दुर्बलताओं और ध्वंस का युग है. दुर्बलता और ध्वंस जितने प्रसारगामी होते हैं, शक्ति और निर्माण उतने नहीं हो सकते ~ महादेवी वर्मा 
  • मनुष्य के पास कुछ होने और बनने की स्वतंत्रता है. वह कुछ भी बन सकता है. अच्छे से अच्छा और बुरे से बुरा. इसलिए तो इतनी नाउम्मीदों में भी उम्मीद नाम की चीज अभी तक कायम है ~ अमृता प्रीतम 
  • दुनिया केवल दुकान ही नहीं है. बाट से तौल कर निश्चित कर देने से ही मनुष्य का मनुष्य के प्रति जो कर्त्तव्य है, वह समाप्त नहीं हो जाता, अक्षम मनुष्य को भी जीने का अधिकार है. जीवित रहने का उसका अधिकार इसलिए समाप्त नहीं हो जाता कि उसमें काम करने की सामर्थ्य नहीं है ~ शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय 
  • मनुष्य स्थावर वृक्ष का नहीं है. वह जंगम प्राणी है. चलना मनुष्य का धर्म है, जिसने इसे छोड़ा, वह मनुष्य होने का अधिकारी नहीं है ~ राहुल सांकृत्यायन 
  • अगर सुचना देना या पुस्तक पढ़ना ही शिक्षा का अर्थ होता तो पुस्तकालय विश्व के महान संत के रूप में स्वीकार किये जाते. जिसको पूरा पुस्तकालय कंठस्थ है, उसकी अपेक्षा मैं उस शिक्षक को अधिक प्रभावी मानता हूँ जो छात्रों के व्यक्तित्व का निर्माण करता है ~ स्वामी विवेकानंद 
  • नीतिज्ञ के लिए अपना लक्ष्य ही सब कुछ है. आत्मा का उसके सामने कुछ मूल्य नहीं. गौरव सम्पन्न प्राणियों के लिए चरित्र बल ही सर्वप्रधान है ~ मुंशी प्रेमचंद 

Wednesday, August 14, 2013

Love Ghazal in Hindi


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ख़ालिस आशिक़ी है, हम कोई पैतरा नहीं करते
क़ीमत ही नहीं दिल की वरना, पहरा नहीं करते ?

गर हुनर नहीं मुसलसल रंजो-ग़म सहने का 
नाखूनों से यूँ ज़ख्मों को कुरेदा नहीं करते। 

आशिक़ी में गुनगुनाती हैं आंखे हुस्न तुम्हारा 
हर गजल को लफ़्ज़ों में उकेरा नहीं करते।

हर मुलाक़ात लेकर आती है जुदाई का नसीब 
पर कह के 'अपना' नज़रों को फेरा नहीं करते।

नहीं मानोगे मेरी बात, इश्क़ में समझाऊँ क्या 
‘रणधीर’ मुहब्बत में कोई तेरा–मेरा नहीं करते।

By Randhir 'Bharat' Choudhary


Monday, August 12, 2013

Poem on Independence in Hindi


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यह स्वतंत्रता कैसी है ?
यह कैसी है आज़ादी ?
महंगाई छूती आसमान और
हर पल बढ़ती आबादी.

सरकार देश की ये कैसी ? 
और कैसे हैं ये नेता ?
लूट-लूट कर देश को खाते
फिर भी पेट ना भरता.

खींचातानी भाषाओं की
क्षेत्रवाद का जहर है फैला
आरक्षण का लगता है
नित रोज यहाँ पर मेला.

अपनो ने अपनो को लूटा
गैरों से क्या करे शिकायत
स्वार्थ में भूखे अंधे नेताओं पर
अब है लानत.

माँ के रक्षक बने है भक्षक
कहाँ गुहार लगायें ?
गुलाम हुई अब आज़ादी भी
कैसे इसे छुड़ायें ?

आह गरीबों की सुनने को
यहाँ न कोई अपना
आज़ाद देश की आज़ादी अब
बन कर रह गयी सपना.

