Saturday, October 11, 2014

Poem on Prostitute in Hindi


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बस इतना सा कुसूर था

वक़्त से पहले ही हम जवां हो गये
सब कुछ सहकर भी बेज़ुबां हो गये
ख़ामोशी से ढलता रहा जो वक़्त का फ़ितूर था
हम तवायफ़ थे साहब...बस इतना सा कुसूर था.

चंद सिक्कों की खातिर हमें इस राह चला गये वो
जिस्म को सलामत रख हमें ज़िन्दा जला गये वो
अब तो हम खुद को आईने में भी नहीं दिखते
चादर की सिलवटों में कहीं हमको मिला गये वो.

सिसकियों में बदल गया, जो थोड़ा सा गुरुर था
हम तवायफ़ थे साहब...बस इतना सा कुसूर था.

हम जमे रहे किसी राह से, जमाना हमसे गुजरता गया
जो आया हमारी गली से होकर, सच से मुकरता गया
कोशिश की थी, खुद को हमने खुद में समेटने की
पर ये जिस्म था के बस हमसे बिखरता गया.

ख़ुद का गुलाम होकर भी, कोई हमारा हुजूर था
हम तवायफ़ थे साहब...बस इतना सा कुसूर था.

वो रहे दूध के धुले, हम गाली बनकर रह गये
एक ज़माने से बेख़बर हम नाली बनकर रह गये
हसरत थी अपनी भी एक ग़ज़ल बनने की साहब
पर अफ़सोस कि बस एक कव्वाली बनकर रह गये.

हमारे इस अंजाम में, आपका हाथ भी जरुर था
हम तवायफ़ थे साहब...बस इतना सा कुसूर था.

By Malendra Kumar ‘मलेन्द्र कुमार’

Prostitution is also a part of the men’s violence against women. There are lots of factors that force a woman into prostitution like poverty, homelessness, child sexual abuse, drug and alcohol misuse, previous sexual violence, mental ill health etc. But the main reason is man as a buyer of sex. Prostitution is not a choice, its done to survive.

Thank you ‘Malendra’ for sharing such a heart touching poem reflecting the pain of a prostitute.