Wednesday, December 24, 2014

Love Conversation in Hindi


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Love Conversation

(1)

तुम्हें पता है जब तुम बोलती हो तो हवाओं में रूमानियत की बूंदे तैरने लगती है...जब खिलखिलाकर हँसती हो तो प्यार की ये बूंदे बरसने लगती है...मैं बस खो जाता हूँ तुम्हारी मासूम आँखों की गहराइयों में...जो समेट लेती है इन बारिशों को...और फिर मोती बनकर तुम्हारी आँखों में चमकती इन बूंदों में मुझे सारा जहाँ प्यार में डूबा नज़र आने लगता है…...तुम्हारी आँखें, तुम्हारी बातें और तुम्हारी ये मुस्कुराहटें जीना सिखाती है...तुम प्यार में समायी हो या प्यार तुममें...नहीं पता...पर तुमसे ही जाना है मैंने प्यार को...बस तुमसे ही... ~ तुम्हारा आकाश! 

आकाश! मेरे शब्दों से हवाओं में रूमानियत की रंगत है...क्योंकि ये शब्द बस तुम्हारे लिए हैं...मेरी खिलखिलाहट से भरी हंसी तुम्हें बारिश सी लगती है...पर इस बारिश को बरसाने वाले बादल तुम ही तो हो... मेरी आँखों में तुम्हें जो मासूमियत दिखती है...वह तुम पर मेरा विश्वास है...और तुम्हें सारे जहाँ का प्यार मेरी आँखों में इसलिए नज़र आता है...क्योंकि इन्हें देखने वाली आँखें तुम्हारी है...मेरे पंखों को उड़ान देने वाले आकाश! तुमने भले ही मुझसे प्यार को जाना होगा...पर मैंने तुम्हारे साथ प्यार को जीया है...हर पल...हर लम्हा...मेरी आँखों, मेरी बातों और मेरी मुस्कुराहटों में जीवन भरने वाले सिर्फ तुम हो...सिर्फ तुम...और मैं हूँ…~ तुम्हारी पंछी!

(2) 

आकाश : तुम्हें पता है तुम्हारी सबसे अच्छी बात क्या है? 

पंछी - क्या? 

आकाश : यही कि तुम बहुत-बहुत अच्छी हो.

पंछी : और तुम्हें पता है तुममें सबसे अच्छा क्या है? 

आकाश : क्या? 

पंछी : तुम्हें सिर्फ अच्छाई को सराहना ही नहीं आता. उसे सहेजना और संवारना भी आता है. 

आकाश : वो इंसा ही क्या जो अच्छाई की कद्र ना जाने...तुझसे जुड़े कोई और तुझे ना चाहे...वो प्यार करना भी भला कहाँ जाने?

पंछी : तेरे प्यार की गहराइयों की कायल हूँ मैं...होठ सिल देती है...अक्सर तेरी बातें... खैर! तेरी तो खामोशियों की भी घायल हूँ मैं. 

(3)

पंछी : तुमने सुनी है कभी खामोशियों की आवाज़? 

आकाश : हाँ, बहुत बार... 

पंछी : क्या कहती है खामोशियाँ? 

आकाश : खामोशियाँ अक्सर करती हैं तुम्हारी बातें... पता ही नहीं चलता...कब जागता है दिन और कब सोती हैं रातें...

आकाश : अच्छा! तुमने भी सुना है कभी ख़ामोशी को? 

पंछी : हाँ, सुना है ना! ये शोर भी लगते हैं मुझे अब खामोशियों के हिस्से... इन खामोशियों में सुनती हूँ मैं...हमारी खामोशियों के किस्से…

By Monika Jain ‘पंछी’

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