Friday, October 31, 2014

Poem on Festival in Hindi


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आत्मा का उत्सव 

बाहरी उत्सव तो हमनें खूब मनाये हैं
कभी खेले होली के रंग 
तो कभी दिवाली के दीप जलाएँ हैं, 
पर क्या मनाया हैं हमनें 
कभी कोई आत्मिक पर्व ?
जिस पर करे हमारा रोम-रोम गर्व.

नहीं ना. 
तो चलो कुछ नया करते हैं 
बसंत के फूलों की महक 
अब हम दिल में भरते हैं. 
बसंत त्योहार है प्रेम का, 
तो चलो दिल को अपने 
प्रेम में सराबोर करते हैं. 

दिवाली की अमावस को हर 
कर दिया हमने प्रकाश ही प्रकाश 
चलो इस बार भर लेते हैं 
अपने मन में भी थोड़ी सी उजास. 

होली के रंगों से हमने 
रंग दी दुनिया सारी 
क्यों ना मन में भी भर लें 
थोड़ी प्रेम की पिचकारी. 

जब बसंत की खुशबू, होली के रंग 
और दिवाली की रोशनी 
हमारे दिल में उतर आएगी
उस दिन से ही ना जाने कितनी और जिंदगियां भी 
रंगों, खुशबू और रोशनी से संवर जायेगी. 

उस दिन पहली बार लगेगा 
कि त्योहारों को जी लिया हमनें, 
जब सपनों की खिलखिलाती टोकरी 
हम बाँट आयेंगे अनजाने अपनों के बीच,
जब विश्वास की रोशनी फैला आयेंगे 
हम उन सारे सपनों के बीच. 

तो बसा लेते हैं यूँ मन में उत्सव 
कि दिल सदा लोरियों से भरा रहे.
दीप जलाएँ कुछ ऐसे 
कि हर घर में सवेरा रहे.
रंग उड़ायें कुछ ऐसे 
कि मन कोई बेरंग ना हो 
हर तरफ हो बस प्यार ही प्यार
नफ़रत की कहीं कोई गंध ना हो. 

By Monika Jain ‘पंछी’ 

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