Wednesday, June 4, 2014

Poem on Rape in Hindi


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मैं अकेली चल सकती हूँ

एक अजीब सी उलझन है मन में
मन को निरंतर कुरेदता, ये कैसा सिलसिला है ?
अब तो ना दिन में सुकून है 
ना चैन रातों में मिला है.
मन को निरंतर कुरेदता, ये कैसा सिलसिला है ?

क्यों खुद से लाख बार सवाल करती हूँ ?
ये कैसी असमंजस है
क्यों खुद से ही लड़ती हूँ ?
हर बार जब खुद को आईने में देखती हूँ
उन खरोंचो से झांकती, अपनी बेबसी टटोलती हूँ.
फिर चीख-चीख कर खुद से बार-बार पूछती हूँ
‘क्या मेरी गलती थी’ ?

समाज के ऊट-पटांग सवालों में 
शर्म से बंद होते बेपरवाह तालों में 
ज़िन्दगी से रोज़ मिलते दर्द में
दुःख में और सर्द मे
हर जगह ढूँढती-खोजती हूँ
हर बार हारती हूँ फिर मैं सोचती हूँ
‘आखिर कहाँ है मेरी गलती’ ?

किसी के पाप का दंश मैं क्यों सहूँ ?
गलती उसने की तो चुप मैं क्यों रहूँ ?
जब खता नहीं मेरी कोई 
तो समाज के ताने क्यों मुझ पर रुके ?
क्यों सर मेरे माँ-बाप का शर्म से झुके ?

क्यों मैं ये सोचूं की मेरी इज्ज़त खो गई ?
क्या ऐसा दुष्कर्म करके उसकी इज्ज़त बढ़ गई ?
क्यों उसके नीच कर्म से मैं जीना छोड़ दूँ ?
क्यों ना अपनी ज़िन्दगी को एक नया मोड़ दूँ.

किसी के नापाक इरादों से 
मेरी ज़िन्दगी नहीं रूक सकती 
समाज के लाख झुकाने से भी 
मेरी हस्ती नहीं झुक सकती.
मैं नारी हूँ, बेचारी नहीं
कोमल हूँ, मैं निर्बल नहीं.

आज मैं लक्ष्मी-सरस्वती की काया हूँ 
जलती धूप में मैं शीतल छाया हूँ
पर वक्त आने पर दुर्गा-काली भी बन सकती हूँ
किसी के आसरे की नहीं ज़रूरत 
अपने न्याय के लिए खुद लड़ सकती हूँ.

डर नहीं लगता अब मुझे 
अब भी मैं अकेली चल सकती हूँ
डर नहीं लगता मुझे 
अब भी मैं अकेली चल सकती हूँ.

By Rishabh Goyal 
Kotdwar, Uttarakhand

Thank you ‘Rishabh’ for sharing such a thought provoking poem to favor ‘stop accusing rape victims’.