Monika Jain 'पंछी' 

Saturday, August 10, 2013

Poem on Aaj ki Nari in Hindi


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मैं शादी में विश्वास करती हूँ 
पर शादी की प्रमाणिकता के लिए 
अपनी मांग में सिन्दूर 
गले में मंगलसूत्र
हाथों में चूड़ियाँ 
पाँव में पायल और 
बिछिया पहनने में नहीं।

ये शृंगार के लिए पहने जाए 
इसमें मुझे आपत्ति नहीं 
पर शादी के नाम पर 
इन्हें थोपा जाए 
ये मुझे मंजूर नहीं।

बेटी को जायदाद में 
बराबर का हक़ मिले 
इसमें मेरा विश्वास है 
पर शादी के नाम पर 
होने वाले लेनदेन और 
दहेज़ में नहीं।

जीवनसाथी के प्रति 
सम्मान को मैं जरुरी मानती हूँ 
पर अपने पति को 
नाम से ना बुला सकने के 
रिवाज को नहीं।

पति की लम्बी उम्र 
कौन नहीं चाहेगी ?
पर इसके लिए किये जाने वाले 
व्रत और उपवास में 
मेरी मान्यता नहीं। 

परिधान में शालीनता की बात 
मैं अवश्य मानती हूँ 
पर शादी के बाद ससुराल में 
साड़ी ही पहनी जाये 
ये बिल्कुल भी नहीं।

संयुक्त परिवार
आपस में प्यार 
हर रिश्ते को दिल से अपनाना 
अपने सभी कर्तव्यों को निभाना 
त्याग और समर्पण की भावना 
परिवार को एक सुत्र में बांधना 
इन सबमें  विश्वास करती हूँ 
पर बेवजह की परम्पराओं को 
ढ़ोने में नहीं। 

क्योंकि में आजादी का हक़ चाहती हूँ 
बहु नहीं, मैं एक बेटी बनना चाहती हूँ।

Monika Jain 'पंछी'

Friday, August 9, 2013

Poem on Teej Festival in Hindi


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हरी भरी हरियाली तीज 
संग लायी ढेरों त्यौहार 
खुशियों और उमंगों की 
हर घर में छायी है बहार। 


श्रावण माह के शुक्ल पक्ष में 
तृतीया तिथि को आती है 
युवती और महिलाएं 
सबके मन को ये हर्षाती है। 

पति की लम्बी आयु का 
वर ईश्वर से पाने को 
रखती हैं व्रत कन्यायें भी 
योग्य हमसफ़र पाने को।  

कहते हैं माँ पार्वती ने 
इस दिन शिव को पाया था 
वर्षों के तप के पश्चात् 
यह शुभ अवसर आया था।  

मीठे-मीठे पकवानों की 
खुश्बूँ घर-घर से आई है 
सावन की हरियाली तीज 
सोने पे सुहागा लायी है।  


Monika Jain 'पंछी'

Poem on Autumn Season for Kids in Hindi


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देखो-देखो आया पतजड़ 
पत्ते गिर गए झर--.

देखो पत्तों ने  रंग बदले 
हरे बन गए लाल और पीले.

थोड़ी-थोड़ी ठण्ड बढ़ी 
दिन छोटे और राते बड़ी. 

फल मेवों की आई बहार 
और आये ढेरों त्यौहार.

 पशु करे भोजन का संग्रहण 
पक्षी करते हैं प्रवजन. 

मौसम है ये रंग बिरंगा 
कर दे सबके मन को चंगा. 

Monika Jain 'पंछी'

Wednesday, August 7, 2013

Story on Parents in Hindi


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"नया घर"

नौकर ने आकर शमशेर सिंह को बताया कि आपसे कोई मिलने आया है। शमशेर सिंह ने दरवाजे की ओर देखा तो उनके दफ़्तर का एक साथी मिठाई का डिब्बा और निमत्रंण पत्र हाथ में लिये खड़ा था। अपने मित्र से बातचीत करते हुए मालूम हुआ कि उसने अपना नया घर बनाया है और उसी के लिये न्योता देने आया है। शमशेर सिंह ने अपना दिल खोलते हुए उससे कहा कि मैं भी अगले साल रिटायर हो रहा हूँ, लेकिन मैने तो अभी तक अपना घर बनाने के बारे में सोचा ही नही। शमशेर सिंह जी के बेटे और बहू ने कहा कि हम तो आपसे कई बार कह चुके हैं कि आप भी जल्दी से अपना एक नया घर बना लो। जब तक आप नौकरी में हो तब तक घर बनाने में किसी किस्म की कोई परेशानी नहीं होगी। उसके बाद तो कई लोग टांग अड़ाने के लिये खड़े हो जाते हैं। शमशेर सिंह ने अपने बेटे से कहा कि आज कल घर बनाने के लिये बहुत सारे पैसों की जरूरत पड़ती है। बेटे ने झट से कह दिया कि आप एक बार आवाज तो दे कर देखो, बैंक वाले घर आकर कर्ज दे जायेंगे। आपको किसी प्रकार की जोड़-तोड़ करने की जरूरत ही नहीं। इसी बात को लेकर उनकी पत्नी ने भी दबाव बनाना शुरू कर दिया। भोले-भाले शमशेर सिंह जी अपनी पत्नी और बच्चो को खुशियाँ देने के लिये उनकी इस मांग के आगे झुक गये। 

