Monday, April 7, 2014

Feminist Poem in Hindi


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छद्म नारीवादी

तुम क्यों भूल जाती हो 
वह प्यार का नहीं
है नफरत का सौदागर 
और उससे स्नेह की आकांक्षा 
है जलते अंगारों में ढूंढना सागर. 

तुम क्यों भूल जाती हो 
वह विश्वास का नहीं 
है झूठ का पुलिंदा 
जब वो कहता है खुद को सच्चा 
खुद झूठ हो जाता है शर्मिंदा. 

तुम क्यों भूल जाती हो 
स्त्री उसके लिए स्त्री नहीं 
बस देह है एक करारी 
रेशमी जुल्फ़े, नशीली आँखें, दहकते होठ 
छरहरी काया, और मादक उभारों से ज्यादा 
कुछ भी नहीं है उसके लिए एक नारी. 

तुम क्यों भूल जाती हो 
वह है स्वार्थ से भरा एक घड़ा 
तुम्हारे प्यार, विश्वास और समर्पण के 
नहीं है कोई भी मायने 
क्योंकि उसका अहंकार और मतलब है 
उसके लिए सबसे बड़ा. 

तुम क्यों भूल जाती हो 
उसकी मासूम, मोहक मुस्कान के पीछे 
छिपे हैं ख़तरनाक इरादे 
खुद चल कर आये शिकार पिंजरे में 
बस इसलिए वो करता है मीठी-मीठी बातें.

तुम क्यों भूल जाती हो 
उसका नारीवादी भाषण 
है महज एक ढ़कोसला
केवल मासूमों को ही नहीं 
तेज तर्रार स्त्रियों को भी 
उसने है छला. 

उसके दिमाग में छिपी अश्लीलता जानती हो ना 
एक छद्म नारीवादी है वो पहचानती हो ना 
उसके झूठे प्यार में हर बार तुम बस छली ही जाओगी 
वह है देह का भूखा, ना मिटाओगी उसकी प्यास 
तो उसकी नफ़रत की आग में जलायी जाओगी. 

दिल को जरा अपने आराम दो 
और दिमाग को अपने ये काम दो 
प्यार की भाषा नहीं समझते हैं ऐसे जानवर 
इसलिए सुधरेंगे वो, ऐसी उम्मीद कभी ना कर
छोड़ दो उन्हें उनके हाल पर 
वक्त लिख रहा है उनके भी अपराध 
फिरेगा पानी उनकी हर चाल पर. 

Monika Jain ‘पंछी’ 

How is this hindi poem on pseudo feminist ?