Tuesday, June 3, 2014

Essay on Hypocrisy in Hindi


Essay on Religious Hypocrisy in Hindi Language, Religion, Hypocrites, Blind Faith, Fetishism, Hindu Dharma Shastra, Jain Agam Granth, Uttaradhyayana Sutra, Paragraph, Nibandh, Article, Speech, Write Up, Thoughts, Lekh, Anuched, Content, Matter, हिन्दू धर्म शास्त्र, जैन आगम ग्रन्थ, धार्मिक आडम्बर, पाखंड, ढोंग, उत्तराध्ययन सुत्र, निबंध, लेख, अनुच्छेद 

ये कैसा धर्म है भाई ?

मेरे जीवन के संघर्ष को देखते हुए.. कई लोग कई तरह की सलाहें देते हैं. उन्हीने में से एक सलाह धर्म शास्त्रों का अध्ययन भी है. एक बार जैन धर्म के आगम ग्रंथों को पढने की उत्सुकता हुई. कहा जाता है कि केवलज्ञान और केवल दर्शन के पश्चात् तीर्थंकर भगवान् जो देशना देते हैं उसे ही गणधर भगवान् सुत्र रूप में लिखते हैं. इन सूत्रों को ही आगम कहा जाता है. इसमें कुल 32 आगम ग्रन्थ हैं जिनमें से मैंने उत्तराध्ययन सुत्र का ग्रन्थ किसी से पढने के लिए लिया. यह भगवान् महावीर की अंतिम देशना (निर्वाण से पूर्व का उपदेश) है. इस सुत्र में मनुष्य जन्म की दुर्लभता और महत्त्व को जानते हुए धर्म का अनुसरण करने, जीवन की क्षण भंगुरता को समझते हुए व्यर्थ कार्यों में समय बर्बाद ना करने, जीवन जीने की कला के साथ-साथ मृत्यु को भी हँसते- हँसते स्वीकार करने, अनासक्ति, लोभ, मोह, क्रोध, झूठ, छल, कपट आदि ग्रंथियों से मुक्त होने, कई सुन्दर संस्मरण, घटनाओं और मोक्ष प्राप्ति के मार्गों का उल्लेख है. 

यहाँ जैन ग्रंथों का प्रचार प्रसार मेरा उद्देश्य नहीं है. सभी धर्मों की अच्छी बातों का हमेशा स्वागत है और खोखली और आडम्बर युक्त बातों को दूर से ही नमस्ते हैं. मेरा धर्म तो हमेशा मानवता रहा है और वही रहेगा. पर यहाँ मैं कुछ और बताना चाहती हूँ. यह सुत्र मूल रूप से प्राकृत भाषा में है और इस पुस्तक में मूल गाथा के साथ-साथ उसका हिंदी अनुवाद दिया हुआ है. मेरा स्वभाव है जब भी मुझे कोई भी धर्म ग्रन्थ या पुस्तक जो संस्कृत या प्राकृत भाषा में लिखी हुई होती है देता है तो सीधे मैं हिंदी अनुवाद ही पढ़ती हूँ. इस शास्त्र के अनुवाद में बहुत ही उच्च स्तरीय, पूर्णतः शुद्ध और क्लिष्ट हिंदी भाषा का उपयोग किया गया था इसलिए कुछ-कुछ जगह पर हिंदी में समझने में भी मुझे मुश्किल आई. जिनसे मैंने उत्तराध्ययन सुत्र का ग्रन्थ पढने के लिए लिया था, उनकी पुत्री को भी वह सुत्र पढना था. उन्हें वह सुत्र देते समय मैंने यही कहा कि अनुवाद में बहुत कठिन शब्दों का प्रयोग है. इसलिए कहीं-कहीं कुछ बातें समझ नहीं आई. 