अगले दिन से ही बेटे ने कुछ लोगो से सलाह-मशविरा करते हुए घर बनवाने का काम शुरू करवा दिया। घर बनाने के लिये बैंक से मोटा कर्ज भी शमशेर सिंह ने लेकर अपने बेटे को दे दिया। जैसे-जैसे शमशेर सिंह जी का सेवानिवृत्ति का समय नजदीक आने लगा, बेटे ने काम और तेज करवा दिया ताकि सरकारी बंगला छोड़ कर सीधा अपने घर में ही प्रवेश किया जा सके। एक दिन अचानक बैठे हुए शमशेर सिंह ने अपनी पत्नी से कहा कि हम लोग कई सालों से घूमने नही गये। अगर तुम चाहो तो रिटायर होने से पहले हम सरकारी खर्चे पर घूमने जा सकते हैं। बहू और बेटे ने कहा कि नेकी और पूछ-पूछ। इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है। जब तक आप लोग घूम-फिर कर वापिस आओगे तब तक घर भी बन कर तैयार हो जायेगा। उसने झट से एक ट्रैवल एजेंसी से कह कर उनका बढ़िया सा घूमने का प्रोग्राम बना दिया। टूर के दौरान बहू-बेटे से घर बनने के बारे में बात लगातार होती रही। कुछ समय बाद जब शमशेर सिंह जी अपना टूर पूरा करके वापिस आये तो अपने आलिशान घर को देख कर फूले नही समा रहे थे। अच्छे से सारे घर को निहारने के बाद इन्होने घर में प्रवेश किया। 

घर की खूबसूरती देखने के बाद शमशेर सिंह जी ने पूछा कि हमारा कमरा कौन सा है ? बेटे ने कहा कि यह आप क्या कह रहे हो? सारा घर ही आपका है, आप अलग से कमरे की क्या बात कर रहे हो। बहू ने जब खाना खाने के लिये कहा तो शमशेर सिंह जी ने कहा कि मैं काफी थका हुआ हूँ। जरा पहले नहा लूं फिर आराम से खाना खायेंगे। इसी के साथ उन्होंने कहा कि जरा हमारा सामान हमारे कमरे में रखवा दो। इतना सुनते ही शमशेर जी का बेटा फोन का बहाना बना कर बाहर निकल गया। बहू भी कमरे के नाम पर टाल-मटोल करने लगी। शमशेर सिंह की पत्नी ने कहा कि क्या बात है ? परेशान क्यूं हो रही हो? बहू ने घर के ड्राईवर को बुला कर इशारे से कहा कि इनका सामान घर के पीछे बने हुए कमरे में ले जाओ। इतना सुनते ही शमशेर सिंह जी और उनकी पत्नी के पैरों तले जमीन खिसक गई। बहू ने सफाई देते हुए कहा कि असल में जो कमरा आपके लिये बनाया था उसमें आपके बेटे ने अपना दफ़्तर बना लिया है। इस वजह से आपके लिये घर के पीछे अलग से एक कमरा बनवाना पड़ा है। सारी उम्र शानोशौकत के साथ सरकारी बंगले में राज करने वाले शमशेर सिंह जी चुपचाप घर के पिछवाड़े में नौकरों के लिये बने हुए कमरे में रहने के लिये चले गये। 

