Wednesday, October 15, 2014

Essay on Double Standards in Hindi


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मुखौटों का युग 

एक वक्त था जब डर लगता भी था तो चोरी, डकैती, लूट, हफ्ता वसूली, चैन स्नैचिंग आदि वारदातें करने वाले गिरोहों से, जिन्हें हम असामाजिक तत्व कहते हैं. लेकिन आजकल सामाजिक कहलाये जाने वाले तत्वों से और भी ज्यादा सतर्क रहना जरुरी है. क्योंकि आजकल लोग सीधा हाथ में चाकू या छुरा लेकर नहीं आते. चेहरे पर मुस्कुराहट, सौम्यता, आदर भाव, विनम्रता लिए वे बड़े सभ्य जान पड़ते हैं, बहुत मीठा बोलते हैं, साफ़-सुथरे कपड़े पहनते हैं और मौका मिलते ही अपने नापाक इरादों को अंजाम दे देते हैं. 

असामाजिक तत्वों की उत्त्पत्ति कहीं न कहीं गरीबी, बेकारी, शोषण के चलते होती है पर आजकल तो समाज में प्रतिष्ठित, पैसे वाले, धर्म गुरु, समाज सेवक, साहित्यकार, क़ानून के रक्षक किसी का भी भरोसा नहीं. पता चला कब किसने रंग बदल लिया. कौन छलिया और धोखेबाज निकल गया. 

एक प्रतिष्ठित पत्रिका जिसका दायित्व ही सच के साथ खड़ा होना और झूठ का पर्दाफाश करना है, उसी के संपादक जो युवाओं के आदर्श हैं, खोजी पत्रिका के सूत्रधार माने जाते हैं वे अपनी ही बेटी की दोस्त का यौन उत्पीड़न करते हैं. जहाँ विश्वास और संरक्षण का भाव होना चहिये वहां पर ऐसे कृत्य और वो भी समाज के तथाकथित प्रतिष्ठित व्यक्ति के द्वारा और उसके बाद अपने ही अपराध को छिपाने के लिए लीपापोती. 

रोज मंदिर में जाकर चन्दन का टीका लगाने वाला, भजन संध्या में झूम-झूम कर नाचने वाला, घंटों बैठकर प्रवचन सुनने वाला भी कितना बड़ा पाखंडी हो सकता है हम अनुमान नहीं लगा सकते.और ये तो भक्त की बात है पर यहाँ तो आजकल भगवान की तरह लाखों श्रद्धालुओं द्वारा पूजे जाने वाले, सत्य, त्याग, भक्ति, दान, सेवा, मोक्ष आदि पर बड़े-बड़े प्रवचन देने वाले धर्म गुरु भी कई घिनौने आपराधिक कुकृत्यों में संलग्न है. 

बाल कल्याण, महिला कल्याण के नाम पर संस्थाएं चलाने वाले समाज सेवा की आड़ में यौन शोषण, सेक्स स्कैंडल जैसे घृणित कार्यों को अंजाम दे रहे हैं. कई ढोंगी नशे की लत को पूरा करने के लिए आध्यात्म का चोला धारण किये हुए है. राजनेता धर्म निरपेक्षता का मुखौटा लगाकर सत्ता हथियाने की कोशिश कर रहे हैं. जनता की सेवा को ही अपना धर्म बताने वाले राजनेता चुनाव जीतते ही जनता को भूल अपनी जेबें भरने लग जाते हैं. लोकतंत्र के मुखौटे में तानाशाही जारी है. 

ज्योतिष के रूप में कई पाखंडी अन्धविश्वास का कारोबार कर रहे हैं. कानून के रक्षक बने पुलिस, जज, वकील कानून की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं. नारी की स्वतंत्रता, समानता और अधिकारों की बातें करने वाले छद्म नारीवादी खुद नारी के शोषक हैं. मंदिरों, मस्जिदों में करोड़ों का दान करने वाले एक भूखे, गरीब बच्चों को देखकर भड़क जाते हैं. प्रेम पर अति मर्मस्पर्शी कवितायेँ लिखने वाले कई साहित्यकार हैं जिनके लिए प्रेम देहिक सुख से ज्यादा और कुछ नहीं. 

ये मुखौटा संस्कृति का जमाना है. यहाँ पर कायर शेर की खाल ओढ़े रहते हैं, अल्पज्ञ स्वयं को सर्वज्ञाता प्रदर्शित करते हैं. आदर्शवाद, सिद्धांतों, मानवीयता की बात करने वाले भीतर से बेहद स्वार्थी और जातिगत मानसिकता वाले होते हैं जिन्हें अपने स्वार्थों की पूर्ति हेतु सैद्धांतिक पाला बदलते देर नहीं लगती. यहाँ एक ही व्यक्ति का अपनी पत्नी को दिखाने वाला, अपनी प्रेयसी को दिखाने वाला, अपने मालिक, अपने नौकर, अपने से कमजोर को और अपने से शक्तिशाली को दिखाने वाला चेहरा अलग-अलग है. यहाँ संवेदना से रहित लोगों के मुंह से संवेदना के फूल झरते हैं. मुखौटो के इस युग में एक सच्चा आदमी खोजना बहुत मुश्किल हो गया है. 

By Monika Jain ‘पंछी’ 

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