मेरे यह कहने पर उनका जवाब था - शास्त्र को हिंदी में थोड़े न पढ़ते हैं. इसमें मूल भाषा में जो अध्याय दिए हुए हैं उनका रोज पाठ करना चाहिए. धर्म तो उससे ही होगा. उनकी यह बात मेरे समझ से परे थी. उनका स्वभाव जानती थी. ज्यादा कुछ तर्क वितर्क करना करना महाभारत को जन्म देना था इसलिए मैंने बस इतना ही कहा कि जिसका मुझे अर्थ ही नहीं पता वह मेरे लिए उपयोगी कैसे हो सकता है ? यह कहकर मैं अपने काम में लग गयी. 

हालांकि जिन्होंने मुझसे ये कहा था वो खुद M Tech डिग्री धारी हैं. एक शिक्षित और अति धार्मिक कहलाये जाने वाले परिवार से सम्बन्ध रखती है जिन्होंने शादी के तुरंत बाद अपने पति को उनके माता-पिता से बिल्कुल अलग करके अपनी अलग आज़ाद दुनिया बसा ली है जहाँ वे अपने तथाकथित धर्म और अपने पति के साथ रहती हैं और पति के परिवार से कर्तव्यों के नाम पर सारे सम्बन्ध विच्छेद कर चुकी हैं. हाँ अधिकारों के नाम पर सम्बन्ध हमेशा बरक़रार रहेंगे. खेर यहाँ मेरा विषय यह नहीं है. यह सिर्फ इतना ही बताने के लिए बताया कि अति धार्मिक कहे जाने वाले लोग अपने व्यक्तिगत जीवन में कैसे हो सकते हैं. और उनके लिए धर्म की परिभाषा कितनी संकीर्ण हो सकती है. 

अब बात करना चाहती हूँ मैं आप सभी से. यहाँ जिस धर्म ग्रन्थ का मैंने उल्लेख किया है उसमें जीवन को सार्थक बनाने की बातें बताई गयी है. यह बहुत बड़ी पुस्तक है कोई मंत्र मात्र नहीं है जिसके लिए यह तर्क दिया जाए कि अर्थ ना जानते हुए भी सस्वर मंत्र का वाचन करने ध्वनि के सकारात्मक प्रभाव की वजह से लाभ होता है. हालांकि इस तर्क से भी मैं पूरी तरह सहमत नहीं हूँ. 

जो हम पढ़ रहें हैं, हमें उसका अर्थ ही नहीं पता, उन शब्दों को हम महसूस ही नहीं कर सकते. अर्थ नहीं पता तो निश्चित रूप से अपने जीवन में उतार भी नहीं सकते..उन्हें पढना धर्म कैसे हो सकता है ? यह तो काला अक्षर भैंस बराबर होगा. मुंह लगातार कुछ न कुछ बोले जा रहा है पर मन और मस्तिष्क को यह पता ही नहीं कि मुंह बोल क्या रहा है और कान सुन क्या रहें हैं ? यह कौनसे ज़माने का धर्म है भाई ? 

मैं तो हमेशा यह सोचती थी कि सब धर्म ग्रन्थ आज से हजारों लाखों वर्षों पहले लिखे गए हैं. उस समय संस्कृत और प्राकृत भाषा ही प्रचलन में थी. वही सभी को समझ आती थी इसलिए उसी भाषा में ग्रन्थ लिखे गए हैं. पर आज हमारी भाषाएँ बदल चुकी है. हम हिंदी, इंग्लिश और हिंगलिश बोलते हैं. ऐसे मैं धर्म की बातें भी हमें इन्हीं भाषाओँ में समझ में आएगी. कहीं ऐसा तो नहीं कि भगवान् महावीर, कृष्ण, राम आदि बस प्राकृत और संस्कृत भाषा ही समझते हैं और हमें तो बस उन्हें ही पटाना है इसलिए हमारे समझ में ना आते हुए भी हमें उसी भाषा में बोलना है. अगर ऐसा कुछ है तो कृपया ज्ञानी जन मेरा अज्ञान दूर करें. क्योंकि लाख कोशिशों के बावजूद भी हम वह पढ़ और बोल नहीं पाते जिसका अर्थ हमें नहीं पता :( 

By Monika Jain ‘पंछी’

How is this hindi essay on Religious Hypocrisy ?