कमरे में दाखिल होते ही शमशेर सिंह की पत्नी ने उनसे कहा कि मैं सारी जिंदगी आपको समझाती रही हूँ  कि इतने नर्म मत बनो नहीं तो एक दिन यह दुनियां आपको खा जायेगी। यह आपके सीधेपन का ही नतीजा है कि आज आपके अपने बहू-बेटे आपको इस तरह से नचा रहे हैं। शमशेर सिंह ने अपनी पत्नी को दिलासा देते हुए कहा लगता है, तूने वो कहावत नही सुनी कि अगर कोई आपका दिल दुखाए तो उसका बुरा मत मानो, क्योंकि यह कुदरत का नियम है कि जिस पेड़ पर सबसे ज्यादा मीठे फल होते हैं, उसी को सबसे अधिक पत्थर लगते हैं। शमशेर सिंह जी के धैर्य को सलाम करते हुए जौली अंकल उनके बेटे और बहू को बताना चाहते हैं कि मां-बाप तो वो अनमोल नगीने होते है जो हमें मुफ्त में मिलते हैं, मगर इनकी कीमत का उस दिन पता चलता है जब यह खो जाते हैं। आप लोगो ने जिस प्रकार छल-कपट करके अपने माता-पिता से उनका नया घर छीना है, उसके बदले में आज से ही सावधान हो जाओ क्योंकि बहुत जल्द आपका भी नया घर कोई न कोई आपसे छीन सकता है। 

जौली अंकल

Saturday, August 3, 2013

Poem on Animals for Kids in Hindi



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 गुन-गुन-गुन भौंरा मंडराता 
भौं-भौं  करता कुत्ता आता
कूं-कूं  करती कोयल गाती 
मीठा सा कोई गीत सुनाती।

टर-टर-टर मेंढ़क की बोली 
देखो वो बन्दर की टोली 
लम्बी पूँछ, गिलहरी छोटी 
कुतर-कुतर कर खाती रोटी।

 तितली फूलों पर मंडराती
रंग बिरंगा नाच दिखाती 
चीं-चीं करती चिड़िया आती 
दाना चुग फुर्र से उड़ जाती।

डाल पे बैठा कौवा काला 
हिरण कितना भोला-भाला
जंगल में है शेर निराला  
बड़ी-बड़ी सी मूंछों वाला।

सब की अलग-अलग खूबियाँ 
जिनसे सुन्दर बनती दुनिया 
देख देखकर इन जीवों को 
हंसती मुस्काती है गुड़िया।

Monika Jain 'पंछी'

Thursday, August 1, 2013

Story on Mistakes in Hindi


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ज्ञानप्रकाश जी आज तकरीबन 35-40 साल बाद अपने पौते के साथ शहर से पैतृक गांव जा रहे थे। रास्ते में पुलिस वाले ने उनकी गाड़ी को रोककर चालान कटवाने को कहा। ज्ञान प्रकाश जी ने कहा कि भाई हमसे क्या भूल हो गयी है? पुलिस वाले ने अपनी भाषा में डांटते हुए कहा कि अब तुम गलती नही करोगे तो क्या हम चालान काटने के लिये तुम्हारी गलती का इंतजार करते रहेंगे ? जैसे-तैसे इस किस्से को निपटा कर गांव की जमीन पर कदम रखते ही उनकी आखों से आंसू बहने लगे। उनके पौते ने थोड़ा हैरान होकर अपने दादा से कहा कि क्या बात है ? आपकी तबीयत तो ठीक है? आप बच्चो की तरह क्यूं रो रहे हैं ? ज्ञान प्रकाश जी ने आखें साफ करते हुए कहा - बेटा मेरा सारा बचपन इस गांव की मिट्टी में खेलते हुए बीता है। पौते ने कहा तो क्या हुआ, आप तो बहुत हिम्मत रखते हो, आप जैसे इंसान की आखों में आसूं अच्छे नही लगते। बातचीत करते-करते ज्ञानप्रकाश जी की नज़र सामने लगे हाई स्कूल के बोर्ड पर पड़ गयी। चंद पल उसे अच्छे से निहारने के बाद ज्ञानप्रकाश जी ने अपने पौते से कहा कि बेटा मैंने अपनी स्कूल की सारी पढ़ाई इसी स्कूल से की थी। मैं जब इस स्कूल से पढ़ाई पूरी करके निकला था तो उस समय कभी सोचा भी नही था कि दौबारा इस गांव मे इतने अरसे तक आना ही ना होगा। 

