Tuesday, June 3, 2014

Essay on Religious Extremism in Hindi


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धर्म के रक्षक ही बन रहे हैं धर्म के भक्षक 

कल पहली बार इनबॉक्स में किसी पोस्ट को हटाने की धमकी मिली :p 

पोस्ट कुछ इस तरह से थी : 

‘ ये धार्मिक आस्था भी बड़े कमाल की चीज है..लोग निम्न समझी जाने वाली जातियों के घरों का पानी तक नहीं पीते पर कूड़े-करकट, मल-मूत्र से भरी नदियों में स्नान करने से परहेज नहीं करते, चरणामृत के नाम पर पता नहीं कितने गंदे पानी का आचमन कर जाते हैं. है ना कितनी अजब-गज़ब की बात’ 

अब धमकी मिली है तो एक पोस्ट तो और बनती ही है :D

सबसे पहले तो मैं ये बता देना चाहती हूँ कि मुझे किसी भी धर्म या जाति विशेष से पहचाना जाना पसंद नहीं है. मैं सबसे पहले एक मानव हूँ और मेरा धर्म मनुष्यता है. ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं ये बात मुझे कभी परेशान नहीं करती. क्योंकि मेरे लिए अच्छाई ही ईश्वर का रूप है, और अच्छाई कि ओर कदम बढ़ाने के लिए बुराई और बुरे लोग मेरे लिए उत्प्रेरक का काम करते हैं. 

धर्म के नाम पर मार-पीट, गाली-गलौच, धमकियों पर उतर आने वाले, आस्था-आस्था का ढोल पीटकर उल्टी-फुल्टी, गलत-सलत सभी बातों को सही ठहराने वाले और उन्हें दूसरों पर थोपने वाले ये बात अच्छी तरह से समझ लें कि ऐसा करके वे खुद अपने ही धर्म के सबसे बड़े दुश्मन बन रहे हैं. आप भले ही इस भ्रम में जीते रहें कि आपके ये कृत्य आपको धर्म का रक्षक कहलवायेंगे, पर सच सिर्फ इतना है कि आपके ऐसे कार्यों से धर्म के प्रति बस घृणा ही उपजती है. आप आतंकवादियों से जरा भी कम नज़र नहीं आते. 

कितनी अजीब बात हैं ना, लोग धर्म के लिए जान दे देते हैं, खून की नदियाँ बहा देते हैं, तलवारें उठा लेते हैं, गोलियां चला देते हैं, बस कुछ नहीं करते तो वह है धर्म का अनुसरण. उन्हें सिर्फ और सिर्फ अपने धर्म का तमगा प्यारा है. सिर्फ अपने हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई (अभी तो इनके भी बहुत सारे डिवीज़न हैं) होने पर गर्व है, और नीचता की सारी हदें पार कर लेने पर भी उनका ये नाम, तमगा और गर्व शर्मसार नहीं होता. जिसे कभी देखा तक नहीं उस अदृश्य भगवान् के लिए वे अपने भाई-बहनों का खून तक करने को तैयार हो जाते हैं. धर्म की आड़ में बलात्कार होते हैं. क्या यही सिखाता है आपका धर्म ? इसी से खुश होते हैं आपके ईश्वर ? 

धर्म का मतलब आप जैसे ढोंगी कभी नहीं जान सकते, कभी भी नहीं. आप या तो धर्म के नाम पर निर्दोष पशुओं की बलि देंगे या फिर प्रतिमाओं का विसर्जन कर जल को प्रदूषित करेंगे, अपनी बुराइयों का विसर्जन आपसे कभी नहीं होगा. दया, करुणा, ममता, सहिष्णुता, समानता ये सब क्या होता है, ये आप नहीं जान सकते. धर्म का पालन करना है तो सबसे पहले दूसरों के साथ वही व्यवहार करना सीखिए जैसा आप खुद के लिए चाहते हैं. 

दशहरे पर आप बुराई के प्रतीक रावण को जलाएंगे, होली पर होलिका दहन करेंगे, पर अपने मन की बुराइयों के दाह का उत्सव ? क्या कभी वो मनाया जाएगा ? ईद पर बकरों की बलि के बारे में आप कुतर्क देंगे कि अल्लाह को अपने प्रिय का अर्पण करना होता है. ये क़ुरबानी है. अरे भाई ! अल्लाह को खुश ही करना है तो खुद की बलि क्यों नहीं दे देते ? खुद के प्राणों से भी प्रिय भला कुछ होता है ? अब अगर मैं हिन्दू धर्म की बलि की चर्चा नहीं करुँगी तो आप मेरी बलि देने को भी तैयार हो जायेंगे, तो बता दूँ कि बलि तो बलि ही रहेगी. धर्म का तमगा बदलने भर से उसका अर्थ कभी नहीं बदलेगा. ये कौनसे ईश्वर हैं जो किसी के खून से प्रसन्न होते हैं ? और अगर ये ईश्वर है तो फिर दानव कौन होते हैं ? 

और तो और कुछ लोग कहते हैं ईश्वर की मर्जी से पत्ता तक नहीं हिलता. वाह! कमाल के भगवान् हैं आपके जो अपने मनोरंजन के लिए हत्याएं, बलात्कार, लूटपाट, चोरी, डकैती सब करवाते रहते हैं. क्यों ईश्वर को इतना बदनाम कर रहे हैं आप ? अपने किये धरे को क्यों हमेशा ईश्वर पर मढ़ते रहते हैं ? रहम करिए अब ईश्वर पर भी और हम पर भी और ये धर्म का झूठा चौला उतार फेंकिये, गिन्न आती है आपके दोहरे आचरण से. 

By Monika Jain ‘पंछी’ 

How is this article about religious extremism ?