Sunday, December 14, 2014

Poem on Spring Season in Hindi


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मन गाये बसंत का राग

हाँ! 
मैंने उतार दिए हैं परेशानियों के केंचुल 
कर रही हूँ सामना मुश्किलों का हर पल 
चिंताओं के पत्ते झरा दिए हैं 
भय के सब बीज जला दिए हैं.

अब पतझड़ में भी मैं 
आशाओं के गीत गा सकती हूँ 
फूल खिले ना खिले 
बसंत का उत्सव मना सकती हूँ. 

क्योंकि,
बाहर के बसंत से पहले 
भीतर एक बसंत का खिलना जरुरी है 
चाहे पसरा हो कितना भी सन्नाटा 
पर सृजन बिना ये जिंदगी अधूरी है.

चाहे फूल ना खिलें सरसों के मेरे आँगन में 
पर सौन्दर्य को विस्तार तो पाना है 
चाहे सूख चूका हो मेरे लिए हर सरोवर 
पर प्रेम का झरना मुझे बहाना है. 

चाहे कोहरे की धुंध कभी हटे ना हटे 
एक आग को भीतर जलना ही होगा 
ना हो कोयल, तितलियाँ और भौंरे कहीं 
पर ह्रदय के गीतों को मचलना ही होगा.

बेरंग और उदास जीवन में भी 
रंगों का सृजन हो सकता है 
जीवन हो चाहे दोधारी तलवार 
पर सपनों का वरण हो सकता है. 

तो क्यों ना 
भर दें अपने तन और मन को
हम बासंती बहार से 
नफरत और घृणा को जीतें 
प्रेम की फुहार से.

सर्दी की ठिठुरन हो चाहे 
गर्मी की हो भीषण आग 
पतझड़ के मौसम में भी 
मन गाये बसंत का राग. 

लाल, नीले, हरे और पीले 
रंग सब खिलते रहें 
सपनों की बुझी चिताओं में भी 
बीज अंकुरण के मिलते रहें.

By Monika Jain ‘पंछी’

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