यदि तू बुरा न माने तो कुछ देर इस स्कूल के अंदर घूम आये। पौते ने कहा लेकिन अब आपको यहां कौन पहचानता होगा? खामख्वाह अंदर जाकर समय बर्बाद करने वाली बात है। ज्ञानप्रकाश ने कहा एक बार अंदर जा कर स्कूल देखने का बहुत मन कर रहा है। दादा के कहने पर उनका पौता उन्हें अंदर ले गया। ज्ञानप्रकाश जी थोड़ी देर इधर-उधर घूमने के बाद सीधा प्रिंसीपल के कमरे की ओर बढ़ गये। दरवाजे पर चपरासी ने रोकते हुए कहा कि साहब अभी मीटिंग में है, आप थोड़ा इंतजार करो। कुछ देर बाद प्रिंसीपल ने चपरासी को कह कर उन्हें अंदर आने को कहा। ज्ञान प्रकाश जी ने अपना परिचय देने के साथ बताया कि समाज की बेहतरी के लिये वे कहानियां और अनेक किताबे लिख चुके हैं। प्रिंसीपल ने कुछ मशहूर पुस्तकों के नाम लेकर जब पूछा कि क्या यह सारी आपकी ही लिखी हुई है ? ज्ञानप्रकाश जी के हां कहते ही प्रिंसीपल साहब अपनी कुर्सी छोड़ कर उनके पैर छूने के लिये आगे आ गये। 

ज्ञानप्रकाश जी ने भी आशीर्वाद देते हुए कहा कि आप जैसे अध्यापक को यहाँ देख कर सच में मन बहुत खुश हो गया। प्रिंसीपल ने हाथ जौड़ कर ज्ञानप्रकाश जी से कहा कि मैंने तो कभी सपने में भी नही सोचा था कि जिस महान लेखक की पुस्तकें हम बरसों से बच्चों को पढ़ा रहे हैं उस महान लेखक से अचानक इस तरह से मुलाकात हो जायेगी। इतनी देर में चाय-नाश्ता आ गया। चाय पीते-पीते प्रिंसीपल ने ज्ञानप्रकाश जी से कहा कि आपकी किताबो को एक नज़र देखते ही कोई  भी कह सकता है कि आपने जिंदगी को बहुत ही करीब और अच्छे से समझा है। अगर आपकी इजाजत हो तो मैं आपसे एक बात जानना चाहता हूँ। ज्ञान प्रकाश जी ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा कि आपके मन में जो कोई  भी शंका हो आप खुलकर मुझ से बात कर सकते हो। प्रिंसीपल ने कहा कि जीवन में सब कुछ पा लेने के बाद भी ऐसी कौन सी चीज है जो हमें चैन से नही रहने देती। बिना एक पल की देरी किये ज्ञान प्रकाश जी ने प्रिंसीपल साहब को कहना शुरू किया कि हमारी छोटी-छोटी गलतियां ही हमें जीवन में सबसे अधिक परेशान करती है। हम लोग अक्सर भूल कर बैठते हैं, जब हम यह मानने लगते हैं  कि हम सब कुछ जानते है। जबकि असलियत तो यह है कि दुनियां में कोई भी इंसान ऐसा नही है जो सब कुछ जानता हो। इसी के साथ हमें यह नही भूलना चाहिये कि हर इंसान कुछ न कुछ जरूर जानता है। आमतौर पर हम एक और बड़ी भूल यह करते हैं  कि हम किसी भी बात को आधा-अधूरा सुनते हैं, उसके चौथाई  हिस्से को भी ढंग से नही समझते और उस बात पर बिना विचार किये झट से अपनी प्रतिक्रिया देने लगते हैं। 

अब प्रिंसीपल साहब ने कहा कि इस परेशानी से बचा कैसे जा सकता है? ज्ञान प्रकाश जी ने अपने ज्ञान का खज़ाना खोलते हुए कहा कि भूल छोटी हो या बड़ी उसे सुधारने का एक मात्र तरीका यही होता है कि उस विषय के बारे में पूर्ण रूप से ज्ञान प्राप्त किया जाये। वैसे सही समय और समझ दोनो एक साथ खुशकिस्मत लोगों को ही मिलते हैं। इतना तो आपने भी देखा होगा कि अक्सर समय पर समझ नही आती और समझ आने तक समय निकल जाता है। इसलिये जीवन में कभी भी दूसरों के दोष और कमियां ढूंढने की भूल मत करो, क्योकि जब तक आप ऐसा करते रहोगे उस समय तक आप किसी दूसरे की भूल तो क्या अपनी भूल भी नही सुधार पाओगे। ज्ञान प्रकाश जी से ज्ञान की झलक पाने के बाद जौली अंकल को तो यही ज्ञान समझ आ रहा है कि उम्र भर यही भूल हम करते रहे हैं , धूल तो थी चेहरे पर और हम आईने को साफ करते रहे। 


 By Jolly Uncle
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