Wednesday, March 5, 2014

Sukrat Story in Hindi


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(1)

सुकरात के गुरु 

विश्वप्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात कुछ ऐसे व्यक्तित्व के धनी थे कि सभी लोग उनके साथ बहुत सहज महसूस करते थे. अपनी समस्याओं का समाधान जानने के लिए उनके पास कई लोग आते और तरह-तरह के सवाल करते थे. सुकरात समान भाव से सभी की समस्याओं का समाधान करने और उन्हें संतुष्ट करने की कोशिश करते. 

एक बार एक व्यक्ति ने सुकरात से प्रश्न किया, ‘आपके गुरु कौन है ?’ 

सुकरात ने हँसते हुए जवाब दिया, ‘ तुम मेरे गुरु के बारे में जानना चाहते हो तो सुनो, सारी दुनिया में जितने भी मुर्ख है वे सब मेरे गुरु हैं.’ 

व्यक्ति ने सोचा कि सुकरात मजाक कर रहे हैं. क्योंकि वे अक्सर ऐसा करते थे. इसलिए उस व्यक्ति ने फिर से वही सवाल दोहराया और उनसे आग्रह किया कि वे कृपया गंभीरता से प्रश्न का उत्तर दें. पर सुकरात ने फिर से वही उत्तर दोहराया तो व्यक्ति को बड़ा आश्चर्य हुआ. 

व्यक्ति ने पूछा, ‘ मूर्ख आपके गुरु कैसे हो सकते हैं ?’ 

सुकरात ने जवाब दिया, ‘ मैं हमेशा यह जानने की कोशिश करता हूँ कि किस दोष की वजह से किसी को मुर्ख कहा जा रहा है. अगर मुझे लगता है कि यह दोष मेरे भीतर भी है तो मैं अपने भीतर के उस दोष को दूर कर लेता हूँ, जिससे कि मुझे मूर्ख ना कहा जाए. इस तरह मैंने जो भी ज्ञान प्राप्त किया है वह मूर्खों से ही शिक्षा लेकर किया है. अगर वे ना होते तो मुझे अपने में सुधार करने का मौका कैसे मिलता. अब तुम्हीं निर्णय लो कि मुर्ख मेरे वास्तविक गुरु हैं कि नहीं.’ 

सुकरात का जवाब सुनकर वह व्यक्ति संतुष्ट हो गया और उसने भी यह तरीका अपने जीवन में अपनाने का निश्चय किया. 

(2) 

मन : शत्रु और मित्र

एक बार एक व्यक्ति ने सुकरात से पूछा, ‘ दुनिया में आपका सबसे निकट मित्र कौन है ?’ सुकरात ने कहा, ‘मेरा मन.’ व्यक्ति ने फिर पूछा, ‘आपका शत्रु कौन है ?’ सुकरात ने जवाब दिया, ‘ मेरा मन.’ 

वह व्यक्ति आश्चर्य में पड़ गया. उसने सुकरात से कहा, ‘आपकी बात समझ नहीं आई. मन ही मित्र और मन ही शत्रु कैसे हो सकता है ? कृपया विस्तार से समझाइये.‘ 

सुकरात ने कहा, ‘ मन ही मेरा मित्र है क्योंकि यही मुझे सही रास्ते पर ले जाता है और यही मेरा शत्रु भी है क्योंकि यही मुझे गलत रास्ते पर भी ले जाता है. मन ही व्यक्ति को उच्च विचारों में लगा सकता है और मन ही पाप कर्म भी करवाता है. ‘ 

उस व्यक्ति ने ध्यान से सब कुछ सुना और फिर पूछा, ‘ पर अगर शत्रु और मित्र दोनों एक ही हो तो हम पर किसका असर ज्यादा होगा ?’ 

सुकरात ने कहा, ‘ यह हम पर निर्भर करेगा कि हम मन के किस रूप को हावी होने देते हैं. अगर हम उसके बुरे रूप को हावी होने देंगे तो वह शत्रु की तरह हमें गर्त में ले जाएगा और अगर हम अच्छी बातों पर ध्यान देंगे तो मन हमें सफलता की ओर ले जाएगा.’ 

(3)

संभलकर चलो

सुकरात यूनान के एक बहुत बड़े दार्शनिक थे. एक बार वे किसी मार्ग से जा रहे थे. मार्ग में उन्हें एक शराबी मिला जो एथेंस का प्रसिद्ध शराबी था. वह नशे में धुत लड़खड़ा कर चल रहा था. सुकरात ने उससे कहा, ‘ संभलकर चलो, गड्डे में गिर जाओगे. शराबी ने जब यह सुना तो जवाब दिया, ‘ ओ महात्मा! मैं लड़खड़ाकर चलता भी हूँ तो क्या हुआ. गड्डे में गिर भी गया तो मेरा क्या बिगड़ेगा ? ज्यादा से ज्यादा कपड़े ख़राब हो जायेंगे, तो धो लूँगा. सारा शहर जानता है कि मैं शराबी हूँ. कुछ भी हो. क्या फर्क पड़ता है ? पर तुम एक महात्मा हो, तुम्हें संभलकर चलना चाहिए. अगर तुम लड़खड़ा गए तो ना इधर के रहोगे ना उधर के. इसलिए संभल कर चलो. इस तरह से शराबी ने एक बहुत बड़े रहस्य का उद्घाटन कर दिया. 


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