Monday, November 24, 2014

Poem on Sunshine in Hindi


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वो धूप का टुकड़ा

बड़ी दिलचस्प फ़ितरत का था 
वो धूप का टुकड़ा.

किसी कांपती सर्दी की सर्द सुबह 
मैंने धूप का एक मासूम टुकड़ा 
छील कर देखा था. 
उबासी में भीगी आँखें 
गुनगुनी रोशनी के कुछ कतरे लिये 
बड़ी दिलचस्प फ़ितरत का था 
वो धूप का टुकड़ा.

एक बड़े सफ़र की दास्तान लिये 
उसका पीला रंग 
हथेलियों पर उतरने लगा था.

मेरी हथेलियों में होकर भी 
आज़ाद सा 
उबासी में भींगा 
मगर ताजा सा 
दिन भर के सफ़र के लिए 
दूर क्षितिज को तकता 
खुद को तैयार करता हुआ 
बड़ी दिलचस्प फ़ितरत का था 
वो धूप का टुकड़ा.

बरबस ही 
मैंने पूछ लिया था उससे, 
‘रोज एक ही रहगुजर से 
एक ही तरह गुजर कर 
थकते नहीं हो तुम ?
कभी थकते भी हो क्या ??’
वो मुस्कुराया और बोला, 
‘सारे दिन एक से कहाँ हैं ?
फर्क है, 
तुम्हारी और मेरी ज़िन्दगी में.

तुम अलग-अलग रास्तों से 
एक मंज़िल के लिये चलते हो 
मैं रोज इसी रास्ते 
कितनी जुदा मंज़िलें नाप जाता हूँ’,
कहकर आगे बढ़ गया वो.

उसके लफ़्ज़ों की गर्मी 
और लहजे का पीलापन 
मेरी हथेलियों पर 
अब भी बिखरा था. 

सचमुच,
बड़ी दिलचस्प फ़ितरत का था 
वो धूप का टुकड़ा.

By Malendra Kumar ‘मलेन्द्र कुमार’

Thank you ‘Malendra’ for sharing such a beautiful poem about the piece of sunshine. 

How is this hindi poem about the piece of sunshine ? Feel free to share your views via comments.